नये वर्ष की नई अभिलाषा ----

बचपन के इन्द्र धनुषी रंगों में भीगे मासूम बच्चे भी इस ब्लॉग को पढ़ें - - - - - - - -

प्यारे बच्चो
एक दिन मैं भी तुम्हारी तरह छोटी थी I अब तो बहुत बड़ी हो गयी हूं I मगर छुटपन की यादें पीछा नहीं छोड़तीं I उन्हीं यादों को मैंने कहानी -किस्सों का रूप देने की कोशिश की है I इन्हें पढ़कर तुम्हारा मनोरंजन होगा और साथ में नई -नई बातें मालूम होंगी i
मुझसे तुम्हें एक वायदा करना पड़ेगा I पढ़ने के बाद एक लाइन लिख कर अपनी दीदी को अवश्य बताओगे कि तुमने कैसा अनुभव किया I इससे मुझे मतलब तुम्हारी दीदी को बहुत खुशी मिलेगी I जानते हो क्यों .......?उसमें तुम्हारे प्यार और भोलेपन की खुशबू होगी -- - - - - -I

सुधा भार्गव
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मंगलवार, 20 मार्च 2018

बाल संस्मरण


बच्चो,बहुत समय से बचपन के गलियारों को भूल गई थी लेकिन अब उन्हें ढूंढ निकाला है। इस बार यहाँ आकर तुम अवश्य रोमांचित हो उठोगे।   
तेइसवीं कड़ी
भूत भूतला की चिपटनबाजी

