नये वर्ष की नई अभिलाषा ----

बचपन के इन्द्र धनुषी रंगों में भीगे मासूम बच्चे भी इस ब्लॉग को पढ़ें - - - - - - - -

प्यारे बच्चो
एक दिन मैं भी तुम्हारी तरह छोटी थी I अब तो बहुत बड़ी हो गयी हूं I मगर छुटपन की यादें पीछा नहीं छोड़तीं I उन्हीं यादों को मैंने कहानी -किस्सों का रूप देने की कोशिश की है I इन्हें पढ़कर तुम्हारा मनोरंजन होगा और साथ में नई -नई बातें मालूम होंगी i
मुझसे तुम्हें एक वायदा करना पड़ेगा I पढ़ने के बाद एक लाइन लिख कर अपनी दीदी को अवश्य बताओगे कि तुमने कैसा अनुभव किया I इससे मुझे मतलब तुम्हारी दीदी को बहुत खुशी मिलेगी I जानते हो क्यों .......?उसमें तुम्हारे प्यार और भोलेपन की खुशबू होगी -- - - - - -I

सुधा भार्गव
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गुरुवार, 27 अगस्त 2020

 

बचपन का सावन 

                                                                         प्रकाशित 

बरसात की रिमझिम

सुधा भार्गव

      मुझे हमेशा से ही बादलों ने रिझाया। छुटपन में बादलों को देखते ही छत पर चली जाती। नीले आकाश में बादलों की आँख-मिचौनी देखा करती। । बादलों के झुंड मुझे रेशम से चमकीले, रुई से मुलायम लगते। उन्हें देखते-देखते कल्पना की निराली  दुनिया में खो जाती। कभी मुझे नन्हें खरगोश से बादल आकाश में फुदकते नजर आते तो कभी हाथी का बच्चा अपनी सूढ़ हिलाता लगता।

      बरसात की रिमझिम बारिश  देख इंतजार करती कब बादलों से बड़ी -बड़ी बूंदें टपकें। टपकती बूंदों को देख मैं अपनी हथेली फैला देती। मोती सी चमकती बूंदों को मैं लपकना चाहती थी  । पत्तों पर ठहरी बूंदों को देख तो मेरे चलते चलते कदम भी रुक जाते। एकटक उनकी सुंदरता अपनी आँखों में भरने  लगती। देखते ही देखते बादल गरजते चीखने लगते। पटापट बरसने की आवाज से मुझे लगता लगते वे गुस्से से पागल हो गए हैं। । इतना सब होते हुए भी मेरा मन मचल उठता –“चल चल घर से बाहर जाकर नहाते हैं। ऐसी  मस्ती के समय घर में दुबककर क्या बैठना!” जैसे ही घर से पैर रखती, माँ न जाने कहाँ से आ जाती और अंदर खीचती बोलती-“ बीमार होने का इरादा है?” कभी कभी तो मुझे लगता –माँ की दो नहीं दस आँखें हैं। इसी कारण उसे हम भाई-बहनों की पल -पल की खबर होती है।

       बरसाती मौसम मेँ घर मेँ अकसर सरसों के तेल मेँ पकौड़ियाँ तली जातीं । पकोड़ियाँ कभी मूंग की दाल की होतीं तो कभी बेसन आलू की । चटनी के साथ खूब छककर खाते-----अरे छककर क्यो?—कहना होगा ठूंस ठूंस कर खाते। हम भाई-बहन मेँ कंपटीशन होता –देखें कौन ज्यादा खाता हे! सबसे खास बात तो उस दिन दूध से छुटकारा मिल जाता था। वरना रोज दूध भरा गिलास हमारे सिर पर सवार हो कहता—“पीयों—पीयो---मुझे पीयो।’’ 

       एक बार सारी रात पानी बरसता रहा। सुबह आँख खुली । काले बादलों की  घडघड़ाहट और दूर -दूर  तक घुप्प अंधेरा! दिल बल्लियों उछल पड़ा। आह आज तो स्कूल की टनटनानन  छुट्टी---! ज़ोर से चिल्ला उठी-बरसो राम धड़ाके से,बुढ़िया गिरे पटाके से।  फिर मुंह ढककर सो गई। सुबह की मीठी नींद पलकों पर आकर बैठी ही थी, माँ ने इतनी ज़ोर से झझोड़ा कि सीधे उठते ही बना। कान के पर्दों को चीरती एक ही आवाज –स्कूल नहीं जाना क्या?उठ जल्दी।” ।

        ऊपर नजर घुमाई –बादल तितर- बितर हो चुके थे। साथ मेँ अंधेरा भी ले गए। बहुत गुस्सा आया –स्कूल की छुट्टी होते होते रह गई। बादलों ने तो धोखा दे दिया।

