नये वर्ष की नई अभिलाषा ----

बचपन के इन्द्र धनुषी रंगों में भीगे मासूम बच्चे भी इस ब्लॉग को पढ़ें - - - - - - - -

प्यारे बच्चो
एक दिन मैं भी तुम्हारी तरह छोटी थी I अब तो बहुत बड़ी हो गयी हूं I मगर छुटपन की यादें पीछा नहीं छोड़तीं I उन्हीं यादों को मैंने कहानी -किस्सों का रूप देने की कोशिश की है I इन्हें पढ़कर तुम्हारा मनोरंजन होगा और साथ में नई -नई बातें मालूम होंगी i
मुझसे तुम्हें एक वायदा करना पड़ेगा I पढ़ने के बाद एक लाइन लिख कर अपनी दीदी को अवश्य बताओगे कि तुमने कैसा अनुभव किया I इससे मुझे मतलब तुम्हारी दीदी को बहुत खुशी मिलेगी I जानते हो क्यों .......?उसमें तुम्हारे प्यार और भोलेपन की खुशबू होगी -- - - - - -I

सुधा भार्गव
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मंगलवार, 15 जनवरी 2019

यादों का सावन


॥5॥ बाललीला 
सुधा भार्गव 

बचपन में मैं जोर  -जोर  से  गाना  गाती,मटक -मटककर  नक़ल  उतारा  करती -ऐसा   मेरे  बाबा  कहते  थे|
मैं जिस पाठशाला में पढ़ती वह दुमंजिली और पक्की थी। उसी के सामने बड़ा सा मैदान हमारे लिए भानुमती के पिटारे से कम न था। उसकी चार दीवारी के अंदर खेलकूद होते,टिफिन खाने के बाद दौड़ लगाते। सर्दियों के समय जूट की बनी पट्टियों पर बैठकर पढ़ते और सुबह-सुबह  प्रार्थना करते हे भगवान बुद्धि तो ,विद्या दो,हम सब बच्चे हैं नादान। पक्की खपरैल के दो शेड भी वहाँ  बने थे जिनमें लकड़ी के तख्त लगाकर हमारा मंच तैयार हो जाता।वही हमारा थियेटर था। खुले दरवाजों वाला थियेटर जिसमें हर हफ्ते कोई न कोई नाटक होता। उस नाटक कंपनी को हम बच्चे ही चलाते थे। ऐसी थी  हमारी  निराली  पाठशाला। अनूपशहर मतलब अनोखे शहर की अनोखी पाठशाला।
 
इस आर्य  कन्या  पाठशाला में हर  शनिवार  लड़कियां  कविता  पाठ करतीं और नाटक  में  भाग  लेती। इन  सबका अभ्यास आखिरी पीरियड में रोज होता।
एक  शनिवार को खेल के मैदान में लकड़ी के स्टेज पर  कृष्ण लीला  होने वाली थी,


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जिसमें मुझे कृष्ण बनाने के लिए चुना गया।  पहली बार नाटक में भाग लेने जा रही थी इसलिए मैं खुशी के मारे गुब्बारे की तरह हवा में उड़ने लगी। वैसे तो मैं माँ के साथ पूजा के समय कम ही बैठती थी पर उस दिन मैं उनके पास जाकर बैठ गई। बालगोपाल की ओर टकटकी लगाए सोचने लगी -आह! इनका मुकुट कितना चमकीला है। मुरली भी सुंदर है। पायल तो बड़ी पतली घुंघरूवाली है। मैं भी मुकुट लगाऊँगी। मुरली बजाऊंगी । पायल पहनकर छमछम चलूँगी। आरती खतम भी न हुई कि मेरा राग शुरू हो गया-"माँ माँ ।"
"देख रही है पूजा कर रही हूँ। दो मिनट तुझसे चुप नहीं बैठा जाता।"
मैं मन मसोस कर रह गई।
कूछ देर बाद फिर बोल उठी –"माँ माँ मैं स्कूल में नाटक में कृष्ण बन रही हूँ।"
"तो ----।" माँ का रूखा सा जबाव सुनकर मेरा मुंह लटक गया और मरी सी आवाज में बोली-
"मुझे अपने बाल गोपाल की तरह सजा देना।"
"कब है नाटक ?"
"शनिवार को।"
" आज तो बुधवार ही है,क्यों अभी से तूफान मचा रही है!"
माँ की डांट ने मेरा मुंह बंद करा दिया और मैं गुस्से से भरी वहाँ से उठकर चली गई।
थोड़ी देर में ही भूल गई माँ ने मुझसे क्या कहा और मैंने उनसे क्या कहा। शनिवार को सुबह स्कूल
 जाते समय याद आया मुझे तो कृष्ण बनना है मेरी मुरली मेरा मुकुट! कुछ भी तो नहीं हैं। मैं 
सुबक पड़ी।
"सुबह सुबह रोधो क्यों रही है?"
"माँ ,मेरा समान --?"
"तेरा सामान या कृष्ण का सामान।"माँ हंस कर बोली । "इस बैग में पीली धोती और बांसुरी रख दी है।पायल पैर में पहना देती हूँ । उसे खोलना मत।फूल की माला और मुकुट पहनाकर तुम्हारी बहनजी सजा देंगी। खुश!"
मैं सच ही खुशी से पागल हो गई और छ्लांगें लगाते स्कूल पहुँच गई।
  

