नये वर्ष की नई अभिलाषा ----

बचपन के इन्द्र धनुषी रंगों में भीगे मासूम बच्चे भी इस ब्लॉग को पढ़ें - - - - - - - -

प्यारे बच्चो
एक दिन मैं भी तुम्हारी तरह छोटी थी I अब तो बहुत बड़ी हो गयी हूं I मगर छुटपन की यादें पीछा नहीं छोड़तीं I उन्हीं यादों को मैंने कहानी -किस्सों का रूप देने की कोशिश की है I इन्हें पढ़कर तुम्हारा मनोरंजन होगा और साथ में नई -नई बातें मालूम होंगी i
मुझसे तुम्हें एक वायदा करना पड़ेगा I पढ़ने के बाद एक लाइन लिख कर अपनी दीदी को अवश्य बताओगे कि तुमने कैसा अनुभव किया I इससे मुझे मतलब तुम्हारी दीदी को बहुत खुशी मिलेगी I जानते हो क्यों .......?उसमें तुम्हारे प्यार और भोलेपन की खुशबू होगी -- - - - - -I

सुधा भार्गव
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गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

जब मैं छोटी थी



॥19॥गोलमटोल कैथ
सुधा भार्गव 















मैं जब छोटी थी कैथ-- आह! कैथ के नाम से ही मुंह में पानी भर गया ,हाँ तो इसकी खट्टी –मीठी चटनी मुझे बहुत पसंद थी । लेकिन हमारे घर तो कैथ आता ही नहीं था । उसमें खटास जो होती थी और खट्टी चीजें खाना हमारे लिए मना था । इसके नाम से ही घर वालों के  चेहरे बिगड़ जाते----!



 दूसरे यह गरीबों का फल समझा जाता था ।

मेरी  सहेली चम्पा स्कूल में रोज कैथ की चटनी लाती और रोटी से लगा कर खाया करती ।

रोटी और कैथ की चटनी
 मैं उसकी  तरफ टुकुर –टुकुर देखती । एक दिन उसने  तरस खाकर मुझे भी आधी रोटी पर  थोड़ी सी चटपटी चटनी रख कर दे दी । आह  क्या स्वाद । जीभ के तो मजे । मुँह में बल खाती  हुई झूम सी रही थी । अब तो रोज ही  हिस्सा बाँट होने लगा और वह मेरी  सबसे अच्छी सहेली बन गई ।

प्यारी -प्यारी सहेलियां  
एक दिन मैंने  पूछा –चम्पा ,कैथ कैसा होता है ?
-तू इतना भी नहीं जानती !वह तो गोल –गोल ,सफेद –सफेद ,पीला –पीला होता है और अंदर से बादामी रंग सा   सुनहरा -सुनहरा । उसने अपना एक हाथ गोलाई में घुमाते कहा ।
-मैंने तो कभी देखा ही नहीं । सच्ची –मुच्ची कह रही हूँ ।
-चल –चल तुझे अभी दिखती हूँ ।
मेरा उसने  एक हाथ पकड़ा और खींचती हुई स्कूल के बाहर ले गई । 
 वह खुशी से चहकी । देख –देख उस ठेले वाले को ---चूरन –चटनी और लेमंजूस के पास ,टूटे हुए कैथसे भूरा –भूरा गूदा कैसा झांक  रहा है !एक के ऊपर एक ,तीन -तीन शरारती कैथ! हमें  बुला रहे हैं।  



 ठेले के पास आने पर

मैं अपने को रोक न सकी –आह! इसका खट्टा-मीठा गूदा खाया जाए । बिना खाये ही  जीभ चटकारे लेने लगी ।
-भैया 5 पैसे का कैथ दे दो जरा । मैंने ठेलेवाले से कहा  ।
एक मिनट भी नहीं गुज़रा कि मैंने फिर अपनी बात दोहरा दी ।
-देता हूँ लल्ली,देता हूँ । जल्दी काहे मचावत है ।
-हमारा नंबर आते –आते सारे कैथ खतम हो गये तो ----
-अच्छा ले –पहले तुझे ही दिये दूँ । वैसे मेरे  झोले में कैथ भरे पड़े हैं। 
-भैया ,मुझे एक साबत कैथ हाथ में दे दो  ।मैं उसे छूकर देखूँगी ।  मैंने तो  आज से पहले  इसे   देखा ही नहीं था  ।
-गज़ब की बात करे है तू तो । ले अभी थमाऊँ तोय ।

