नये वर्ष की नई अभिलाषा ----

बचपन के इन्द्र धनुषी रंगों में भीगे मासूम बच्चे भी इस ब्लॉग को पढ़ें - - - - - - - -

प्यारे बच्चो
एक दिन मैं भी तुम्हारी तरह छोटी थी I अब तो बहुत बड़ी हो गयी हूं I मगर छुटपन की यादें पीछा नहीं छोड़तीं I उन्हीं यादों को मैंने कहानी -किस्सों का रूप देने की कोशिश की है I इन्हें पढ़कर तुम्हारा मनोरंजन होगा और साथ में नई -नई बातें मालूम होंगी i
मुझसे तुम्हें एक वायदा करना पड़ेगा I पढ़ने के बाद एक लाइन लिख कर अपनी दीदी को अवश्य बताओगे कि तुमने कैसा अनुभव किया I इससे मुझे मतलब तुम्हारी दीदी को बहुत खुशी मिलेगी I जानते हो क्यों .......?उसमें तुम्हारे प्यार और भोलेपन की खुशबू होगी -- - - - - -I

सुधा भार्गव
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शनिवार, 17 अगस्त 2019

बचपन का सावन


संस्मरण 

॥ 6॥ बाबा का बटुआ 
सुधा भार्गव 
बालवाटिका ;  जुलाई अंक में  प्रकाशित 2019 

       बाबा के पास कपड़े का सिला एक बटुआ था जो डोरी के खींचने से बंद होता था और डोरी से ही खुलता था। उसे देखकर मुझे अलादीन चालीस चोर की कहानी याद आती।जैसे ही बाबा डोरी खींचते ,मैं कहती-खुल जा सिम सिम । बाबा मुझे 10 पैसे देते। भाई को भी इतने ही पैसे देते।  पर मैं एक बार उसकी हथेली पर रखे सिक्के को गौर से देख  लेती –कहीं उसे मुझ से ज्यादा तो नहीं मिल गया।  बाबा के बटुए में ढेर से सिक्के बजते रहते थे। जहां कुछ सिक्कों को मिलाकर एक रुपया बना , अखबार के कागज में उसे लपेटकर लकड़ी की सन्दूकची में रख देते। दीवाली-दशहरा आने पर अम्मा-पिताजी,चाचा चाची तथा अन्य बड़ों को 2-2 रुपए देते।बच्चों को चवन्नी (25पैसे)ही मिलती। हमें जो मिलता उसी से संतुष्ट। मैं चाहती भी नहीं थी बाबा से रुपया लूँ। जब वे सबको रुपए बांटते तो मेरे दिल में कुछ होने लगता---बाबा का सारा पैसा खतम हो जाएगा। कोई मना भी नहीं करता—सब लपक लपक कर ले लेते हैं।
      मुझे काजू खाने का बड़ा शौक था।  सो मैं उछलती- कूदती मुट्ठी में बाबा की चवन्नी को कैद किए पंसारी की दुकान पर जा पहुँचती। लिफाफे भर काजू वह मेरे हाथ में थमा देता और मैं चिड़िया की तरह चुगते- चुगते घर पहुँचती तब तक लिफाफा खाली हो जाता। पिता जी मेरी इस आदत को जानते थे,इस कारण पैसे देते ही नहीं थे। न पैसे होएंगे न बाजार जाऊँगी।असल में बाजार और सड़क पर चलते -चलते मेरा खाना उन्हें बड़ा बुरा लगता था। इस मायने में मुझे अपने बाबा ही अच्छे लगते थे। उनके सामने पिता जी का अनुशासन चिड़िया की तरह फुर्र से खिड़की  के बाहर उड़ जाता।
      स्कूल जाने से पहले बाबा के क्लीनिक से होते हुए जाती ताकि कुछ जेब खर्च मिल जाए और पिताजी को कानों कान खबर न हो। वे रोज मुझे 10 पैसे ही  देते थे पर उससे मेरा चेहरा गुलाब की तरह खिल जाता। 