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        छुटपन में मुझे भूत -प्रेत की कहानियाँ बड़ी अच्छी लगती थीं । कथाओं में भूत मुझे कभी चमत्कारी बाबा लगते तो कभी जासूस तो कभी जादूमंतर जानने वाले जादूगर। सोचती कितना अच्छा हो कोई भूत मुझे मिल जाए—देखूँ तो कैसा होता है।  तइया दादी भूतों के किस्से सुना सुना कर तो हम भाई बहनों को अचरज में डाल देतीं।पर कभी कभी वे अपनी बात मनमाने के लिए  भूत का नाम कुछ इस तरह लेतीं कि हम कुछ पल को डर ही जाते और मुँह से निकाल जाता –दइया भूत ऐसा होता है।
      तइया दादी बाबा की ताई थीं। नाटी सी गोरी सी कमर झुकाए धीरे धीरे चलतीं। दाँत तो उनके एक भी नहीं था। चोरी छुपे हम उन्हें पोपली दादी भी कहते। बोलतीं तो आधी बात फुस से हवा की तरह निकल जाती। फिर भी हमें वे अच्छी लगती —हँसती तो प्यारी -प्यारी लगतीं।
      वे हमारे घर की कोतवाल थीं कोतवाल। मोटा मोटा चश्मा आँखों पर ,उसके नीचे मोटी- मोटी  आँखें ---बाप रे नन्ही सी चींटी भी उनकी पैनी निगाह से न बच पाए।  हर आने जाने वाले का हिसाब उँगलियों पर रखतीं और प्रश्नों की झड़ी लगा देतीं --कहाँ जा रहा है?क्या करने जा रहा है?कब तक लौटना होगा?
      एक शाम मैं जल्दी जल्दी दूध पीकर बाहर खेलने निकलने ही वाली थी कि पीछे से आवाज आई –“अरी छोरी मीठा दूध पीकर उछलती कहाँ जा रही हैं--नमक चाटकर जा वरना भूतला चिपट जाएगा भूतला।”
      एक मिनट को तो मेरे कदम रुक गए फिर साहस जुटाते पूछा-“दादी तुमने भूतला देखा है क्या?”
      “न—न- –भूत को कोई न देख सके पर वह सबको देख सके है। कभी -कभी भूतों के पैर दिखाई दे जावे हैं।हवा में भी फर्राटे से उड़े हैं।”
      “तुमने पैर देखे हैं क्या?”
     “देखे तो नहीं पर सुना है पैर उल्टे होवे हैं ।एड़ी आगे उँगली पीछे।” मैं नाक पर उंगली रख बुदबुदाने लगी एड़ी आगे उँगली पीछे-- एड़ी आगे उँगली पीछे। माँ कब-कब में उंगली से नमक चटा गई पता ही न चला। 
      “क्या हुआ !अब जा न बाहर खेलने।”
      “कहीं भूतला चिपट गया तो—मैंने आँखें झपकाते हुए कहा।”
      “अब कोई भूतला पूतला न चिपटेगा। नमक खा तो लिया।”
      मैं बाहर चली तो गई पर खेलने में मन नहीं लगा। सड़क पर किसी भी अंजान को जाते देख मेरी नजरें  उसके पैरों को टटोलने लगतीं  ---कहीं यह भूत तो नहीं---जरूर इसके पैर उल्टे होंगे। मगर उल्टे पैर वाला कोई मिला नहीं।
       खेलने के बाद बहुत भूख लगी थी सो सीधे रसोईघर में पहुंची। भाई छोटू वहाँ पहले से ही विराजमान था और इंतजार कर रहा था कब पहली रोटी तवे पर पड़े और कब उसे हड़प ले। मुझे देख नाक भौं सकोड़ी और बोला –“पहले मैं आया हूँ मिसरानी जी रोटी भी पहले मुझे ही देना””
      “खाना शुरू करेगा तो पाँच -पाँच रोटियों पर भी न रुकेगा।पूरा पेटू है पेटू। पहले मुझे दो।”  
     “ओह मुनिया झगड़ा न कर। पहले दो रोटियाँ छोटू को लेने दे। फिर तुझे दे दूँगी।”
      मन मसोसकर मैं अपनी बारी का इंतजार करने लगी। जैसे ही दूसरी रोटी मिसरानी ताई मेरे थाली में डालने लगीं छोटू चिल्लाया-जीजी को ही रोटियाँ दिये जाओगी क्या! अब मुझे दो।
      मैं परेशान हो उठी--क्या वास्तव में मैं कई रोटियाँ खा गई हूँ। पेट तो भरा नहीं। कहीं भूत तो मेरी रोटियाँ नहीं खा गया। जरूर वह मेरे पास बैठा हैं। उफ क्या करूँ!मैं तो उसे देख ही नहीं सकती। पैर भी नहीं दिखाई दे रहे। इस बार तो रोटी को मुट्ठी में कसकर पकड़ लूँगी और एक एक टुकड़ा तोड़कर खाऊँगी । फिर देखती हूँ बच्चू के हाथ कैसे लगती है रोटी। किसी तरह बस वह एक बार मुझे दिखाई दे जाय फिर तो उसे चिढ़ा -चिढ़कर खाऊँगी। कितने ही ख्यालों के बादल मुझपर मंडराने लगे।  नींद जैसे ही आँखों से झाँकी मैं भूत को एकदम भूल गई।