     ठंडी हवा में थिरकती मैं स्कूल चल दी । रास्ते में सूरज की रोशनी मेँ पत्तों पर बूंदें मोती की तरह चमकती दिखाई दीं। मैं उनकी तरफ खींची चली गई । मैंने धीरे से छुआ ही था कि वे तो पानी की तरह बह गई । बड़ा दुख हुआ। बाद मेँ मैंने फिर कभी उन्हें छूने की कोशिश नहीं की।

      स्कूल से लौटते समय उस दिन  देर हो गई । रास्ते भर रेंगते- रेंगते जो जा रही थी । जहां थोड़ा सा पानी भरा देखती छ्पाक- छपाक करती वही से निकलती।चप्पलें कीचड़ से भर गई। फ्रॉक पर काले छींटे पड़ गए। पर मैं इस सबसे लापरवाह थी।   ज्यादा पानी देखती तो कागज की नाव बनाकर उसमें छोड़ देखती रहती ---देखती रहती--। मन करता मैं भी छोटी  सी नाव बन इसका पीछा करूँ। उफ घर मेँ तो इतने बंधन –मानो मैं मिट्टी की डली होऊं और पानी मेँ गल जाऊँगी।

     अचानक बादल का एक टुकड़ा मुझसे टकराया और उसका मोटा पेट फट पड़ा।

     “मैं गरज पड़ी-ए मोटू यह तूने क्या किया!मेरे सारे कपड़े भिगो दिये । अभी तक तो ऊपर से पानी डालता था अब हमारी धरती पर भी कब्जा जमाने की सोच रहा है।’’

     “अरे नहीं मुन्नो !मैं तो ऊपर ही खुश हूँ।  हवा को न जाने क्या शैतानी सूझी कि सरपट इतराती दौड़ने लगी ।  उसके झोंकों में झूलते-झूलते खट से नीचे आन गिरा।  तुमसे टकराते ही मैं फट पड़ा और अंदर का पानी तुम पर लुढ़क पड़ा।  अब बताओ मेरा क्या कसूर!”

     “तेरी नहीं तो क्या मेरी गलती है। घर पहुँचने में वैसे ही देरी हो गई है। कोई बहाना भी नहीं बना सकती । माँ की आँखें तो वैसे  ही दिन रात जागकर  मेरी  जासूसी करती रहती है।  भीगे कपड़े देख मेरी  चोरी पकड़ी जाएगी।एकदम समझ जाएंगी पानी में आप जानकर भीगी हूँ ।’’  

     “हा—हा-हा-हा---मुनिया चोरी तो वैसे भी पकड़ी जाती।’’ फ्रॉक पर पड़े काले छींटे को अपना मज़ाक उड़ाते देख मन किया इसका मुंह ही नोच लूँ पर ऐसा करने पर तो मेरा फ्रॉक ही फट जाता । क्या करती ---बस दाँत पीसकर रह गई।

     “अरे भोली मुन्नो –इस कल्ले छींटू की बात का बुरा न मान । यह है ही ऐसा । तेरी चोरी पकड़ी गई तो क्या हुआ !ज्यादा से ज्यादा डांट ही तो पड़ेगी। सह लेना। माँ तो तेरा हमेशा भला चाहती है। इसीलिए तो डांटती है और उसकी डांट भी तो प्यार से लबालब होती है।’’

डरते डरते मैंने घर में कदम रखा । सामने माँ को खड़ा देख सकपका गई।

     “आ गई ---लाडो---कीचड़ में नहाकर ! बहुत आजादी मिल गई है। कान खोलकर सुन ले ,इस बार बीमार पड़ गई तो तेरे पास फटकूंगी भी नहीं।’’

     मैं एकदम खामोश थी। मोटू बादल की बात कानों में गूंज रही थी और मुझे सच में माँ की डांट में प्यार नजर आ रहा था। अब तो ऐसी डांट के लिए तरस कर रह गई हूँ।

समाप्त

 

    


शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

समीक्षा - मनोहर चमोली मनु


 जब मैं छोटी थी 
बाल उपन्यास
सुधा भार्गव  

मनोहर चमोली जी –Face book से साभार




'जब मैं छोटी थी' में दिखेगा बचपन
-
मनोहर चमोली मनु
सुधा भार्गव कृत संस्मरणनुमा बाल उपन्यास जब मैं छोटी थीडाक से मिला। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने इसे प्रकाशित किया है। जानी-मानी लेखिका और बाल मन की जानकार सुधा भार्गव पेशे से शिक्षक रही हैं। सतहत्तर वर्षीय सूधा भार्गव की कई किताबें प्रकाशित हैं। बीस बचपन से जुड़ी बातों,यादों और घटनाओं को आत्माभिवयक्ति शैली में लेखिका ने करीने से पिरोया है।
अमूमन सभी किस्से पाँच से छःह पेज में समेटे गए हैं। देशकाल और वातावरण की बात करें तो ज़ाहिर सी बात है कि लेखिका ने चालीस और पचास के दशक में जिए अपने बचपन की खट्टी-मीठी यादों को इस उपन्यास का आधार बनाया है।
इक्कीसवीं सदी हो या बीसवीं या सत्रहवीं। हर काल खण्ड का अपना विशिष्ट बचपन होता है। लेकिन दुनिया जहाँ के बचपन के किस्से कितने ही विरले हों, उनमें मस्ती,मासूमियत,खिलंदड़ी,प्रेम,संवेदनाएं,नाराज़गी, गुस्सा, चंचलपन,कल्पना की असीमित और गहरी थाह लिए उड़ान तो होगी ही। ऐसा ही इस किताब में हैं।
पाठक पढ़ते-पढ़ते अपने बचपन में लौट जाता है। सिर्फ़ लौटता ही नहीं उसे पुनः जीने लगता है। उसे किताब पढ़ते-पढ़ते बचपन के वे सब कृत्य याद आने लगते हैं जब उसे स्वयं हँसी आई हो या वह स्वयं हँसी का कारण बना हो। बचपन की अठखेलियाँ,हँसी-ठट्ठा, छिटपुट चोरियाँ, मार-पिटाई,रसोई से लेकर स्कूल तक खाने-पीने के किस्से, राजा-रानी के खेलों से लेकर गुड्डा-गुड़ियों के खेल तलक की यात्रा में फिर से यात्री बनने का मन किसका नहीं करेगा?
दूध-मलाई से लेकर चाट-पापट, आम-पापड़, इमली से लेकर रसीले आम। खेलों की दुनिया में लूडो,कैरम और सांप-सीढ़ी हैं। लट्टू है। गुल्ली-डण्डा है। पेड़,पहाड़ और नदियों की मस्ती। रेजगारियों से की गई खरीददारी, पतंगबाजी से लेकर खो-खो हो या दोड़-भाग। सैर-सपाटा हो या पड़ोस में सखी-सहेली-दोस्तों के साथ नोंक-झोंक,पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ बचपन की चुलबुली गलतियां किसे रह-रह कर याद नहीं आती होंगी? फिर जब ऐसे किस्सों से भरी किताब पढ़ने का मौका मिले तो ऐसा लगने लगता है कि जैसे कल ही तो हमारा बचपन हमारी मुट्ठियों में था।
यह तय है कि यह जब मैं छोटी थी का पाठक बच्चा हो या नोजवान या फिर प्रौढ। हर किसी का संसार इस में हैं। दिलचस्प बात यह है कि लेखिका की दो दृष्टि से मुलाकात करने का अवसर पाठक को मिलता है। पहला लेखिका के बचपन के अहसासात,अनुभव और कृत्य। दूसरा लेखिका पचास-साठ-पेंसठ साल पहले जी चुके बचपन को याद करते हुए अब उस दौर के बड़ों से आज बड़ी होकर अपनी भावनाओं का प्रकटीकरण।
पात्रों में स्वयं छुटपन की लेखिका है। डाॅक्टरी परिवार है। अम्मा-पिताजी हैं। डाॅक्टर बाबा हैं। पड़ोसी रक्का है। हलवाई है। अध्यापक हैं। अध्यापिका है। छोटा भाई है। चाचा हैं। सहपाठी हैं। दोस्त हैं। सहेलियां हैं। धोबी काका हैं। नायन ताई है। अनूपशहर के बन्दर हैं। यह पात्र पाठकों के ज़ेहन में जगह बना लेते हैं।