      उन दिनों बर्फ वाली आइसक्रीम बड़ी- बड़ी थरमसों में लेकर बेचते थे या बर्फीली चुस्की के ठेले होते थे। मैं दस पैसे में दो चुसकियाँ लेती । एक पर हरे रंग का शरबत डलवाती दूसरे    पर लाल रंग का शर्बत। आह! क्या चूस -चूसकर उसका स्वाद लेती। 
       एक दिन पकौड़ी खाने की मेरी इच्छा हुई। सरकारी अस्पताल के पास ठेलेवाला मूंग की दाल में आलू के छोटे –छोटे टुकड़े डालकर करारी पकौड़ी बनाता था। खाते समय सरसों के तेल की सोंधाहट नथुनों में भर जाती। चटनी तो बड़ी चटपटी लाजबाब थी। खाओ तो आँख में पानी और सी—सी करते ही बनता पर खाये बिना भी नहीं रहा जाता था। पकौड़ी के लिए पैसे कहाँ से जुटाएँ !समस्या आन खड़ी हुई। 
      अचानक ध्यान में आया –बाबा का बटुआ!बड़ी हिम्मत करके बाबा के पास मैं अपने भाई के साथ गई शायद पैसे मिल जाएँ । साथ में तीन साल का छोटू भी था,गज़ब का शैतान और महाफुरतीला। उसे अपने साथ ले जाने में घबराती थी। न जाने कौन सा बखेड़ा पैदा कर दे। उस दिन तो वह साथ में ही था। अगर कहती-भैया माँ के पास जाओ ,तब तो और अड़ जाता—ऊँह  अड़ियल टट्टू ।
      बाबा के पास पहुँचकर मैं बड़ी दीनता से बोली-“बाबा! पैसे--।”
      “अरे सुबह नहीं दिए!”
      बाबा को दुविधा में पड़ा देख झट से मैंने कह दिया - “नहीं बाबा!”
      न जाने क्या सोचकर बाबा ने अपनी थैली निकाली । उसे खोली। कुछ पैसे  मेरी हथेली पर रख दिए। मुन्ना को वे दे भी नहीं पाए कि छोटू चिल्लाया –पहले मुझे दो ---मुझे दो। उसने सोचा,उसका नंबर आने से पहले पैसे खतम ही न हो जाएँ। वह बाबा जी के हाथ से थैली ही छीनकर भाग गया। मैं उसके पीछे -पीछे भागी। थैली उससे  छीनकर बाबा के हाथ में रख दी—“बाबा इसे जल्दी से अंदर रख दीजिए वरना छोटू ले लेगा।”
      “अरे उसे भी लेने दो—छोटू-छोटू।” उन्होंने आवाज लगाई।
       वह अपनी कारिस्तानी पर हँसता हुआ एक कुर्सी के पीछे से प्रकट हो गया और हथेली आगे बढ़ा दी। दूसरे ही पल सफेद सिक्का  उसपर चमकने लगा । छोटू ने उसे कसकर हथेली में बंद कर लिया ,कहीं हम उसे उड़ा न लें।
        छोटू को तो गेंद लाने का लालच देकर घर में ही छोड़ दिया और मैं मुन्ना के साथ बाजार की ओर भाग खड़ी हुई। मन में बात आई कि बाबा तो हमें पैसे देते हैं,अपने हिस्से की मिठाई देते हैं। हमें भी उनके लिए कुछ करना चाहिए। यह सोच कर गरम गरम पकौड़ियाँ खरीदीं और आकर बाबा के पास बैठ गए। मैं चाहती थी, “पहले बाबा खाएं फिर हम।”
       हमें बैठा देख बाबा अचरज में पड़ गए। बोले-“बच्चे यहाँ कैसे?”
      मैंने धीरे से प्लेट उनकी तरफ बढ़ा दी –“बाबा,पकौड़ियाँ!”
      “क्या करूं इनका!”
      “आप खाओ।”
     “मुझे तो भूख नहीं।”
     “तब ---हम भी नहीं खाएँगे।”
     बाबा के गंभीर चेहरे पर मुस्कान फैल गई। उन्होंने एक पकौड़ी उठाई—“बस ,अब तुम खाओ।”
     हमारा मन खुशी से नाच उठा---बाबा ने खा ली –बाबा ने खा ली। फिर तो बिना किसी देरी के फटाफट सारी पकौड़ियाँ चट कर गए। 
       तो ऐसा था मेरे प्यारे बाबा का बटुआ—एकदम अलादीन का चिराग। 
समाप्त 