उस गोल –मटोल कैथ पर मैं तो रीझ गई । मेरा बस चलता तो मैं उसे  लेकर  भाग जाती ।
 मुझे लगा –कैथ मुझपर हंस रहा है और कहना चाह रहा है –कैसी छोरी है तू –अभी तक मुझसे नहीं मिली थी । अरे मुझ पर तो बच्चे जान देते हैं ।
मुझे उसकी हंसी चुभ सी गई और उसी पल निश्चय कर लिया –मौका मिलते ही एक पूरा कैथ खाकर रहूँगी । 
ठेलेवाले ने पत्ते के बने  दोने में कैथ का टुकड़ा रखा ,उसपर नमक छिड़का और हमें पकड़ा दिया । लेकिन उससे क्या मेरा जी भरने वाला था ।

स्कूल से घर जाने के दो रास्ते थे । एक गली –गली घूमते घुमावदार छोटा रास्ता ,दूसरा बाजार जाते हुए सीधा मगर लंबा रास्ता । उस दिन ही पूरा का पूरा कैथ खाने का भूत सवार हो गया । स्कूल की छुट्टी होते ही भागी अकेली सब्जी मंडी की ओर । कभी अकेली सब्जी मंडी गई नहीं थी । बड़े से मैदान में टोकरियों में रखी सब्जियाँ या आलू शकरकंदी ,तरबूज की ढेरियाँ ही ढेरियाँ दिखाई दे रही थीं ।
कैथ कहाँ ढ़ूंढू—किससे पूंछूं ?मैं तो सकपका गई ।
बेर बेचने वाले से पूंछा –भैया ,कैथ कहाँ मिलेगा ?
-लाला परचूनी की दुकान के पास । यहाँ से सीधी चली जाओ ।
चलते –चलते घबराहट होने लगी । कच्चा रास्ता कीचड़ से भरा –चप्पल घुस जाती तो निकलने का नाम न लेती,लेकिन कैथ खाना था तो खाना था ।

एक टोकरी में सफेद –सफेद गेंदे सी लुढ़क रही थीं। आँखों में कुछ चमक आई। 


कैथ की टोकरी


-यह कैथ है क्या ?
-हाँ !कैसा लेना है –कच्चा या पका ? टोकरी वाले ने पूछा  । 
कच्चा –पक्का ! दिमाग घूम गया ।
-मैं उस पर नमक छिड़ककर उंगली से निकाल निकाल कर खाऊँगी ।
 -तोड़ दूँ क्या कैथ को ?
-हाँ –हाँ ! उस पर नमक भी छिड़क दो । लगा जैसे मुझे कुबेर का खजाना मिल गया हो ।
थोड़ा चखते ,स्वाद लेते अपने घर का रुख लिया जो पटपरी मोहल्ले में था । रास्ता लंबा था पर मैंने  चाल घीमी कर रखी थी ,घर पहुँचते –पहुँचते कैथ जो खतम करना था ।यही डांट से बचने का एकमात्र तरीका था

 हवेली के दरवाजे पर दस्तक देने से पहले छिलका फेंक दिया  और हाथ को मुँह की तरफ  ले जाकर फ्रॉक की बाँह से मुँह पोंछ लिया । मेरा तो यही रुमाल था । इसी कारण बाँह अक्सर गंदी दिखाई देती ।
टिफिन खाते समय घर का सिला नैपकिन होता । उसे कभी ले जाती ,कभी भूल जाती । स्कूल में इसके बारे में कोई कठोर नियम  न था सो सब चलता था । घर में जरूर कुछ कठोर नियम थे पर उनके होते हुए भी अपना काम तो चल ही जाता था ।