चरित्रों में भी लेखिका के समय के मानवीय मूल्य सामने आते हैं। जिसमें सहयोग, सहायता, काम के प्रति कर्मठता,जीवटता परिलक्षित होती है। सखा भाव के मानवीय संवेग महसूस होते हैं। प्रकृति के साथ-साथ जीवों के प्रति मानवीय व्यवहार के दर्शन होते हैं। सुख है। दुःख है। मानवीय मूल्यों की झलक है।
जब मैं छोटी थीकी भाषा-शैली सरल है। सहज है।
कुछ उदाहरण आप भी पढ़िएगा-
एक-अचानक तूफान आया-सुधा,खड़ी हो जाओ।
मैं खड़ी हो गयी।
कान उमेठती हुई बोली-मैं पढ़ा रही हूँ और तुम कर रही हो बात-इतनी हिम्मत।दूसरे हाथ से चटाक। बिजली गिर चुकी थी। एक चाँटा मेरे गाल पर जड़ दिया।
(
क्यों मारा,पेज 14)
दो-टन-टन टनाटन-छुट्टी हो गयी। दिल भी बाग-बाग हो गया। विश्व विजेता की तरह गर्व से टाट के नीचे से प्यारी चप्पलें खींची,पहलीं और इस बार-मैं भर रही थी हिरन-सी चैकड़ी। पीछे-पीछे मुँह लटकाए दया धीरे-धीरे चल रही थी। डगमगाती-सी दुखी-सी।
(
चप्पल चोर,पेज -24)
तीन-मास्साब, मेरी कहानी?’
अभी तो मैं घूमने जाऊँगा। कल जरूर सुना देंगे।
लेकिन आज की कहानी।
मास्टर जी पसीज गए,मुस्कान बिखेरते बोले-ठीक है,शाम को आ जाना।’ (पहले कहानी,फिर बनूँगी रानी,पेज 26)
चार-दिन में कुछ ऊटपटाँग खाया क्या!
मैंने तो मुँह भींच लिया पर मुन्ना बोल पड़ा-
पिताजी इमली खायी थी।
डनका गुस्सा तो आसमान तक चढ़ गया-
न जाने क्या-क्या खाते रहते हैं-दुबारा खाँसी तो निकाल दूँगा कमरे से।
(
खट्टी-मीठी इमली,पेज 30)
पाँच- मैं जब छोटी थी, पढ़ती कम, खेलती ज्यादा। पर पिताजी का अरमान-मैं खूब पढ़़ूँ-पढ़ती जाऊँ। वह भी बिना ब्रेक लिये। दादी की असयम मृत्यु के कारण उनकी पढ़ाई में बहुत अड़चने आयीं। किसी तरह वे बनारस से बी फार्मा कर पाय। अब मेरे द्वारा अपनी इच्छायें पूरी करना चाहते थे। पर मेरी तो जान पर बन आयी।
(
सबसे भली चवन्नी,पेज 66)
आवरण पाठक वय-वर्ग के स्तर पर लुभाता है। काग़ज़ उम्दा है। छपाई शानदार है। फोंट बेहतर है। फोंट का आकार पाठकों की आयुनुसार रखा गया है। श्वेत साफ काग़ज़ पर श्याम रंग उभरता है। आँखों को सकून देता है। कुछ एक अनुच्छेदों को छोड़ दे ंतो लेखिका ने वाक्य विन्यास में सतर्कता बरती है। संयुक्त वाक्यों से परहेज किया गया है। यह अच्छी बात है। हर याद,घटना,बात और प्रसंग एक लय से आगे बढ़ते हैं और पाठक को उलझाते नहीं।
कुल मिलाकर दस से बारह साल के पाठकों के लिए तैयार यह उपन्यास सभी वय-वर्गो के पाठकों को पसंद आएगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि धीरज सोमबासी के बीस से अधिक रेखांकनों से सजी यह किताब बाल साहित्य जगत में रेखांकित होगी।
पुस्तक: जब मैं छोटी थी
लेखिका: सुधा भार्गव
मूल्य: 55.00 रुपए
पेज संख्या: 114
प्रकाशक: राष्ट्रीय पुस्तक न्यास,भारत
आइएसबीन: 978-81-237-8685-8
पहला संस्करण: 2018
समीक्षक: मनोहर चमोली मनु
www.nbtindia.gov.in
mail-nro.nbt@nic.in


शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

बचपन का सावन




 ॥8॥ मास्टरों की भीड़
सुधा भार्गव 


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     बचपन में मुझे भीड़ से बहुत डर लगता था। हमेशा सोचती - धक्कामुक्की में मैं गिर जाऊँगी और कुचल दी जाऊँगी। रामलीला होती तो देर से जाना पसंद करती और सबसे पीछे ही बैठती चाहे दिखाई न दे। खतम होने के 15 मिनट पहले ही उठने की जिद करने लगती।
      कार्तिक के महीने में एक मेला लगता था। कड़ाके की ठंड में ज़्यादातर लोग धूप से शरीर सेकते मेले में  घूमा करते और रात में जल्दी ही लिहाफ में दुबक जाते।पर मैं काफी रात गए  कहती – “मैं तो मेला देखने जाऊँगी।’’अम्मा गुस्से में दाँत पीसतीं –“उल्लू है उल्लू पिछले जन्म की।” पिताजी मुझे लेकर जाते तो पर मैं बड़े नुकसान में रहती। वे तो बुंदे ,माला, चूड़ी कुछ नहीं खरीदवाते।हाँ,पहले से टिकट मँगवाने के कारण  सर्कस जरूर उनके साथ आगे बैठकर देखने को मिलता । और तो और जब स्कूल की तरफ से नुमाइश देखने बुलंदशहर जाती तो चाट पकौड़ी को देख मुँह में पानी भर आता, पर ठेले के पास जाने की हिम्मत न जुटा पाती कि कहीं भीड़ का भूत मेरे चिपट न जाए। एक कोने में खड़ी इंतजार करती रहती -- कब भीड़ छटे और कब मैं गोलगप्पे खाऊँ पर मेरा तो नंबर ही न आता। मन मारकर मैं वहाँ से चल देती। लेकिन जब कुछ-कुछ ऐसी ही भीड़ ने मेरे घर में मुझ पर ही धाबा बोल दिया तो मैं उसमें बचकर कहाँ जाती----- वह थी मास्टरों की भीड़ ।
       व्यवसाय के चक्कर में पिताजी को न खाने की सुध रहती और न सोने की। माँ----!वे तो बस छोटे भाई –बहनों की होकर रह गई थीं। अब मुझे पढ़ाये कौन! उसकी कमी पूर्ति के लिए उन्होंने मेरे चारों तरफ मास्टर जी की  भीड़ जुटा दी । वे हमेशा मेरी  तरफ बंदूक ताने खड़े रहते। इंगलिश अवश्य पिताजी पढ़ाते थे। उन्हें उर्दू और अँग्रेजी ही आती थी। हिन्दी मैं तो मैं ही उनको हरा देती। मैं कभी अपने अंग्रेज़ मास्टरजी मतलब पिता जी की तरह कभी खटखट अँग्रेजी नहीं बोल पाई।इसलिए उन्होंने फिसड्डी कूढ़मगज  ---न जाने क्या क्या नाम रख दिए। करती भी क्या!जब ज़ोर से डांटते तो सारे शब्द हलक में फंस जाते । मुझे जब भी खाली देखते तो कहते –“अँग्रेजी का अखबार भी पढ़ो।बिना अँग्रेजी सुधारे कुछ नहीं होगा---।’’ मैं चिढ़ जाती। जितना वे कहते उतनी ही मैं उससे दूर होती गई। वैसे मुझे उनकी बात न मानने का बड़ा पछतावा रहा। जब मैंने अपने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तो पहले अपनी अँग्रेजी ही सुधारनी पड़ी।
       पहली कक्षा से ही कृपा शंकर मास्टर जी घर पर पढ़ाने के लिए आने लगे । वे मुझे बड़े अच्छे लगते –गोरे –गोरे बड़े हंसमुख। सबसे बड़ी बात वे पिता जी से मेरी शिकायत नहीं लगाते थे और उन्हें ढेर सी कहानियाँ आती थीं-जादू की,परियों की,राजा रानी की---। उनसे कहानी सुनते -पढ़ते डेढ़ घंटा तो बीत ही जाता। पिताजी बड़े खुश –मास्टर जी एक घंटे की जगह डेढ़ घंटे बड़ी मेहनत से पढ़ा रहे हैं।बस मास्टर जी के लिए चाय- नाश्ता दौड़कर चला आता । वे भी खुश ,पिता जी भी खुश और मैं भी-- हा—हा --।
      कक्षा 5 तक तो समय बहुत अच्छा कटा । वे आते रहे और मैं अपना गृहकार्य करती –कराती रही। कक्षा 6 में आते –आते वे हारमोनियम और तबला भी सिखाने लगे। बाबा मेरा गाना सुनते समय मुसकाते ही रहते थे। ऐसे अवसर पर तुरंत उनके सामने हाथ पसार देती –बाबा मेरा इनाम ।मतलब अधन्ना -चौबन्नी कुछ मिल जाएँ तो चूरन –चुस्की की बहार आ जाए। एक दो- गाने तो अब भी मेरे जीभ पर आलती पालती मारे बैठे हैं –‘पायोरी मैंने राम रत्न धन पायो’---‘दया कर दान भक्ति का हमे परमात्मा देना।‘गाने का अभ्यास छूट चुका है पर यादों की महानगरी में ये गूँजते रहते हैं।  