      छुट्टियों में चचेरे भाई  बहन आए हुए थे । उनके साथ हुल्लड़बाजी करने में बड़ा मजा आता। घर के बाहर पीपल का  बड़ा सा पेड़ था।उसके चारों तरफ पक्की चबूतरी बनी थी। हम उसके चक्कर पर चक्कर लगा छुआ- छाई खेलते। चबूतरी पर बैठे हँसते -खिलखिलाते और खुटटमखुट्टी कर बैठते। जब तक आड़ी(सुलह)न हो जाती घर न लौटते ।
       एक दिन इसी चक्कर में अंधेरा गहरा गया जबकि संझा होते ही घर लौटने का नियम था। पिताजी तो आँखें तरेरकर ही रह गए पर तइया दादी बोल उठी-“इतनी देर गए लौटे हो।तुम्हें मालूम है पीपल पर भूत रहता हैं। शाम को लौटते समय हो गई उससे मुठभेड़ तो ऐसा चिपटेगा ऐसा चिपटेगा कि उसकी पकड़ से छूट भी न सकोगे। बस चीखते रह जाओगे –बचाओ—बचाओ।”  
       हम गुमसुम से हो गए। दादी की बात बहुत दिनों तक दिमाग में छाई रही।  अंधेरा होते ही हम घर लौट आते।
       पिताजी तो खुशी से भर उठे। बोले –“तुम तो बहुत अच्छे हो गए हो। समय से खेलकर घर में आ जाते हो। ”
      “नहीं आएंगे तो भूत पकड़ लेगा।” मैंने कहा।
       “कौन बोला?”
       -तइया दादी।
      -तुम्हारी तइया दादी ने कहा !तइया अम्मा भी न जाने बच्चों से क्या -क्या कहती रहती है। बच्चों भूत-प्रेत कोई नहीं होता जाओ यहाँ से। वे झल्ला पड़े।
       तइया दादी झकर-झकर झुकी-झुकी आन पहुंची –“क्या कहे है--- भूत न होवे? मैं कहूँ --होवे है।पढ़ लिख गया तो मेरी कोई बात पर विश्वास ही न करे हैं।  मैं तो पैदा होते ही सुनती आई हूँ भूत—भूत । भूत न देखा पर कुछ तो सच होगा ही। ” दादी भुनभुनाती रह गई।
     पिताजी न ही दादी को भूत की सच्चाई समझा सके और न हमें ही बता सके। सोचा होगा दादी अनपढ़ है और हम बच्चे नासमझ।इनसे माथापच्ची करना बेकार है। समझदार होने पर भी मैं दादी का भूत भुला न सकी। हमेशा सोचती रहती दादी की कही बातों में कुछ तो सच्चाई जरूर होगी। आठवीं कक्षा में जाते जाते भूत से पर्दा उठ ही गया।
      बच्चों,मुझे पता लगा कि भूत –प्रेत तो कोरी कल्पना ही है। एक तरह से दादी की बातों में वैज्ञानिक सच छुपा है। उनके समय ज़्यादातर लोग अनपढ़ थे। वे विज्ञान की भाषा नहीं समझ सकते थे। पर स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए एक अज्ञात काल्पनिक आकृति भूत की ओट में कुछ उक्तियों  का प्रचलन हो गया जिसे सुनकर ही लोग कानों से ग्रहण करते थे और उस पर चलते थे। वे विचार पीढ़ी दर पीढ़ी बहते रहे और उन्हें मानने की प्रथा चल पड़ी।  दादी भी उनमें से एक थीं जिन्हें भूत-प्रेत की बातें बचपन से सुनने को मिली थीं। वे उनके खूनमें इतना रम गई थीं कि उनको सच मान बैठी थीं। नमक चाटकर जाओ दादी ने ठीक ही कहा था। चीनी दांतों को नुकसान पहुँचाती है। मीठा दूध पीकर बाहर जाने से मिठास का असर काफी देर तक दांतों में रहता  है इससे उनके खराब होने का डर पैदा हो जाता है।
       सुबह के समय पेड़ पौधे-आक्सीजन निकालते हैं और कार्बन ग्रहण करते है। पर रात के समय वे इसका उल्टा करते हैं। मतलब आक्सीजन ग्रहण करते हैं और कार्बन निकालते हैं। रात को उनके नीचे या आसपास रहने से कार्बन ही मिलेगी जो हमारे लिए जहर है। हमारा जीवन तो आक्सीजन है। इसी कारण तइया दादी ने कहा था- साँझ होते ही घर लौट आना।
       मैं न दादी को गलत कह पाती हूँ और न पुरानी मान्यताओं को । पर इतना जरूर है कि हमें उन्हीं बातों पर विश्वास करना चाहिए जो तर्क संगत हों। बिना सोचे समझे लकीर की फकीर पीटना तो अंधविश्वास हो गया।
समाप्त