उस दिन तो चेहरे पर विजयी मुस्कान लिए बेधड़क घर  में घुसी और कैथ भी तो मेरे पेट में पड़ा –पड़ा हँसकर मेरा साथ दे रहा था । सोते समय  प्रार्थना करती रही –हे भगवान ऐसी कोई तरकीब करो जो खूब कैथ खाने को मिलें । झपकी आते ही गज़ब का सपना  देखा- एक बंदर


धोखेबाज बंदर 
 पेड़ पर बैठा खूब कैथ खा रहा है और मेरे लिए नीचे गिराता जा रहा है।लेकिन सुबह उठी तो मालूम हुआ कि वह धोखेबाज मेरे  हिस्से के भी लेकर भाग गया । 

छविकार -सुधा भार्गव   

क्रमश : 

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

जब मैं छोटी थी


॥18॥ मूंछ मलाई

सुधा भार्गव
 
छुटपन में मुझे मलाई खाने का बड़ा शौक था । रसोई में बड़ी सी लोहे की कढ़ाई में दूध औटता फिर मंदी –मंदी  आंच में पकता तो सारा घर महकने लगता और मेरी  नाक में उसकी खुशबू घुसती चली जाती । ठंडे  होने पर तो मलाई  की ऐसी मोटी परत जमती कि बस पूछो मत ।  अगर मैं बिल्ली होती तो सारी मलाई  चट कर भाग जाती ।

मलाई खाने का अरमान मेरे दिल में ही रह जाता क्योंकि सारी मलाई ज़्यादातर बाबा जी के हिस्से ही आती ।

मेरे बाबा

बाबा जी दोपहर को खाना खाने के बाद मलाई –बूरा या दही –बूरा खाते थे । दादी के जमाने से उनका एक चांदी का कटोरा था ।
चमचमाता कटोरा 

रात के खाने के बाद  उस चमकते कटोरे में वे  दूध पीते और उस दूध में तैरती रहती मेरे हिस्से की मलाई  । मन मारकर देखती रहती उस कटोरे को बाबा के कमरे में जाता देखकर । समझ नहीं आता था बाबा को मलाई वाला और हमें पानी सा दूध क्यों मिलता है ?
घरवालों का ज्यादा मन चलता तो हलवाई की दुकान से मलाई वाला  दूध आ जाता ।

बादाम -पिस्ते वाला दूध 

 मिट्टी के कुल्हड़ वाला सौंधा –सौंधा मेवे वाला दूध भी अच्छा लगता था पर डाक्टर बाबा न जाने बाजार का दूध क्यों नहीं पीते थे,मिठाइयों की तरफ तो देखते भी न थे । 

यह तो मेरी बुद्धि में बहुत बाद में घुसा कि डाक्टर होने से बहुत सोच समझकर खाते थे ।  पर  यह अच्छी तरह समझ गई थी कि सारा घर बाबा को बहुत प्यार करता है और उनका ध्यान रखता है ।

एक रात करीब 9बजे अम्मा दूध का कटोरा लिए बाबा के कमरे की ओर  जा रही थीं । जैसे ही बाबा ने उसे अपने हाथों में थामा मैं और मेरा छोटा भाई उनके बायेँ-दायें घर वालों की नजरों से बच –बचाकर जा बैठे । हम ऐसा तभी करते थे जब उनसे कुछ पाना होता था । दूध पीने की चम्मच हाथ में थामते हुये बोले –क्या बात है बेटा ,कुछ चाहिए क्या ?
-हाँ बाबा !मलाई चाहिए –आपके  दूध  में बहुत सारी है ।
-ठीक है !दूध पीते समय तुम्हें जब मलाई दीखे तो मुझे रोक देना ।
हम दोनों बड़े खुश । आँखें चमचमा उठीं ।