      अब लड़की होकर नृत्य शिक्षा से कैसे वंचित रह सकती थी । इसकी कमी पूर्ति चाची ने कर दी। एक ग्रामोफोन और कुछ रेकॉर्ड्स खरीदे गए । उस समय कुछ गाने बहुत प्रसिद्ध थे –चुप –चुप खड़े हो जरूर कोई बात है ,जिया बेकरार है --,मोहे पनघट पै नंदलाल--। मतलब समझ में आए न आए पर चाची के इशारों पर खूब ठुनकती।  घर वाले मंद मंद मुसकाते –आह बैजंतीमाला ठुमक रही है। इस तरह इंगलिश गुरू -संगीत मास्टर और नृत्य मैडम के चक्र व्यूह में मैं अच्छी तरह फंस गई थी ।
      जैसे जैसे बड़ी होने लगी मास्टरों की भीड़ भी बढ़ने लगी। आठवीं कक्षा में पहुँचते ही एक गुरूदेव और आने लगे-सिद्धजी । गेरुए कपड़ों में वे सिद्ध पुरुष ही लगते थे । वे एक दिन मेरे डॉ बाबा के पास इलाज कराने आए। बाबा को पता लगा कि वे मेरठ स्कूल से रिटायर होकर आए है तो बोले –“आप हमारी पोती को पढ़ाइए। आपका मन भी लग जाएगा और आमदनी भी हो जाएगी। अपने को रिटायर न समझिए।’’ उन पर बाबा इतने मेहरबान हुए कि बस पूछो मत!---उनका  लंच भी बांध दिया । आते---- खूब खाते  और खूब पढ़ाते । मगर उनकी यह खूबी मुझे ले डूबी । घर वाले उनकी प्रशंसा के पुल बांधते पर मेरे दिल पर क्या गुजरती है कोई पूछने वाला न था । गणित पढ़ाते थे। पर न जाने कैसा पढ़ाते थे—मुझे तो लगता है उन्हें पढ़ाना ही नहीं आता था। तभी तो पास होने लायक ही अंक आकर  रह जाते।   
     अपने एक मास्टर जी को तो भूले ही जा रही हूँ । वे थे टेलर मास्टर जी मास्टर चन्दा । ये हमारी महरी काकी के मझले बेटे थे । कक्षा 10 में होम साइंस अनिवार्य थी । उसमें खाना बनाना ,कपड़े धोना और सिलाई मुख्य विषय थे । आते -जाते घर में ही लेक्चर पिलाए जाने लगे  –कपड़े ऐसे धोते हैं ,हलुआ ऐसे बनता है । टेलर मास्टर जी का तो आना शुरू हो ही गया था –सब सीखा---कुर्ता ,पाजामा ,कमीज ,ब्लाऊज ,फ्रॉक--- पर आया केवल पाजामा सीना । प्रैक्टिकल फाइल में  सिले कपड़ों के सेंपिल मास्टर जी ने बना दिये थे। बस उनकी मेहरबानी से खूब सारे नंबर लूट लिए।  
     मास्टरों की लाइन के पीछे पिता जी की कमजोरी छिपी थी। दादी उन्हें तीन या चार वर्ष का छोडकर भगवान को प्यारी हो गई थीं । वे बहुत पढ़ना चाहते थे मगर बनारस से बी॰ फार्म॰ करके ही रह गए । आत्मनिर्भर होने पर उन्होंने ठान लिया  कि वे अपने बच्चों को खूब पढ़ाएंगे चाहे वह लड़का हो या लड़की । वे अपनी जगह ठीक थे पर क्या मैं मेधावी छात्र बन सकी ?नहीं !इतना थक जाती थी कि दिमाग की चक्की एकदम ठप्प ही समझो।  एक काम पूरा नहीं हो पाता था कि दूसरा शुरू । पता लगा सब अधूरा ही सीखा मास्टरी किसी में भी हासिल न कर पाई ।
       अभी तक मैं यही सोचती थी कि भगवान न करे कि कोई बच्चा मास्टरों की भीड़ में खो जाए । पर मैं  जिस माहौल में रह रही हूँ वहाँ अनेक बच्चे इस दलदल  में फंसे हैं । माँ –बाप दोनों ही नौकरी के कारण बच्चों को समय नहीं दे पाते , पर उन्हें  हर तरह से योग्य बनाना चाहते हैं । हिन्दी ट्यूशन के लिए जाते समय बच्चे को  चिंता रहती है गणित ट्यूशन को देर न हो जाए । गणित ट्यूशन को जाते समय टेबल टैनिस की कोचिंग क्लास की चिंता रहती है । छुट्टी के दिन ड्राइंग क्लास ,डांस क्लास ,गिटार क्लास भी सीखना जरूरी है । माँ –बाप में होड़ सी लगी है –मेरा बच्चा यह सीखने जाता है,मेरा बच्चा यह सीखता है --। न बच्चे को खाने का समय न आजादी से सांस लेने का समय । आजकल तो वैसे भी स्कूल पढ़ाई का बहुत बोझ और तनाव  है । क्या मासूम बच्चे इस समस्त बोझ को अपने नाजुक से कंधों पर उठाते हुए माँ –बाप की आकांक्षाओं की कसौटी पर खरे उतर सकेंगे !कहीं समय से पहले ही तो बच्चों का बचपन विदा नहीं हो रहा है!ऐसे अनगिनत प्रश्न मन मेँ हलचल मचाये रहते हैं।
समाप्त 