 टिफिन टाइम होते ही स्कूल में भगदौड़ सी मच गई। मेरे साथी  नाटक देखने के लिए आगे से आगे की जगह घेरकर बैठना चाहते थे।और मैं मैं तो बस कृष्ण बनने के सपने देख रही थी।   
 पीली धोती पहने, फूलों  के  गहनों  में  सजी सचमुच मैं अपने को कन्हैया समझ रही  थी |मुरली  से  आवाज  निकालती,पायल  छुनछुन करती  जब  मैं  मंच  पर  पहुँची ,सबकी    निगाहें  मेरी ओर  थीं  जो  प्रशंसा  के  मोती  लुटा  रही  थीं  | इतने  में  यशोदा  मैया  आई  |बोली- -"क्यों  रे  बलराम , तूने  दही  की  मटकी   क्यों  फोड़ी?"

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कृष्ण  बनी  मैं  चिल्लाकर  बोली -"अरे  यह  तो  गलत  बोल  रही  है |अब  मैं   कैसे  बोलूँ ?"पास  खड़ी  अध्यापिका  ने मुँह  पर  अंगुली  रखकर मुझे चुप  रहने  का  इशारा  किया | दूसरी  अध्यापिका  ने परदे  के  पीछे  से धीरे  से  कहा- "अपने  वाक्य  बोलो |रुको मत |"

मुझ बालकृष्ण  ने  तीखे  स्वर  में  यशोदा  पर  प्रहार  किया- "मैया  तू  तो  मेरा  नाम  ही  भूल  गई | मैं 
 बलराम नहीं  कृष्ण  हूँ   पहले  मुझे  कृष्ण  कहो  तब  आगे  बात  करूंगा। "  "यशोदा  सिटपिटा  गई | बहनजी की  आँखों  से  चिंगारियां   निकल  रही  थीं मानो वह उसे  भस्म  कर  देगी |तभी  लोगों  को  सुनाई दिया-"लाल ,तू  मेरा  कृष्ण  ही  है पर क्या  करूं ! जब  मैं  आई   तू  मेरी  तरफ  पीठ  करके  खड़ा  था । पीछे  से  तू  और  बलराम  एक  से  ही  
तो  लगते  हो |"
प्यार  से  यशोदा  ने  कृष्ण  को  गले  लगा  लिया | मंच  का  पर्दा गिर  गया  |तालियों  की गूँज के साथ सब खिलखिला  उठे |देखने वाले समझ  गये  थे -बच्चे  भूल कर बैठे हैं  लेकिन  बालबुद्धि  ने  समय  के  अनुसार  जैसा  अभिनय  किया जैसा बोला बहुत अच्छा  किया ऐसा सब कह रहे थे।    
बड़ी बहनजी(प्रिंसपिल)  ने  भी   खुश  होकर  मुझ कृष्ण -यशोदा  की पीठ  थपथपाई।  |
असल में कृष्णलीला करने की बजाए हम बच्चों ने बाललीला कर दी थी।    

इस बाललीला के महकते फूल अब तक मेरे साथ है। 
   

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सोमवार, 14 जनवरी 2019

यादों का सावन


॥4॥ जादुई मुर्गी 
सुधा भार्गव 
     

वैसे तो पिता जी मुझे हमेशा टोकते रहते थे-यह करो-यह न  करो,ऐसे चलो-वैसे चलो। बीच बीच में डांट भी पिलाते जाते थे। पर शहर जाने पर जब वे जादू वाले खिलौने लाते तो लगता कि प्यार भी करते हैं।