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

बचपन का सावन


॥5॥ बाललीला 
सुधा भार्गव 

बचपन में मैं जोर  -जोर  से  गाना  गाती,मटक -मटककर  नक़ल  उतारा  करती -ऐसा   मेरे  बाबा  कहते  थे|
मैं जिस पाठशाला में पढ़ती वह दुमंजिली और पक्की थी। उसी के सामने बड़ा सा मैदान हमारे लिए भानुमती के पिटारे से कम न था। उसकी चार दीवारी के अंदर खेलकूद होते,टिफिन खाने के बाद दौड़ लगाते। सर्दियों के समय जूट की बनी पट्टियों पर बैठकर पढ़ते और सुबह-सुबह  प्रार्थना करते हे भगवान बुद्धि तो ,विद्या दो,हम सब बच्चे हैं नादान। पक्की खपरैल के दो शेड भी वहाँ  बने थे जिनमें लकड़ी के तख्त लगाकर हमारा मंच तैयार हो जाता।वही हमारा थियेटर था। खुले दरवाजों वाला थियेटर जिसमें हर हफ्ते कोई न कोई नाटक होता। उस नाटक कंपनी को हम बच्चे ही चलाते थे। ऐसी थी  हमारी  निराली  पाठशाला। अनूपशहर मतलब अनोखे शहर की अनोखी पाठशाला।
 
इस आर्य  कन्या  पाठशाला में हर  शनिवार  लड़कियां  कविता  पाठ करतीं और नाटक  में  भाग  लेती। इन  सबका अभ्यास आखिरी पीरियड में रोज होता।
एक  शनिवार को खेल के मैदान में लकड़ी के स्टेज पर  कृष्ण लीला  होने वाली थी,


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जिसमें मुझे कृष्ण बनाने के लिए चुना गया।  पहली बार नाटक में भाग लेने जा रही थी इसलिए मैं खुशी के मारे गुब्बारे की तरह हवा में उड़ने लगी। वैसे तो मैं माँ के साथ पूजा के समय कम ही बैठती थी पर उस दिन मैं उनके पास जाकर बैठ गई। बालगोपाल की ओर टकटकी लगाए सोचने लगी -आह! इनका मुकुट कितना चमकीला है। मुरली भी सुंदर है। पायल तो बड़ी पतली घुंघरूवाली है। मैं भी मुकुट लगाऊँगी। मुरली बजाऊंगी । पायल पहनकर छमछम चलूँगी। आरती खतम भी न हुई कि मेरा राग शुरू हो गया-"माँ माँ ।"
"देख रही है पूजा कर रही हूँ। दो मिनट तुझसे चुप नहीं बैठा जाता।"
मैं मन मसोस कर रह गई।
कूछ देर बाद फिर बोल उठी –"माँ माँ मैं स्कूल में नाटक में कृष्ण बन रही हूँ।"
"तो ----।" माँ का रूखा सा जबाव सुनकर मेरा मुंह लटक गया और मरी सी आवाज में बोली-
"मुझे अपने बाल गोपाल की तरह सजा देना।"
"कब है नाटक ?"
"शनिवार को।"
" आज तो बुधवार ही है,क्यों अभी से तूफान मचा रही है!"
माँ की डांट ने मेरा मुंह बंद करा दिया और मैं गुस्से से भरी वहाँ से उठकर चली गई।
थोड़ी देर में ही भूल गई माँ ने मुझसे क्या कहा और मैंने उनसे क्या कहा। शनिवार को सुबह स्कूल
 जाते समय याद आया मुझे तो कृष्ण बनना है मेरी मुरली मेरा मुकुट! कुछ भी तो नहीं हैं। मैं 
सुबक पड़ी।
"सुबह सुबह रोधो क्यों रही है?"
"माँ ,मेरा समान --?"
"तेरा सामान या कृष्ण का सामान।"माँ हंस कर बोली । "इस बैग में पीली धोती और बांसुरी रख दी है।पायल पैर में पहना देती हूँ । उसे खोलना मत।फूल की माला और मुकुट पहनाकर तुम्हारी बहनजी सजा देंगी। खुश!"
मैं सच ही खुशी से पागल हो गई और छ्लांगें लगाते स्कूल पहुँच गई।
  

 टिफिन टाइम होते ही स्कूल में भगदौड़ सी मच गई। मेरे साथी  नाटक देखने के लिए आगे से आगे की जगह घेरकर बैठना चाहते थे।और मैं मैं तो बस कृष्ण बनने के सपने देख रही थी।   
 पीली धोती पहने, फूलों  के  गहनों  में  सजी सचमुच मैं अपने को कन्हैया समझ रही  थी |मुरली  से  आवाज  निकालती,पायल  छुनछुन करती  जब  मैं  मंच  पर  पहुँची ,सबकी    निगाहें  मेरी ओर  थीं  जो  प्रशंसा  के  मोती  लुटा  रही  थीं  | इतने  में  यशोदा  मैया  आई  |बोली- -"क्यों  रे  बलराम , तूने  दही  की  मटकी   क्यों  फोड़ी?"