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

बचपन का सावन




॥7॥  तमंचे का जादू  
सुधा भार्गव 


      झबलू नगर में छ्ब्बू और छबीली रहते थे । दोनों भाई-बहन बड़े शैतान थे। न जाने कब क्या गुल खिला दें । जरा –जरा सी बात पर झगड़ पड़ते। पर तब भी दोनों में बड़ा प्यार था ।  छब्बू के पास हरी, लाल,सफेद , धारियों वाला लकड़ी का एक लट्टू था जो देखने में बड़ा सुंदर था। 


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 छब्बू  उसके चारों तरफ डोरी लपेटता। फिर  डोरी को अपनी उंगली में फँसाकर लट्टू को ज़ोर से जमीन पर फेंकता।  बस शुरू हो जाता अपनी कीली पर गोल गोल उसका घूमना  ।  
इतना ही नहीं  लट्टू को छब्बू  एक कुशल कलाकार की तरह  फुर्ती से अपनी हथेली पर रख लेता।   वह फिर नाचता ही रहता----  नाचता ही रहता। छबीली को अपना भाई एक बाजीगर लगता। वह उसे  एकटक निहारती । उसकी इच्छा होती कि वह भी उसकी तरह लट्टू घुमाये पर छब्बू! छब्बू  तो उसे छूने ही नहीं देता। वह गिड़गिड़ाती –“भैया बस एक बार दे दे।‘’ ज़ोर से चिल्लाता छब्बू  –नहीं-- । छ्बीली  सहम जाती और रोने लगती। मजाल है भाई का दिल पसीज जाए।
    छबीली अपने पापा की लाड़ली शहजादी थी। कोमल- कोमल गालों पर पट-पट  बहते आँसू उनसे न देखे गए। अपनी बेटी को खुश करने के लिए वे दिल्ली से एक विचित्र सा लट्टू ले आए है। शायद उसका बार -बार का रोना उनसे न  सहा गया। बोले-“अब तुझे न घड़ी -घड़ी रोने की जरूरत है और न अपने शैतान भाई से लट्टू मांगने की जरूरत ।चल तुझे लट्टू देता हूँ । फिर  मिलकर लट्टू घुमायेंगे।’’
      "हाँ प्यारे पप्पू ऐसा घुमाएंगे ---ऐसा घुमाएंगे कि भैया देखते ही रह जाएगा। उसे तो मैं छूने  ही नहीं दूँगी।" एक पल को छ्बीली की  आँखें चमक उठीं। 
      पर जल्दी बुझ सी गई। बोली-“लट्टू---!लट्टू तो मुझे घुमाना ही नहीं आता।’’
      “मैं तो जादू का लट्टू लाया हूँ। उसे तू खूब घुमाएगी---गोल—गोल घुमाएगी। उसके साथ तू भी खुशी के मारे गोल-गोल घूमेगी। ’’ पापा ने मुसकाते हुए कहा।
      “सच में पापा !क्या मुझे लट्टू घुमाना आ जाएगा?”
      “हाँ –हाँ  क्यों नहीं?कोशिश करने से क्या नहीं हो सकता!” छ्बीली का चेहरा गुलाब सा खिल उठा।  वह लट्टू देखने को लालायित हो उठी।
     पापा ने अलमारी से एक तमंचा निकालकर उसके हाथों में रख दिया । छबीली तो धक्क से रह गई। घबराहट में मुंह से बस निकला-‘तमंचा’। दूसरे ही पल तमंचा पापा की ओर बढ़ते बोली- “न –न मैं नहीं लेती इसे । गलती से इसका बटन दब गया तो निकल पड़ेगी गोली।”
      “घबरा ना  !यह तमंचा जैसा लग रहा है पर इसका बटन दबाने से एक लाल-नीली  रोशनी फैलाता लट्टू निकलेगा और जमीन पर बड़ी तेजी से घूमने लगेगा।ले चला लट्टू ।’’
      अविश्वास से पापा की ओर देखा । डरी-डरी सी बोली “-नहीं!नहीं --पहले आप तमंचा चलाकर दिखाओ।”
   पापा के बटन दबाते ही एक नीला लट्टू उछलकर जमीन  पर आ गया और अपनी आँखें मटका -मटका कर घरर—घरर घूमने लगा। छबीली आश्चर्य से भर उठी-“अरे इसके  लिए तो डोरी की भी जरूरत नहीं  पड़ी। अरे  इसके तो दो हाथ भी  हैं।" कमर झुका कर   वह उसके चारों तरफ आँखें घुमाती ,कहीं यह करामाती लट्टू ठप्प तो  नहीं हो गया   पर वह तो घूमता ही रहा –घूमता ही रहा । थकने का नाम नहीं। फिर तो छबीली का मन भी हरर- हरर करता झूमने लगा। उसे लगा मानो लट्टू कोई मीठा गाना गा रहा है। लट्टू के रुकते ही उसे फुर्ती से उठा लिया-“आह मेरा प्यारा लटुआ!’’ मचल उठी “–पापा जल्दी दो मेरा लटुआ । अब  मैं घुमाऊंगी।’’ उतावलेपन से पापा  के हाथ से तमंचा खींचने लगी।