शनिवार, 22 अक्तूबर 2016

अंतरजाल पर मेरी प्रथम प्रकाशित ई बुक 
उलझन भरा संसार 

ऊपर क्लिक करें 
यह मेरा प्रथम प्रयास है। पुस्तक pothi.com के सहयोग से अंतर्जाल पर प्रकाशित हुई है। अपनी खुशी आपके साथ साझा कर  रही  हूँ।  यह पुस्तक बाल मनोविज्ञान  से संबन्धित  है।  इसमें कुल मिलाकर 10 कहानियाँ है। जो यदा कदा विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। 

इसकी लिंक है -     pothi.com/pothi/book/ebook-sudha-bhargava-uljhan-bhara-sansar                                                                                                                       


मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

बाल संस्मरण


बाइसवीं कड़ी 
बाग-बगीचे,खेत-खलिहान


मुझे बचपन मेँ बाग-बगीचे और खेतों मेँ घूमने का बड़ा शौक था।
एक दिन मैंने बाबा से कहा –पिताजी के पास सब कुछ है पर न कोई बाग है और न कोई खेत। मेरे अच्छे बाबा,उनसे बोलो न-- एक छोटा सा बगीचा मेरे लिए खरीद लें।
-तू क्या करेगी मुनिया?
-मैं खट्टी –खट्टी अमिया तोड़कर खाऊँगी। आपके लिए अमरूद तोडूंगी।
-तेरे हाथ तो छोटे छोटे है। डाल तक जाएंगे ही नहीं।
-ओह बाबा –देखो मैं ऐसे उचक-उचक एड़ी के बल खड़ी हो जाऊँगी और लपककर डाली को पकड़ नीचे की तरफ खींच लूँगी।
-इस तरह तो तू धड़ाम से गिरेगी।
-ओह,तब मैं क्या करूँ। हा!याद आया—नंदू से कहूँगी मेरे साथ नसैनी लेकर बाग में चल। नसैनी पर चढ़कर अमरूद तोड़ लूँगी। 
-बेटी –लुढ़क लुढ़का जाएगी। तेरे लिए अभी बाजार से मीठे -मीठे अमरूद मँगवा देता हूँ।
- बाबा –आप समझते क्यों नहीं! तोड़कर खाने में जो मजा है वह खरीदकर खाने मैं नहीं आता।
-तू देर से पैदा हुई –पहले क्यों न हुई ?
-क्यों बाबा?
-तेरे परबाबा आढ़े गाँव के रहने वाले थे। उनके पास बाग- बगीचे और लंबे -चौड़े खेत थे। तू होती तो सारे दिन बाग के आम खाती और  खेतों में नन्ही चिड़िया सी उड़ती रहती।
-सब कहाँ गए बाबा?
-मैं शहर चला आया। बाग तो बेच दिए और खेत किसानों के पास हैं।  
-तो उनसे वापस ले लो।
-अब नहीं लिए जा सकते। उन्होंने सालों बड़ी मेहनत से खेतों में काम किया इसलिए उनको ही दे दिए। एक बार देकर चीज वापस नहीं ली जाती।
 -तब पिताजी से कहो मेरे लिए जल्दी ही कोई बाग ले लें।मैं अनमनी सी बोली। 
-बेटा जग्गी को बाग में कोई दिलचस्पी नहीं। हाँ, उसके कुछ दोस्त हैं जिनके बाग -बगीचे हैं। उससे कहूँगा तुझे बाग दिखा लाए।

बाबा के कहने पर पिता जी मुझे अपने दोस्त रमेश अंकल के बगीचे में लेगए। ठंडी-ठंडी --- खुशबू भरी हवा से मेरा मन खुश हो गया। कोयल की कूक सुन  मैं उसे पकड़ने  को उतावली हो उठी और उसकी आवाज का पीछा करने लगी। मेरी भागादौड़ी पर अंकल को  तरस आ गया।
बोले-कोयल को तुम बहुत प्यार करती हो। कोयल भी तुमको बहुत चाहती है। तभी तो गाना सुनाने आ जाती है पर हमेशा आजाद रहना चाहती है। इसलिए किसी के हाथ नहीं लगती।
मैं थककर बैठ गई।इतने में बाग में काम करने वाला जिंदा माली कुछ पके रसीले आम लेकर आ गया। 