बाबा ने पहली  बार जब  चम्मच से  दूध भर कर मुंह तक ले जाना चाहा  ,हमें लंबी सी मलाई उससे लटकती नजर आई ।
-रुको बाबा रुको –मलाई है । हम दोनों चिल्लाये ।
बाबा की चम्मच जहां थी वहीं रुक गई ।
भाई ने धीरे से मलाई उतारी और बिना हिस्सा बाँट किए खा गया । मुझे उस पर बहुत गुस्सा आया ।
दूसरी –तीसर्री बार बाबा ने दूध पीया पर चम्मच में जरा सी भी अटकी
मलाई नजर नहीं आई । मैं बहुत दुखी हो गई । ज्यादा दुख तो इस बात का था कि भाई को तो मलाई मिल गई पर मुझे नहीं मिली ।

बहुत सावधान होकर बैठ गई कहीं इस बार भी वह  मलाई न झपट ले । तभी देखा मलाई का बड़ा सा टुकड़ा बाबा की बड़ी –बड़ी मूँछों में लटक गया है ।
- बाबा मूंछ मलाई !
बाबा हैरान । चम्मच सहित उनके हाथ तो रुक गए पर मेरे कहने का मतलब न समझे ।
मैंने धीरे से मूंछ से मलाई को अलग किया ताकि बाबा का कोई मुच्छी बाल खिच न जाए । आखिर वे मेरे प्यारे बाबा थे मगर मलाई खा गई।  आह !उस दिन कितनी खुश थी कह नहीं सकती ।प्यार भरे दिलों में निर्मलता से बहते झरने जैसा था मेरे  बचपन का रंग।      
जब भी किसी बच्चे को अपने बाबा की उंगली पकड़ते जाता देखती हूँ मुझे अपने बाबा की याद आ जाती है ।


वैसे बच्चों मूंछ  वाले बाबा लगते बहुत अच्छे हैं और आजकल तो फैशन चल पड़ा है नकली मूंछें लगाने का और कुछ  तो इलाज करवा रहे हैं ताकि मूंछें उग सकें ।

इसका मतलब तुम्हारे बाबा की मूंछें भी बड़ी बड़ी हो सकती हैं ।


अच्छा फिर मिलेंगे ---।

* * * * *

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

जब मैं छोटी थी



 ॥17॥खेलमखेल

       सुधा भार्गव   



अल्लम -गल्लम -खों -खों 
उछलो  -कूदो ---हों --हों 
मैं जब छोटी थी मुझे खेलने का बड़ा शौक था । यह  निश्चित था कि हम भाई –बहन शाम को एक घंटे जरूर खेलने जायेंगे पर एक घंटे से क्या  होता है । हम खींचतान कर उसे डेढ़ घंटा तो कर ही देते थे । वैसे तो घर में हमें फाँसने के लिए बहुत से खेल थे –लूडो ,कैरम ,व्यापार ,साँप सीढ़ी आदि –आदि । पर जो बाहर दौड़ा दौड़ी मेँ आनंद था वह घर में कहाँ !

इतवार की इतवार घर से बाहर छोटे से मैदान में क्रिकेट खेला जाता था । चाचा जी पिता जी और उनके दोस्त खेला करते  । मुझे तो खेलने का कोई मौका ही नहीं देता था, बस दूर –दूर से गेंद उठाकर लाने का काम था । मैं तो हाँफ जाती थी मगर खड़ी रहती  शायद चांस दे दें । जिस दिन चांस मिल जाता  खुशी से जमीन पर पैर नहीं पड़ते थे ।

मुझे तो लट्टू घूमता बहुत अच्छा लगता था । मानो वह कह रहा हो –देखो –देखो एक पैर पर कैसा नाच रहा हूँ ,तुम भी मुझे नचाओ । मेरी तरह से तुम्हें भी खुशी मिलेगी ।