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कृष्ण  बनी  मैं  चिल्लाकर  बोली -"अरे  यह  तो  गलत  बोल  रही  है |अब  मैं   कैसे  बोलूँ ?"पास  खड़ी  अध्यापिका  ने मुँह  पर  अंगुली  रखकर मुझे चुप  रहने  का  इशारा  किया | दूसरी  अध्यापिका  ने परदे  के  पीछे  से धीरे  से  कहा- "अपने  वाक्य  बोलो |रुको मत |"

मुझ बालकृष्ण  ने  तीखे  स्वर  में  यशोदा  पर  प्रहार  किया- "मैया  तू  तो  मेरा  नाम  ही  भूल  गई | मैं 
 बलराम नहीं  कृष्ण  हूँ   पहले  मुझे  कृष्ण  कहो  तब  आगे  बात  करूंगा। "  "यशोदा  सिटपिटा  गई | बहनजी की  आँखों  से  चिंगारियां   निकल  रही  थीं मानो वह उसे  भस्म  कर  देगी |तभी  लोगों  को  सुनाई दिया-"लाल ,तू  मेरा  कृष्ण  ही  है पर क्या  करूं ! जब  मैं  आई   तू  मेरी  तरफ  पीठ  करके  खड़ा  था । पीछे  से  तू  और  बलराम  एक  से  ही  
तो  लगते  हो |"
प्यार  से  यशोदा  ने  कृष्ण  को  गले  लगा  लिया | मंच  का  पर्दा गिर  गया  |तालियों  की गूँज के साथ सब खिलखिला  उठे |देखने वाले समझ  गये  थे -बच्चे  भूल कर बैठे हैं  लेकिन  बालबुद्धि  ने  समय  के  अनुसार  जैसा  अभिनय  किया जैसा बोला बहुत अच्छा  किया ऐसा सब कह रहे थे।    
बड़ी बहनजी(प्रिंसपिल)  ने  भी   खुश  होकर  मुझ कृष्ण -यशोदा  की पीठ  थपथपाई।  |
असल में कृष्णलीला करने की बजाए हम बच्चों ने बाललीला कर दी थी।    

इस बाललीला के महकते फूल अब तक मेरे साथ है। 
   

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सोमवार, 14 जनवरी 2019

बचपन का सावन


॥4॥ जादुई मुर्गी 
सुधा भार्गव 
     

वैसे तो पिता जी मुझे हमेशा टोकते रहते थे-यह करो-यह न  करो,ऐसे चलो-वैसे चलो। बीच बीच में डांट भी पिलाते जाते थे। पर शहर जाने पर जब वे जादू वाले खिलौने लाते तो लगता कि प्यार भी करते हैं।