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अंकल हमें बड़े शौक से  आम काटकर खिलाने लगे पर मुझे तो बाग में घूमने की जल्दी पड़ी थी। तीन-चार फाँके ही खाकर उठ गई।
दूर तो अकेली जाने की हिम्मत नहीं हुई ,बस आसपास ही चक्कर लगाने लगी। अमरूदों की खुशबू का एक झोंका आया तो सूंघते-सूंघते उसी दिशा की ओर बढ़ गई जिधर अमरूद के पेड़ की डालियाँ फलों  के बोझ से झुकी जा रही थीं। माँ  ने बताया था कि अमरूद से कब्ज जाता रहता है और मुझे ज़्यादातर कब्ज हो जाता। मन ही मन गुलगुले पकाने लगी -आज तो जी भर कर अमरूद खाऊँगी फिर तो कब्ज दुम दबा कर ऐसा भागेगा –ऐसा भागेगा कि भूल से भी  मेरे पेट में घुसने का नाम न लेगा। लेकिन जल्दी ही मेरे गुलगुले पिलपिले हो गए। 

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अमरूद तो लटके हुए थे पर सब के सब  कच्चे। न जाने कहाँ से एक तोता  भी पेड़ की डाल पर आकर बैठ हुआ था और अमरूदों को कुतर -कुतर कर झूठा किए दे रहा था। मैंने हुस--हुस करके उसे हाथ से उड़ाने की बहुत कोशिश की पर अमरूदों के आगे उसने मेरी एक न सुनी। मैं दुखी सी लौट आई।
 मुझे चुपचाप बैठा देख अंकल ने  सुझाव दिया-बिटिया,पिछवाड़े जाकर तुम माली के साथ सब्जियों की खेती भी देख आओ। गाजर-मूली से बातें कर तबियत खुश हो जाएगी।
-इसे पेड़-पौधे अच्छे भी लगते हैं। कहकर पिताजी ने मंजूरी दे दी।
मेरे पैरों में मानो पहिये लग गए हों। सरपट भागती हुई माली का पीछा करने लगी पर पीछे से आती आवाजें मेरा पीछा कर रही थी। पिता जी को कहते सुना-लगता है इसकी शादी ऐसे घर में करनी पड़ेगी जहां कुछ भी न हो पर बाग-बगीचे,खेत- खलिहान और गाय-भैंसें जरूर हों।वरना दहेज में यह सब देना पड़ेगा। फिर एक साथ हंसी के ठहाके हवा में तैर गए।
खेत में घुसते ही छोटे छोटे टमाटरों को देख ठिठक गई------


आह! कितने प्यारे टमाटर !

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Image result for smiling baby tomato clip art एक तोड़ा ही था कि माली काका भागता हुआ आया-ए लल्ली तूने यह क्या किय?यह बच्चा टमाटर बड़े होकर लाल गूदेदार मोटा-ताजा निकलता।च—च—बेचारा! समय से पहले ही मारा गया।
-मर गया –नहीं नहीं काका यह तो जिंदा है देखो कैसा लाल है और मैंने गप्प से मुंह में रख लिया-आह क्या खट्टा-खट्टा है।
तभी मेरी निगाह क्यारी में दो जुड़े टमाटरों पर पड़ी। मेरा तो मुंह खुला का खुला रह गया- जुड़वाँ टमाटर। ताई के जुड़वाँ बहनें हुई थीं। -----टमाटर के भी जुड़वाँ बच्चे ।
मैं पूछ बैठी-
-काका ये दोनों भाई हैं या बहन ?
-बहनें हैं बहने!वह हड़बड़ा गया। उसे ऐसे प्रश्न की आशा नहीं थी।
-तब तो ये खूब लड़ेंगी। मेरी बहनें भी खूब झगड़ती हैं। तुम्हें बहुत परेशान करेंगी ।थोड़ी सी बस पिटाई कर देना। कहकर हँस दी।
कुछ क्यारियों में बंदगोभी और फूल गोभी खिली पड़ रही थीं। बंदगोभियाँ तो पत्तों के बिछौने पर आराम फरमा रही थीं।उनमें से एक को देख लगा --अधखुली आँखों से मुझे बुला रही हैं। 