एक बार वे दिल्ली गए और वहाँ से प्लास्टिक की ऐसी मुर्गी लाए जो अंडे देने लगी।
Image result for pixel free images plastic toy hens एक नहीं--- पाँच पाँच! अचरज से मेरी तो  आँखें गोल-गोल घूमने लगीं। सोच के पंख निकल आए- -हे भगवान अब तो अंडे फूंटेंगे  और फुदकते लगेंगे रुई से नन्हें बच्चे। चिंता में डुबकियाँ लेती बोली – “पिता जी--- पिता जी, ये रहेंगे कहाँ ?इनका तो जल्दी से घर बनवाना पड़ेगा। अभी तो आप अपना रूमाल दे दो । उससे इन्हें ढक दूँगी वरना सर्दी से इन्हें जुखाम हो जाएगा । अरे सोच क्या रहे हो जरा जल्दी करो न।
मेरी बात पर वे ठहाका मार कर हंस पड़े। बोले-ये अंडे तो मुर्गी के पेट में ही रहते हैं।
जब अंडे बाहर आ गए तो वापस पेट में कैसे जाएंगे?” मैं हैरत में थी।
देखो तो सही मैं अभी जादू से अंडों को पेट में भेज देता हूँ।
पिता जी ने मुर्गी को उल्टा करके धीरे से उसके दोनों पैरों को दबाया। 
अरे यह क्या –--इसका पेट तो अपने आप खुल गया। मैं चौंक पड़ी। 
पिता जी ने एक-एक करके पांचों अंडों को उसमें डाल दिया। फिर से उन्होंने  पैरों को दबाया तो पेट धीरे-धीरे बंद हो गया।
जादू हो गया। मुझे भी यह जादू सिखा दो।मैं मचल उठी।
इसमें है क्या? ऊपर से थोड़ा दबाओ धड़धड़ अंडे निकल पड़ेंगे।
मैंने वैसा ही किया पर अंडों को लेकर बड़ी सावधानी से हथेली पर रख लिया  कि फूट न जाएँ और इठलाती बोली –“अब मैं इनको पेट में नहीं जाने दूँगी। कुछ दिन बाद अंडे फुस से फूटेंगे। छोटे गुलाबी बच्चे  निकलेंगे ,वे भागेंगे ,मैं भी उनके पीछे भागूंगी ।पकड़ा-पकड़ी खेलेंगे। आह! कितना मजा आएगा। वे तो होंगे छोटे-छोटे और मैं होऊँगी बड़ी -बड़ी। जीत तो मेरी ही होगी क्यों पिताजी !मैं जीतूंगी न।उछल-उछलकर तालियाँ बजाने लगी।
पर बेटा ,मुर्गी तो नकली है और उसकी अंडे भी नकली है।उसके अंडों में से बच्चे  कभी नहीं निकलेंगे।
मैं रोनी सी हो गई। नहीं निकलेंगे--?” भर्राई आवाज में फिर से पूछा-नहीं निकलेंगे?
हाँ बेटा सच ही कह रहा हूँ। तू छोड़ इस मुर्गी को। काहे के चक्कर में पड़ गई। मैं तुझे सचमुच की मुर्गी मंगा दूंगा। तुझे मुर्गी बहुत अच्छी लगती है क्या ?
हाँ पिता जी।
दूसरे ही दिन उन्होंने मुर्गी के लिए लकड़ी का एक घर बनवाया जिसे छत पर रख दिया। उसमें मुर्गा- मुर्गी रहने लगे।रम्मू हमारे घर में काम करने वाला उनकी देखभाल करता। मुर्गीघर की सफाई करता।
उन्हें दाना- पानी देता। मौका मिलने पर मैं भी उसके पीछे -पीछे मुर्गीघर चल देती यह देखने के लिए कि वह मेरे मुर्गा -मुर्गी को भूखा तो नहीं रखता।

 कुछ दिनों के बाद छोटे- छोटे मुर्गी के बच्चे  लकड़ी का  दरवाजा खुलते ही बाहर की तरफ भागने 
लगे । मैं चिल्लाई-रम्मू-रम्मू --ये बच्चे कहाँ से आ गए?इन्हें पकड़।  
मैं भी उनके पीछे दौड़ पड़ी। मेरे तो एक भी हाथ नहीं लगा। भागते -भागते हाँफ और गई। रम्मू ने एक मिनट में ही चूजे को उठा अपनी हथेली पर बैठा लिया। शायद उसे मुझ पर तरस आ गया था। बोला -बीबी,ये मुर्गी के अंडों में से निकले हैं। 
अरे वाह !पिता जी ठीक ही बोले -यह सचमुच की मुर्गी है। ला मुझे दे दे। 