घूम -घूम लट्टू ,
मैं भी हो गया  लट्टू 
 बस मैंने भी सोच लिया लट्टू घुमाना सीख कर ही रहूँगी । किसी तरह से बाजार से तो ले आई पर दिमाग में खलबली मच गई सीखू किस्से !दोस्तों से सीखाने को कहती तो हँसी उड़ाते –लो इसे इतना भी नहीं आता --। भाई की 2-3 दिनों तक खुशामद की तब उसने मुझे सिखाया 

। लट्टू तो मेरा गोल –गोल जमीन पर घूमने लगा पर उसे हथेली पर कभी न उठा सकी । इसका अफसोस आज भी है ।

लाल -पीली -नीली गोलियां
सुन्दर सी  हमजोलियाँ 
गोल –गोल चमकती –लुढ़कती काँच की गोलियों की तरफ मैं खिंची चली जाती । उनसे मैं खेलती तो नहीं थी पर वे मुझे  बहुत सुंदर लगती थीं  । उन्हें कंचे कहते थे । एक लड़का अपने कंचे से दूसरे लड़के के कंचे में उँगलियों के सहारे निशाना लगाता । कामयाब होने से निशाना लगाने वाले का कंचा हो जाता । 
हार -जीत का रेला
दुःख ने आकर  घेरा 

एक दिन छोटे भाई की जेब में कंचे खनखनाते हुये सुन  समझ गई  -वह बाहर उनसे  खेलने जाने वाला है । मैं  भी उसके साथ हो ली । मगर वह अड़ गया –आप नहीं जाओगी ,किसी की बहन खेलने नहीं आती ।
-अरे मैं खेलूँगी नहीं --। बस देखूँगी ।
-नहीं --। मैं नहीं ले जाऊंगा ।
-तब मैं पिता जी से तेरी शिकायत लगा दूँगी ।
पिता जी इस खेल के सख्त खिलाफ थे इसलिए मेरी  धमकी  काम कर गई । पर उसका मुँह फूला ही रहा जितनी देर खेला ।

घर से बाहर हमारे खेलने को–इप्पल –दुपपल ,कीलम काटी झर्रबिल्इया ,चूहा भाग बिल्ली आई -----





,घोडा है जमालशाही पीछे देखो मार खाई

 न जाने कितने खेल थे| 

गिल्ली  -गिल्ली उछल हवा में
वरना डंडा मारूँगी 
लेकिन मेरा मन तो  गिल्ली –डंडे  मेँ लगता था  ।
 मेरा एक थैला गिल्लियों से भरा रहता । बढ़ई काका खूब बना-बना कर देते  । एक खो जाय तो दूसरी हाजिर । अक्सर छोटे डंडे से गिल्लियाँ उड़ जातीं  जो मिलती नहीं थीं । कभी –कभी अपने साथियों को भी गिल्ली दे देती ,फिर वे मेरी बात बहुत मानते ।

 इस खेल पर कोई पाबंदी भी नहीं थी ,पिताजी- ताऊ जी तो खुद खेलते थे। एक बार  ताऊ जी गिल्ली खेल रहे थे । काफी दूर पर उनकी बेटी खड़ी तमाशा देख रही थी । ताऊ जी ने ज़ोर से गिल्ली को डंडे से उछालकर उसमें ज़ोर से ऐसा छक्का मारा कि उसकी नोंक दीदी की आँख में चुभ गई और ले बैठी उनकी आँख की रोशनी । तब से थोड़े सावधान हो गए  पर गिल्ली खेलनी नहीं छोड़ी ।

ठंड  मेँ दिन छोटे होने के कारण हमें शाम को खेलने का मौका कम मिलता ।पर  उसकी कसर स्कूल की छुट्टी के दिन खूब निकालते ।
छुट्टी के दिन सबसे आनंद दायक हमारा इकलौता खेल होता -कूदमकूद

 एक कमरे मे दो बड़े –बड़े अलम्यूनियम बॉक्स  थे जिनमें गद्दे –लिहाफ रखे जाते थे । वे केवल सर्दियों मेँ खुलते थे ।