फूल गोभी को देखकर तो इच्छा हुई –

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ऊपर का कच्चा –कच्चा गोरा फूल खा जाऊँ पर थोड़ा सा डर गई—कहीं हाथ लगाने से गोभी मैली न हो जाए और माली काका टोक दे---अरे लल्ली----यह तूने---- क्या किया?
आगे की दो क्यारियों में केवल पौधे लहरा रहे थे। मुझे बड़ा अजीब सा लगा- –अरे इनमें तो कोई सब्जी ही नहीं हैं।
-यह मूली का पौधा है –यह गाजर का है।माली बोला। 
-मूली –गाजर तो दिख ही नहीं रही?
-वे तो जमीन के अंदर हैं।
-जमीन के अंदर!माली काका उन्हें जल्दी निकालो । मिट्टी के नीचे उनका दम घुट रहा होगा।
-बच्ची, मूली -गाजर तो जमीन के अंदर ही खुश रहती हैं। साथ में चुकंदर जैसे दूसरे साथी भी उनके साथ होते हैं। 


-एक गाजर निकाल कर दिखाओ न ।
माली ने कुछ गाजर और मूली जमीन से उखाड़ी। मिट्टी से लथपथ। 
-इतनी गंदी !मैंने बुरा सा मुंह बनाया। 
-अभी मैं पानी से धोकर मिट्टी साफ लिए देता हूँ। 
  नहाने से तो गाजर -मूली की रंगत ही बदल गई एकदम चिकनी चिकनी। मेरी जीभ उनका स्वाद लेने को मचल उठी पर मांगना ठीक न समझा। माली काका मेरे मन की बात समझ गए। बड़े प्यार से बोले-खाएगी क्या बिटिया?
मैं चुप रही,आँखों ने पहले से ही मेरे मन की बात बता दी थी।  
जैसे ही उन्होंने मेरी तरफ गाजर-मूली बढाईं,मैंने  लपककर ले लीं मानो पहली बार देखी हों।  
उतनी मीठी गाजर कभी नहीं खाई थीं।उन्हें चबाते चबाते मैंने पूछा –काका तुम्हारे खेत में क्या गन्नों के ऊंचे –ऊंचे पेड़ भी हैं?
-है तो-- चलो दिखाऊँ।
काका आगे-आगे,मैं पीछे – पीछे। जैसे ही मैंने गन्ने के बड़े-बड़े पत्ते देखे, मेरी चाल तेज हो गई। अब मैं आगे-आगे,काका पीछे-पीछे ।
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मैं जल्दी से गन्नों के बीच मेँ घुस गई इस डर से कि कहीं काका पीछे से मुझे खींच न ले। वह चिल्लाते हुए मेरे पीछे भागे-अरे बिट्टो,अंदर मत घुस, तेरे पैरों से पेड़ों की जड़ों को चोट पहुंचेगी---वे कुम्हला जाएंगे।  