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 "न--न गिर गया तो इसे चोट लग जाएगी । अभी तो यह उड़ भी न सके।"
"इसे मैं छू लूँ?"
"हाँ--- हाँ !
मैंने  बड़े प्यार से उसके रुई जैसे कोमल पंखों को छोटी छोटी अंगुलियों से छुआ,धीरे धीरे सहलाया। 
अब तो मैं स्कूल से आते ही छत पर पहुँच जाती। कुकड़ूँ -कूँ,कुकड़ूँ -कूँ की आवाज निकालते हुये मुर्गीघर का दरवाजा धीरे से खोलती । उसमें झाँकती तो कभी मुझे मुर्गी माँ अपने बच्चों को चोंच से दाना  खिलाते मिलती तो कभी प्यार से उन्हें अपने से चिपकाए हुए मिलती।  

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मुर्गी माँ के प्यार को देख मुझे खुशी भी मिलती और  अचरज भी होता  क्योंकि मैं तो  यही समझती थी कि मेरी माँ ही बस मुझे प्यार करती है। स्कूल पहुँचकर अपनी सहेलियों से आश्चर्य भरे मुर्गी घर के  बारे में एक एक बात न कह दूँ तब तक चैन न पड़ता। 

  इस तरह मेरा बचपन ज़ोर ज़ोर से खिलखिलाता –इतराता और मुझे चौंकाता । इन सबमें समाई  खुशी की गंध को मैंने अभी तक सँजोकर रखा है। काश! आज भी बच्चों का बचपन खुली हवा मेँ चौकड़ियाँ भरता नजर आता ! गगनचुंबी इमारतों की भीड़ में कंप्यूटर बने बच्चे न जाने कहाँ खो गए हैं!
समाप्त  