     “अरे रुक ,पहले तमंचे में लट्टू तो फँसाने दे।’’
      छबीली में इतना सब्र कहाँ! बेताबी से उसने खींच ही लिया  और पूरे ज़ोर से क्लिक करते बटन दबाया। लट्टू पहले से भी ज्यादा उछल -उछलकर अपने करतब दिखाने लगा। मानो वह सर्कस का जोकर हो। अब तो वह छ्बीली का दोस्त बन गया ।
     शाम को वह बड़ी शान से तमंचे वाला लट्टू लेकर घर से  निकल पड़ी। वह अपने साथियों को उसे दिखाकर अचरज में डाल देना चाहती थी।
    रास्ते में उसकी सहेली कम्मो मिल गई। उसे जल्दी जल्दी जाता देख पूछ बैठी-  “अरे –रे –रे—छबीली  कहाँ चली। और यह तेरे हाथ में क्या है—तमंचा –बाप रे किसी को मारने का इरादा है क्या ?
     “नहीं री कम्मो! यह तमंचा जरूर है पर जादू का है।’’
    “जादू का --। कम्मो अचरज से अपनी बड़ी -बड़ी पलकें झपकाने लगी।
       “तो मुझे दिखा न इसका जादू।’’
      “इसकी एक और खासियत है। तमंचे के ऊपर जो लट्टू बैठा है उसके बिना तमंचा अपना जादू नहीं दिखाता।’’
      “ओफ तो देरी किस बात की। कह न इससे दिखाये अपना जादू !’’
      छबीली  ने खटाक  से तमंचे का क्लिप दबाया, फटाक से रंगबिरंगा एक मोटा सा लट्टू जमीन पर कूद पड़ा। उसने  अपने पतले से दोनों हाथ फैलाकर गोल -गोल चक्कर लगाने शुरू कर दिये। कम्मों को तो वह बड़ा प्यारा सा नचइया लगा । उसके भी पाँव थिरकने शुरू हो गए। कम्मों तो थक गई पर लट्टू तो नाचता ही रहा। लेकिन वह भी कब तक नाचता—कुछ देर में वह भी जमीन पर लुढ़क पड़ा।
     “बेचारा बहुत थक गया। ला इसे मैं उठा दूँ ।’’ कम्मो को उस पर बड़ी दया  आई।
     “न—न इसे न छूना !मैं इसे किसी को भी न लेने दूँगी।’’
     “अपने भैया को भी नहीं!’’
     “उसका तो नाम भी न ले। वह अपना लट्टू मुझे नहीं छूने देता तो मैं क्यों उसे छूने दूँ। उसने अपने को समझ क्या रखा है। अब तो मैं भी लट्टू चैंपियन से कम नहीं। चल कम्मों चल --- मेरे साथ चल। अब दूसरों को इस तमंचे का जादू दिखाती हूँ।’’
     दोनों मुश्किल से चार कदम ही आगे गई  होंगी कि छ्बीली के पैर जमीन से चिपक कर रह गए। उसने जो देखा उस पर विश्वास ही न कर सकी। छब्बू के पास भी उसके जैसा तमंचा लट्टू था और बड़ी शान से अपने दोस्त हल्लू-बल्लू के सामने उसे नचा रहा था।
    उसे बहुत ज़ोर से गुस्सा आया और पैर पटकती अपने पापा के पास जा पहुंची-“आप भाई को  लट्टू क्यों  लाये? जब वह मुझे नहीं देता तो आपने क्यों उसे दिया?”
     बिटिया ,मैं उसके लिए नहीं लाता तो वह रोता। तुझे अपना प्यारा भैया रोते अच्छा लगता क्या?’’उन्होंने उसे समझाना चाहा।
     सच में वह छब्बू को रोता एकदम नहीं देख सकती थी।वह उसे बहुत चाहती थी।  उसे पापा की बात सोलह आने ठीक लगी। गुस्सा न जाने कहाँ उड़न छू हो  गया।  जल्दी ही सब कुछ भूल -भालकर अपने भाई के पास चल दी और उसके साथ लट्टू घूमाने में मगन हो गई।       हल्लू,बल्लू,गेंदा,गुल्ली,जमुना,जानू उनके चारों तरफ गोला बनाकर खड़े हो गए। दोनों ही के लट्टू हाथ हिला -हिलाकर  जमीन पर अपने करतब दिखा रहे थे। भोले बच्चों को लगा  मानों लट्टू हाय-हेलो कर डिस्को डांस कर रहे हैं। वे खूब हँसे –--ऐसे हँसे कि हँसते हँसते उनका पेट फूल गया। नटखट  बच्चे उछलते हुए तालियाँ बजाकर गा उठे --
  घूम रे घूम लट्टू राजा घूम
  झूम-झूम लटुआ रानी झूम
  रंग-बिरंगे ,छैल-छबीले  
  इनकी तो मच गई धूम
  एक पैर पर देखो रे भैया
  वो तो नाचे झूम- - झूम
 झम---झम---झूम--झूम      
    अपने दोस्तों को आनंद मग्न देख भाई -बहन  के चेहरे से खुशी टपकी पड़ती थी---इतनी खुशी जो डिजिटल गेम्स, कैजुअल गेम्स ,वीडियो गेम्स खेलने से भी नही मिलती ।
समाप्त