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काका की टोकमटोक से इस बार मेरा मुंह फूल गया और तीर की तरह निकल पिता जी के पास चल दी। 
मुझे उस पर बहुत गुस्सा आ रहा था। बाग तो अंकल का था ,वह मुझे रोकने वाला कौन ?पिताजी पर भी झुँझला रही थी –अगर आज उनका छोटा सा भी बाग होता तो कम से कम आजादी से तो घूमती। फल-फूलों को जी भर देखती । वहाँ यह काका पहुँचकर मुझे परेशान तो न करता। बाग तो देख लिया पर काका के कारण मजा नहीं आया। मेरा मन उछट गया और  पिता जी से जल्दी ही घर चलने की जिद करने लगी।
यह तो मैंने बाद मेँ जाना कि माली काका की टोकमटाक ठीक ही थी। जिस तरह से माँ बाप बच्चों को बड़े प्यार से पालते है उनके सुख-दुख का ध्यान रखते हैं उसी प्रकार माली काका भी तो बाग के हर पेड़ पौधों की जी जान से देखभाल कर रहा था। वह कैसे सह सकता था कि कोई उनको कष्ट पहुंचाए।
आज भी जब किसी फल-फूल को तोड़ने मेरे हाथ बढ़ते हैं तो माली काका की टोकमटाक याद आ जाती है। अपने से ही प्रश्न पूछने लगती हूँ क्या ऐसा करना ठीक है और उत्तर में हाथ स्वत: ही पीछे हट जाते हैं।
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सुधा भार्गव 

शनिवार, 30 मई 2015

इक्कीसवीं कड़ी


जब मैं छोटी थी

ठप्पा लगाओ खट-खट-खटाखट


मैं जब छोटी थी लिफाफे -पोस्टकार्ड पर सरकारी मोहर से खटाखट ठप्पा लगाने में बड़ा मजा आता था।पर पोस्ट आफिस में घुसना गुड़िया का खेल न था।
हमारी हवेली के मुख्य दरवाजे के बाएँ भार्गव फार्मेसी पोस्ट ऑफिस था। सरकारी डाकखाने के पोस्टमास्टर जी रिटायर हो गए तो पिता जी ने उन्हें आदर सहित भार्गव पोस्ट ऑफिस में रख लिया। वे ज़्यादातर धोती कमीज पहनते थे। हाँ,बैग लाना न भूलते।जो कभी उनके हाथ में लटकता तो कभी दीवार पर। बात कम,काम ज्यादा वाली पटरी पर चलते।

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हम बच्चों को पोस्ट आफिस में घुसना मना था। उसके दो दरवाजे थे। एक सड़क की तरफ खुलता था और दूसरा हमारे घर की दुवारी में खुलता था। वह ज़्यादातर भिड़ा रहता। करीब दो बजे मैं और मेरा भाई  स्कूल से आते । उस समय पोस्ट ऑफिस से खटखट की आवाज आती । हमें बड़ी अजीब सी लगती। एक दिन भिड़े दरवाजे से अंदर झाँककर देखा –पोस्टमास्टर जी के सामने बहुत से पोस्टकार्ड व लिफाफे रखे हैं। एक को हाथ में लेते ,उसे मेज पर एक किनारे रखकर दूसरे हाथ से उस पर पूरी –ताकत से पोस्ट ऑफिस की मोहर (stamp)लगाते।उसी से धम --धम की आवाज होती। हमें भी शौक चिर्राया स्टाम्प लगाने का। हमारे लिए यह एक नए खेल से ज्यादा कुछ नहीं था।घुसें तो कैसे घुसें डाकखाने में। कई दिन की ताक-झांक के बाद पता लगा कि 2बजे मास्टर जी 

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लैटरबाक्स से चिट्ठियाँ निकालने बाहर जाते हैं और उसी के बाद ठप्पा लगाने की धमा चौकड़ी शुरू होती है। पिताजी भी दोपहर का खाना खाकर उस समय थोड़ा आराम करते थे। बस हो गया हमारा रास्ता साफ ।
एक दिन जैसे ही दरवाजा खोलकर मास्टरजी लैटरबॉक्स से चिट्ठियाँ लेने बाहर निकले, मैं अपने भाई के साथ बिल्ली की तरह दबे पाँव पोस्ट ऑफिस में घुस गई। बड़े रौब से हम कुर्सियों पर बैठ गए। हमें वहाँ बैठे देखकर मास्टर जी खुश तो हुए पर कड़क आवाज में पूछे बिना न रहे –तुम लोग यहाँ कैसे ?
हमने हाथ जोड़कर नमस्कार किया। वे कुछ पिघले।
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-क्या तुम्हें पुराने टिकट चाहिए?  