गुरुवार, 17 मई 2018

यादों का सावन


॥ 3॥ प्यारा-न्यारा पान 
सुधा भार्गव



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      छुटपन से ही मैंने परिवार में सबको पान-तम्बाखू चबाते देखा। खुद भी खाते और आने-जाने वाले को भी पान खिलाते। बड़े से आले में रखा पीतल का पानदान साथ में मोर की कलगी वाला सरौता-----वह तो  कुछ ही समय में मोती-मोटी सुपारियाँ काट कर रख देता। खाली समय में अम्मा –चाची खटखट सुपारी काटने बैठ जातीं और शुरू कर देतीं कभी खतम न होने वाली बातें।
      चूने-कत्थेकी ढेली की ढेली बाजार से आतीं। चूना मिट्टी की हँडिया में भीगने को कई दिन तक पानी में पड़ा रहता। तब कहीं पान में लगाने लायक होता। कत्था भी घर में ही तैयार होता। 
      गर्मी की छुट्टियों में तो पान की बहार देखते ही बनती थी। ताई-ताऊजी,चाचा-चाची,अम्मा-पिता जी मिलकर पान चबाते। मेरे पूर्वजों में जरूर कोई शाहजहाँ की अम्मी नूरजहाँ के दरबार में रहा होगा। उसके समय ही तो लोगों को पान से इतना प्यार हो गया था कि हमेशा उसे अपने मुंह में बैठाए रहते। बेगम तो चली गई पर उसकी संगत के जाल में मेरा घर अभी तक  फंसा हुआ है। अम्मा हमारी पान कम ही खाया करती थी। ताई जब मज़ाक के मूड में होती तो कहती-अरे मुन्नी की माँ–ले पान खा –होंठ भी हो जाएंगे लाल और जबर्दस्ती ठूंस देती पान उनके मुंह में। उनकी हंसी ठिठोली में मुझे भी बड़ा आनंद आता।
      पिता जी ऑफिस जाते तो पान का चांदी का चमचमाता डिब्बा बड़ी शान से उनके साथ चल देता। उसके तीन हिस्से थे एक मैं अम्मा बीड़े लगाकर रखतीं और दूसरे में कटी सुपारी और तीसरे में चांदी के बरक वाला –खुशबूदार---बनारसी तंबाखू।  इसे पिता जी बनारस से ही मँगवाते। यह खास मौके पर खास लोगों के लिए ही था। सबकी पहुँच से बाहर छोटी गोदरेज  की अलमारी में बंद। काली -पीली पत्ती वाला तम्बाखू तो बनारसी तंबाखू के सामने बड़ा बदसूरत लगता। वह और किमाम  पानदान के पास ही रखे रहते। जिसका मन करता पान में चुटकी भर छिड़क लेता।
कहने को तो सब पान चबाते रहते थे---- खाली पेट भी भरे पेट भी। पर मुझे यह आदत जरा भी नहीं सुहाती थी। हर एक के कमरे में पीकदान लेकिन पलंग के नीचे थूकी कुचली सुपारी पड़ी रहती । मेरे पैर के नीचे आ जाती तो घिनना उठती। नालियों में तो पीक के दाग। रुमाल में तो दाग ही दाग । अम्मा तो कभी -कभी  अंजाने में साड़ी के पल्लू से ही मुंह पौंछ लेती और वहाँ भी पान की लाल परछाईं चिपक जाती। यह सब देख हम भाई-बहन नाक भौं सकोड़ लेते और पान न खाने की कसमें खाते।
      एक दिन एक साधु बाबा पिता जी से मिलने आए। वे बाबा के गुरू थे। कोई घर में मुश्किल आ जाती ,उनसे राय जरूर लेते। पिता जी ने उन्हें बड़े आदर से पान दिया और उन्होंने पिता जी को सिर पर हाथ रख  ढेर सा आशीर्वाद दिया।  साधुबाबा को पान खाते देख मैं तो हैरत में रह गई—साधु होकर पान के शौकीन! भगवान के भक्त को तो कम से कम इस गंदे पान से दूर रहना चाहिए।
      उनकी ओर मुंह बिदकाते हुए पूछ बैठी-“आप भी पान खाते हो?
     “हाँ बेटा,इसमें बुराई क्या है?पान खाना –खिलाने का रिवाज बहुत पहले से चला  आ रहा है। बहुत पहले गुरू पान का एक टुकड़ा खुद खाकर बाकी शिष्य को देते थे,मतलब आज से तुम मेरे शिष्य हुए। अब गुरू के घर तो रहकर कोई नहीं पढ़ता पर गुरू-शिष्य के बीच प्यार तो है। तुम्हारे पिता ने आदर से मुझे पान दिया तो कैसे मना कर सकता था। मैं भी उन्हें दिल से प्यार करता हूँ और तुम सबकी भलाई चाहता हूँ।”
      मैं इस बात को पचा नहीं पाई कि एक साधु पान खाए। उफ वह भी जूठा! बंदूक की तरह फिर प्रश्न दाग दिया---
      “आप एक दिन में कितने पान और सुपारियाँ खाते हो ?”
    “तुम तो मेरी अच्छी खबर ले रही हो। मेरी माँ भी पान के खिलाफ थी। उन्हें हमेशा डर बना रहता था –पान के बहाने तम्बाखू न खाने लगूँ।”
    “आप सच बोल रहे हो ? तम्बाखू नहीं खाते---!”