एक बार वे दिल्ली गए और वहाँ से प्लास्टिक की ऐसी मुर्गी लाए जो अंडे देने लगी।
Image result for pixel free images plastic toy hens एक नहीं--- पाँच पाँच! अचरज से मेरी तो  आँखें गोल-गोल घूमने लगीं। सोच के पंख निकल आए- -हे भगवान अब तो अंडे फूंटेंगे  और फुदकते लगेंगे रुई से नन्हें बच्चे। चिंता में डुबकियाँ लेती बोली – “पिता जी--- पिता जी, ये रहेंगे कहाँ ?इनका तो जल्दी से घर बनवाना पड़ेगा। अभी तो आप अपना रूमाल दे दो । उससे इन्हें ढक दूँगी वरना सर्दी से इन्हें जुखाम हो जाएगा । अरे सोच क्या रहे हो जरा जल्दी करो न।
मेरी बात पर वे ठहाका मार कर हंस पड़े। बोले-ये अंडे तो मुर्गी के पेट में ही रहते हैं।
जब अंडे बाहर आ गए तो वापस पेट में कैसे जाएंगे?” मैं हैरत में थी।
देखो तो सही मैं अभी जादू से अंडों को पेट में भेज देता हूँ।
पिता जी ने मुर्गी को उल्टा करके धीरे से उसके दोनों पैरों को दबाया। 
अरे यह क्या –--इसका पेट तो अपने आप खुल गया। मैं चौंक पड़ी। 
पिता जी ने एक-एक करके पांचों अंडों को उसमें डाल दिया। फिर से उन्होंने  पैरों को दबाया तो पेट धीरे-धीरे बंद हो गया।
जादू हो गया। मुझे भी यह जादू सिखा दो।मैं मचल उठी।
इसमें है क्या? ऊपर से थोड़ा दबाओ धड़धड़ अंडे निकल पड़ेंगे।
मैंने वैसा ही किया पर अंडों को लेकर बड़ी सावधानी से हथेली पर रख लिया  कि फूट न जाएँ और इठलाती बोली –“अब मैं इनको पेट में नहीं जाने दूँगी। कुछ दिन बाद अंडे फुस से फूटेंगे। छोटे गुलाबी बच्चे  निकलेंगे ,वे भागेंगे ,मैं भी उनके पीछे भागूंगी ।पकड़ा-पकड़ी खेलेंगे। आह! कितना मजा आएगा। वे तो होंगे छोटे-छोटे और मैं होऊँगी बड़ी -बड़ी। जीत तो मेरी ही होगी क्यों पिताजी !मैं जीतूंगी न।उछल-उछलकर तालियाँ बजाने लगी।
पर बेटा ,मुर्गी तो नकली है और उसकी अंडे भी नकली है।उसके अंडों में से बच्चे  कभी नहीं निकलेंगे।
मैं रोनी सी हो गई। नहीं निकलेंगे--?” भर्राई आवाज में फिर से पूछा-नहीं निकलेंगे?
हाँ बेटा सच ही कह रहा हूँ। तू छोड़ इस मुर्गी को। काहे के चक्कर में पड़ गई। मैं तुझे सचमुच की मुर्गी मंगा दूंगा। तुझे मुर्गी बहुत अच्छी लगती है क्या ?
हाँ पिता जी।
दूसरे ही दिन उन्होंने मुर्गी के लिए लकड़ी का एक घर बनवाया जिसे छत पर रख दिया। उसमें मुर्गा- मुर्गी रहने लगे।रम्मू हमारे घर में काम करने वाला उनकी देखभाल करता। मुर्गीघर की सफाई करता।
उन्हें दाना- पानी देता। मौका मिलने पर मैं भी उसके पीछे -पीछे मुर्गीघर चल देती यह देखने के लिए कि वह मेरे मुर्गा -मुर्गी को भूखा तो नहीं रखता।

 कुछ दिनों के बाद छोटे- छोटे मुर्गी के बच्चे  लकड़ी का  दरवाजा खुलते ही बाहर की तरफ भागने 
लगे । मैं चिल्लाई-रम्मू-रम्मू --ये बच्चे कहाँ से आ गए?इन्हें पकड़।  
मैं भी उनके पीछे दौड़ पड़ी। मेरे तो एक भी हाथ नहीं लगा। भागते -भागते हाँफ और गई। रम्मू ने एक मिनट में ही चूजे को उठा अपनी हथेली पर बैठा लिया। शायद उसे मुझ पर तरस आ गया था। बोला -बीबी,ये मुर्गी के अंडों में से निकले हैं। 
अरे वाह !पिता जी ठीक ही बोले -यह सचमुच की मुर्गी है। ला मुझे दे दे। 


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 "न--न गिर गया तो इसे चोट लग जाएगी । अभी तो यह उड़ भी न सके।"
"इसे मैं छू लूँ?"
"हाँ--- हाँ !
मैंने  बड़े प्यार से उसके रुई जैसे कोमल पंखों को छोटी छोटी अंगुलियों से छुआ,धीरे धीरे सहलाया। 
अब तो मैं स्कूल से आते ही छत पर पहुँच जाती। कुकड़ूँ -कूँ,कुकड़ूँ -कूँ की आवाज निकालते हुये मुर्गीघर का दरवाजा धीरे से खोलती । उसमें झाँकती तो कभी मुझे मुर्गी माँ अपने बच्चों को चोंच से दाना  खिलाते मिलती तो कभी प्यार से उन्हें अपने से चिपकाए हुए मिलती।  

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मुर्गी माँ के प्यार को देख मुझे खुशी भी मिलती और  अचरज भी होता  क्योंकि मैं तो  यही समझती थी कि मेरी माँ ही बस मुझे प्यार करती है। स्कूल पहुँचकर अपनी सहेलियों से आश्चर्य भरे मुर्गी घर के  बारे में एक एक बात न कह दूँ तब तक चैन न पड़ता। 

  इस तरह मेरा बचपन ज़ोर ज़ोर से खिलखिलाता –इतराता और मुझे चौंकाता । इन सबमें समाई  खुशी की गंध को मैंने अभी तक सँजोकर रखा है। काश! आज भी बच्चों का बचपन खुली हवा मेँ चौकड़ियाँ भरता नजर आता ! गगनचुंबी इमारतों की भीड़ में कंप्यूटर बने बच्चे न जाने कहाँ खो गए हैं!
समाप्त