-नहीं!हमने ज़ोर से अपनी गर्दन हिला दी। 
 -तब क्या चाहिए ?
-हमें चिट्ठियों पर जरा स्टाम्प मारना है – खट-खटाखट –खट।   
-अरे ये बच्चों का खेल नहीं है।
-बस एक बार मार लेने दीजिए। हम गिड़गिड़ाए।
-अच्छा ,मैं हाथ पकड़कर लगवाता हूँ। खट –खट -----।
-बस एक बार और --।
-खट –खट --। बस जाओ।
-अरे मैंने तो मोहर मारी ही नहीं। भाई बोल उठा। 

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-तुम भी मारोगे !अच्छा एक शर्त है, आज के बाद फिर कभी नहीं। बच्चों की यह जगह नहीं हैं ।
हमने ज़ोर से सर हिलाया –ठी---क है।
यह खेल बड़ा दिलचस्प लगा और हम अपने को काबू में न रख सके। ऐसे मामलों में हम दो नहीं ,एक और एक ग्यारह के बराबर हो जाते और हिम्मत आसमान तक पहुँच जाती । अब तो जब –तब निधड़क पोस्ट आफिस में घुस जाते और उनके सिर पर सवार हो जाते । वैसे हम उनसे बड़े खुशामदी स्वर में नमस्ते किया करते। वे नमस्ते का जबाव घबराते –घबराते देते। हम मोहर पर कब्जाकर शुरू कर देते –एक-दो-तीन। 

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-ले भइया अब तेरी बारी है –खटखट –एक-दो-तीन। मास्टर जी को गुस्सा आता । जबर्दस्ती मोहर हमारे हाथ से छीन लेते।
-बस बहुत हो गया ---निकलो यहाँ से बाहर या बुलाऊँ तुम्हारे पिताजी को। पिताजी का नाम सुनकर हम भाग खड़े होते।
धीरे –धीरे मैं मनीआर्डर करना,तार देना,पासबुक में पैसा जमा करना सीख गई क्योंकि पिता जी के काम से मैं बहुत जाती रहती थे।  मुझे उस तरह का काम करना अच्छा भी लगता । उस समय मास्टर जी मुझे आने से नहीं रोकते थे और बहुत प्यार से समझाते पर मुन्ना भाई के होने से मुझे शैतानी सूझती और एक ही रट लगाती –आज तो चिट्ठियों पर मोहर मैं लगाऊँगी। ले मुन्ना ---लिफाफों पर तू भी लगा ले । उस समय मास्टर जी खीज जाते । हम उनकी परेशानी का मजा लेते और खटखट कुछ चिट्ठियों पर स्टम्प लगा कर भाग जाते ।


उन दिनों न कंप्यूटर थे न मोबाइल फोन । टेलीफोन भी घर –घर नहीं थे पर पत्र धड़ाधड़ लिखे जाते थे । एक्सप्रेस लैटर भी खूब चलते थे ।इनपर कुछ ज्यादा टिकट लगाने पड़ते थे। हम मोहर मारने के लिए ज़्यादातर उन्हीं को लपकते। शादी बाद मैंने भी एक्स्प्रेस लेटर का सहारा लिया। पीहर आने पर चिट्ठी लिखकर पोस्ट ऑफिस में जाती और उसपर टिकट लगा देती। अक्ल आने पर मोहर लगाने का खेल भी खतम हो गया या कहो बचपन की शरारतें घुटने टेक चुकी थीं लेकिन मास्टर जी की निगाहों में अब  भी मैं वही छोटी लल्ली थी। जाने को मुड़ती तो कहते –लल्ली इस पर मोहर तो लगाती जा । मैं नीची निगाह किए मोहर लगाती। उनके स्नेह और अपनेपन को देख मेरी आँखें भर आतीं और आंसुओं को छिपाती दरवाजे से निकल जाती। आज भी उनका स्नेह मेरी यादों की खिड़की से झाँकता नजर आता है। 

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