    “एकदम सच! भला अपनी मुन्नी रानी से कैसे झूठ बोल सकता हूँ? पान भी खाने के बाद बस एक बार ही लेता हूँ, इससे खाना पच जाता है।”
     मन में थोड़ा सा विश्वास जगा कि ये बाबा तो अच्छे हैं।
     उस दिन तो हद हो गई। मास्टर जी मुझे पढ़ाने आए। पिताजी ने उनकी जोरदार आवभगत करते हुए पान की डिब्बी खोली और उनको एक पान  दिया। मैं सहम सी गई। अब जरूर पान की पीक मेरी किताबों पर टपकेगी। पिताजी पर  बड़े ज़ोर से झुंझलाहट हुई। खुद तो खाते ही हैं –न खाने वालों को भी खिला देते हैं। मेरे बिगड़े मिजाज का अंदाज शायद मास्टर जी को तो लग गया था। इसीलिए उन्होंने मुझे खुश करने के लिए पान की कहानी से ही किया  पढ़ाई का श्रीगणेश ----
    एक दिन राजा अकबर ने दरबारियों से कहा-“कल सबसे बड़ा पत्ता लेकर आना।”
     दूसरे दिन कोई केले का पता लाया तो कोई नारियल का तो कोई बड़ का । बीरबल खाली हाथ हिलाते चले आए।
     “बीरबल,तुम पत्ता नहीं लाए?”अकबर ने पूछा।
      “हुजूर,मैं क्या करता लाकर! मेरा पत्ता तो महल में पहले से ही मौजूद है। ”
     “तो जल्दी से दिखाओ न। देरी किस बात की है ?”
     “ओह महाराज! जल्दी किस बात की है?पहले पान-शान तो खा लिया जाए।”
     उसके इशारे पर एक सेवक पान का बीड़ा लगाकर लाया।
     “वाह!गज़ब का स्वाद है”। कहते हुए अकबर पान खाने लगे। उसके स्वाद में पत्ते वाली बात ही भूल गए। लेकिन दरबारी चुप बैठने वाले नहीं थे।
     एक दरबारी ने चुटकी ली-“यह पान खाने की बात कहाँ से आन टपकी। बीरबल की तो समझ में ही नहीं आया है कि बड़ा पत्ता  कौन सा है? तभी तो खाली हाथ चला आया।’’
    “अरे हाँ बीरबल –अपना पता तो दिखाओ।‘’
    “कहाँ से दिखाऊँ?मेरा पत्ता तो आप खा गए।’’
    “तुम्हारा पत्ता ---मैं खा गया----क्या बात करते हो?”
    महाराज ,मैं सच कहा रहा हूँ। सारे दरबारियों ने यह देखा है।’’
     ओह,पान का पत्ता –राजा ज़ोर से हंस पड़े।
    मुझे भी हंसी आ गई। मेरे मुख पर खेलती हंसी को देख मास्टर जी को चैन मिला।
     फिर क्या हुआ?बीरबल जीत गया क्या?” मैंने उतावलेपन से पूछा।
     बिलकुल जीत गया। पान का पत्ता  छोटा होता है पर इसमें बड़े गुण होते हैं। इससे दाँत मजबूत होते हैं। खांसी –जुखाम में यह फायदा करता है। इतने  गुणों के कारण ही यह सबसे बड़ा पत्ता  कहलाता है। राजा को ही नहीं यह सबको अच्छा लगता है। भगवान को भी अच्छा लगता है। पूजा के समय इसकी जरूरत पड़ती है।
      “हाँ याद आया----। गणेश भगवान जी को भी तो पान अच्छा लगता है दिवाली पूजन के समय गणेश-लक्ष्मी की फोटो पर पान पर चांदी का सिक्का रखकर चिपकाया गया था।“
     कहानी खत्म  होने पर मैं खुशी-खुशी पढ़ाई में जुट गई।
     पान की करामातें कहाँ तक गिनाऊं---। पान न खाने वाली मेरी माँ को तो इसने अपना गुलाम बना लिया। उपवास के दिन वे सारे दिन कुछ न खातीं, रात को ही भोजन करतीं पर खाली पेट पर पान खाना शुरू कर देती थीं। शाम तक बीस पान तो हो ही जाते थे वे भी तम्बाखू के साथ।
     इस तम्बाखू के कारण उनके पेट में जलन और गैस बनने लगी। जीभ पर  छाले और घाव हो गए। डॉक्टर ने साफ कह दिया-पान खाना नहीं छोड़ा तो गले का कैंसर हो सकता है। उस दिन से घर में पान खाने पर पाबंदी लग गई। मैं तो बड़ी खुश हुई हटी-गंदगी। पर माँ एक साथ तम्बाखू न छोड़ सकीं। चोरी-छिपे बाजार से मंगा ही लेतीं--- हाँ पान खाना जरूर कम हो गया। तम्बाखू के नशे ने अम्मा को बहुत कष्ट  पहुंचाया।
       सोच सोचकर मैं अधीर हो उठती –घर में सब पढ़े -लिखे,डॉक्टर भी घर के, तब भी तंबाकू जैसे निशाचर की छाया में रहने लगे हैं।
        हम नई पीढ़ी में किसी ने पानदान को घर में जगह नहीं दी। लेकिन पान तो पान ही है---- शादी-विवाह में 2-3 पान खाने से नहीं चूकते। माह में एक दो बार पनवाड़ी के चक्कर भी लगा आते हैं। पान को देख जीभ तो सभी की मचल मचल जाती है पर इसको हमेशा दिल से लगाना ठीक
नहीं। 
समाप्त 

मंगलवार, 20 मार्च 2018

यादों का सावन



॥2॥ भूत भूतला की चिपटनबाजी
सुधा भार्गव 

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        छुटपन में मुझे भूत -प्रेत की कहानियाँ बड़ी अच्छी लगती थीं । कथाओं में भूत मुझे कभी चमत्कारी बाबा लगते तो कभी जासूस तो कभी जादूमंतर जानने वाले जादूगर। सोचती कितना अच्छा हो कोई भूत मुझे मिल जाए—देखूँ तो कैसा होता है।  तइया दादी भूतों के किस्से सुना सुना कर तो हम भाई बहनों को अचरज में डाल देतीं।पर कभी कभी वे अपनी बात मनमाने के लिए  भूत का नाम कुछ इस तरह लेतीं कि हम कुछ पल को डर ही जाते और मुँह से निकाल जाता –दइया भूत ऐसा होता है।
      तइया दादी बाबा की ताई थीं। नाटी सी गोरी सी कमर झुकाए धीरे धीरे चलतीं। दाँत तो उनके एक भी नहीं था। चोरी छुपे हम उन्हें पोपली दादी भी कहते। बोलतीं तो आधी बात फुस से हवा की तरह निकल जाती। फिर भी हमें वे अच्छी लगती —हँसती तो प्यारी -प्यारी लगतीं।
      वे हमारे घर की कोतवाल थीं कोतवाल। मोटा मोटा चश्मा आँखों पर ,उसके नीचे मोटी- मोटी  आँखें ---बाप रे नन्ही सी चींटी भी उनकी पैनी निगाह से न बच पाए।  हर आने जाने वाले का हिसाब उँगलियों पर रखतीं और प्रश्नों की झड़ी लगा देतीं --कहाँ जा रहा है?क्या करने जा रहा है?कब तक लौटना होगा?
      एक शाम मैं जल्दी जल्दी दूध पीकर बाहर खेलने निकलने ही वाली थी कि पीछे से आवाज आई –“अरी छोरी मीठा दूध पीकर उछलती कहाँ जा रही हैं--नमक चाटकर जा वरना भूतला चिपट जाएगा भूतला।”
      एक मिनट को तो मेरे कदम रुक गए फिर साहस जुटाते पूछा-“दादी तुमने भूतला देखा है क्या?”
      “न—न- –भूत को कोई न देख सके पर वह सबको देख सके है। कभी -कभी भूतों के पैर दिखाई दे जावे हैं।हवा में भी फर्राटे से उड़े हैं।”
      “तुमने पैर देखे हैं क्या?”
     “देखे तो नहीं पर सुना है पैर उल्टे होवे हैं ।एड़ी आगे उँगली पीछे।” मैं नाक पर उंगली रख बुदबुदाने लगी एड़ी आगे उँगली पीछे-- एड़ी आगे उँगली पीछे। माँ कब-कब में उंगली से नमक चटा गई पता ही न चला। 
      “क्या हुआ !अब जा न बाहर खेलने।”
      “कहीं भूतला चिपट गया तो—मैंने आँखें झपकाते हुए कहा।”
      “अब कोई भूतला पूतला न चिपटेगा। नमक खा तो लिया।”
      मैं बाहर चली तो गई पर खेलने में मन नहीं लगा। सड़क पर किसी भी अंजान को जाते देख मेरी नजरें  उसके पैरों को टटोलने लगतीं  ---कहीं यह भूत तो नहीं---जरूर इसके पैर उल्टे होंगे। मगर उल्टे पैर वाला कोई मिला नहीं।
       खेलने के बाद बहुत भूख लगी थी सो सीधे रसोईघर में पहुंची। भाई छोटू वहाँ पहले से ही विराजमान था और इंतजार कर रहा था कब पहली रोटी तवे पर पड़े और कब उसे हड़प ले। मुझे देख नाक भौं सकोड़ी और बोला –“पहले मैं आया हूँ मिसरानी जी रोटी भी पहले मुझे ही देना””
      “खाना शुरू करेगा तो पाँच -पाँच रोटियों पर भी न रुकेगा।पूरा पेटू है पेटू। पहले मुझे दो।”  
     “ओह मुनिया झगड़ा न कर। पहले दो रोटियाँ छोटू को लेने दे। फिर तुझे दे दूँगी।”
      मन मसोसकर मैं अपनी बारी का इंतजार करने लगी। जैसे ही दूसरी रोटी मिसरानी ताई मेरे थाली में डालने लगीं छोटू चिल्लाया-जीजी को ही रोटियाँ दिये जाओगी क्या! अब मुझे दो।
      मैं परेशान हो उठी--क्या वास्तव में मैं कई रोटियाँ खा गई हूँ। पेट तो भरा नहीं। कहीं भूत तो मेरी रोटियाँ नहीं खा गया। जरूर वह मेरे पास बैठा हैं। उफ क्या करूँ!मैं तो उसे देख ही नहीं सकती। पैर भी नहीं दिखाई दे रहे। इस बार तो रोटी को मुट्ठी में कसकर पकड़ लूँगी और एक एक टुकड़ा तोड़कर खाऊँगी । फिर देखती हूँ बच्चू के हाथ कैसे लगती है रोटी। किसी तरह बस वह एक बार मुझे दिखाई दे जाय फिर तो उसे चिढ़ा -चिढ़कर खाऊँगी। कितने ही ख्यालों के बादल मुझपर मंडराने लगे।  नींद जैसे ही आँखों से झाँकी मैं भूत को एकदम भूल गई।
      छुट्टियों में चचेरे भाई  बहन आए हुए थे । उनके साथ हुल्लड़बाजी करने में बड़ा मजा आता। घर के बाहर पीपल का  बड़ा सा पेड़ था।उसके चारों तरफ पक्की चबूतरी बनी थी। हम उसके चक्कर पर चक्कर लगा छुआ- छाई खेलते। चबूतरी पर बैठे हँसते -खिलखिलाते और खुटटमखुट्टी कर बैठते। जब तक आड़ी(सुलह)न हो जाती घर न लौटते ।
       एक दिन इसी चक्कर में अंधेरा गहरा गया जबकि संझा होते ही घर लौटने का नियम था। पिताजी तो आँखें तरेरकर ही रह गए पर तइया दादी बोल उठी-“इतनी देर गए लौटे हो।तुम्हें मालूम है पीपल पर भूत रहता हैं। शाम को लौटते समय हो गई उससे मुठभेड़ तो ऐसा चिपटेगा ऐसा चिपटेगा कि उसकी पकड़ से छूट भी न सकोगे। बस चीखते रह जाओगे –बचाओ—बचाओ।”  
       हम गुमसुम से हो गए। दादी की बात बहुत दिनों तक दिमाग में छाई रही।  अंधेरा होते ही हम घर लौट आते।
       पिताजी तो खुशी से भर उठे। बोले –“तुम तो बहुत अच्छे हो गए हो। समय से खेलकर घर में आ जाते हो। ”
      “नहीं आएंगे तो भूत पकड़ लेगा।” मैंने कहा।
       “कौन बोला?”
       -तइया दादी।
      -तुम्हारी तइया दादी ने कहा !तइया अम्मा भी न जाने बच्चों से क्या -क्या कहती रहती है। बच्चों भूत-प्रेत कोई नहीं होता जाओ यहाँ से। वे झल्ला पड़े।
       तइया दादी झकर-झकर झुकी-झुकी आन पहुंची –“क्या कहे है--- भूत न होवे? मैं कहूँ --होवे है।पढ़ लिख गया तो मेरी कोई बात पर विश्वास ही न करे हैं।  मैं तो पैदा होते ही सुनती आई हूँ भूत—भूत । भूत न देखा पर कुछ तो सच होगा ही। ” दादी भुनभुनाती रह गई।
     पिताजी न ही दादी को भूत की सच्चाई समझा सके और न हमें ही बता सके। सोचा होगा दादी अनपढ़ है और हम बच्चे नासमझ।इनसे माथापच्ची करना बेकार है। समझदार होने पर भी मैं दादी का भूत भुला न सकी। हमेशा सोचती रहती दादी की कही बातों में कुछ तो सच्चाई जरूर होगी। आठवीं कक्षा में जाते जाते भूत से पर्दा उठ ही गया।
      बच्चों,मुझे पता लगा कि भूत –प्रेत तो कोरी कल्पना ही है। एक तरह से दादी की बातों में वैज्ञानिक सच छुपा है। उनके समय ज़्यादातर लोग अनपढ़ थे। वे विज्ञान की भाषा नहीं समझ सकते थे। पर स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए एक अज्ञात काल्पनिक आकृति भूत की ओट में कुछ उक्तियों  का प्रचलन हो गया जिसे सुनकर ही लोग कानों से ग्रहण करते थे और उस पर चलते थे। वे विचार पीढ़ी दर पीढ़ी बहते रहे और उन्हें मानने की प्रथा चल पड़ी।  दादी भी उनमें से एक थीं जिन्हें भूत-प्रेत की बातें बचपन से सुनने को मिली थीं। वे उनके खूनमें इतना रम गई थीं कि उनको सच मान बैठी थीं। नमक चाटकर जाओ दादी ने ठीक ही कहा था। चीनी दांतों को नुकसान पहुँचाती है। मीठा दूध पीकर बाहर जाने से मिठास का असर काफी देर तक दांतों में रहता  है इससे उनके खराब होने का डर पैदा हो जाता है।
       सुबह के समय पेड़ पौधे-आक्सीजन निकालते हैं और कार्बन ग्रहण करते है। पर रात के समय वे इसका उल्टा करते हैं। मतलब आक्सीजन ग्रहण करते हैं और कार्बन निकालते हैं। रात को उनके नीचे या आसपास रहने से कार्बन ही मिलेगी जो हमारे लिए जहर है। हमारा जीवन तो आक्सीजन है। इसी कारण तइया दादी ने कहा था- साँझ होते ही घर लौट आना।
       मैं न दादी को गलत कह पाती हूँ और न पुरानी मान्यताओं को । पर इतना जरूर है कि हमें उन्हीं बातों पर विश्वास करना चाहिए जो तर्क संगत हों। बिना सोचे समझे लकीर की फकीर पीटना तो अंधविश्वास हो गया।
समाप्त