 सर्दी की एक सुबह नौकर ने बिस्तरे ठीक किए और लिहाफों की  तह करके उन्हें बक्सों पर रख दिये । दोपहर को खाना खाने के बाद हम भाई –बहन उस कमरे मेँ घुस गए ।हमारे बाद अम्मा ने खाना खाया ।छोटे भाई को  सुलाते वे भी सो गईं ।हमें धींगा मस्ती का समय मिल गया।और तो और अंदर से कमरे की कुंडी भी लगा ली ताकि कोई नौकर शिकायत न कर दे ।हम भाई –बहनों ने छोटे –छोटे हाथों से बड़े–बड़े लिहाफ नीचे खींच लिए फिर उन पर खूब कूदे –उछले ।

 कोई कहीं गिरा कोई कहीं लुढ़का ।  अम्मा ने हमारे लिए अलग से तकिये बनाए थे हम छोटे थे तो हमारे तकिये भी छोटे थे । उन्हें एक दूसरे पर पूरी ताकत
 लगाकर  फेंकने लगे । जब वह किसी  के सिर या मुंह से टकराता तो खूब हँसते  
—इतना हँसते कि पेट मेँ बल पड़ जाते । कितना समय निकल गया पता ही नहीं चला पर अम्मा की नींद टूट गई ।

हममें से किसी को आसपास न देख खोजख़बर लेने मेँ जुट गईं । दरवाजा बंद देख अम्मा को हमारी शैतानी का अंदाजा लग गया और कुंडी खटखटा दी ।एक मिनट को हम सब बुत बन गए ।उपद्रव करने वाले हाथ रुक गए । डांट के डर से समझ नहीं पाये क्या करें । लिहाफों की तह करके उन्हें बाक्स पर रख नहीं सकते थे ,माँ का सामना करने से बच नहीं सकते थे ।

मैंने दरवाजा खोला ,अम्मा ने जोर से मेरा कान ऐंठ दिया । समझ गईं –यह किसके दिमाग की उपज  है ।दोनों भाई छिपने की कोशिश करने लगे कोई दरवाजे के पीछे ,कोई पलंग के नीचे । अम्मा को ज्यादा गुस्सा नहीं आता था पर उस दिन तो मेरी बांह मेँ चीकुटी भी काटी थी लगा जैसे लाल चींटी ने काट खाया हो ।

बाप  रे !
इतने मेँ पिता जी न जाने  कहाँ से आ गए।पहले तो  टेढ़ी नजर से देखा और फिर दहाड़ने लगे   –तुमने इन बच्चों को बिगाड़ दिया है ।निकालो  इन्हें कमरे से --–अभी सबक सिखाता हूँ ।

माँ का गुस्सा कपूर की तरह उड़न छू होगया | हमें अपने स्नेही आँचल मेँ छिपाकर पिता जी की  आँखों से दूर ले गईं  ।

आज भी शैतानियाँ करने को मन करता है पर बचाने वाला कोई  नहीं !
काश !आज भी वह स्नेह कवच मेरे इर्द गिर्द लिपटा होता ।


















* * * * * *



मंगलवार, 4 सितंबर 2012

जब मैं छोटी थी


॥ 16॥ चोर- डाकुओं की धमाचौकड़ी 
सुधा भार्गव 





बचपन में 

 मुझे कुछ ज्यादा ही चोर डाकुओं से डर लगता था |करती भी क्या --!अनूपशहर छोटी सी जगह पर आये दिन चोरी -डकैती की बातें !
रात में  डरावने चार सींगों बाले सपने आने शुरू हो जाते --मेरी तो जान ही निकल जाती |चूहा भी फुदकता तो लगता जरूर किसी चोर ने दरवाजा खोला है --बस आया --आया |जागता हुआ देखेगा तो जरूर मेरे मुँह में कपड़ा ठूंस  देगा जिससे चिल्ला न सकूँ |हाथ पाँव रस्सी से बाँध दिये तो भाग भी न पाऊंगी |क्या करूँ !हाँ ध्यान में आया ,उसके आते ही आँखें मींच कर सोने का ऐसा नाटक करूँगी कि बच्चू भुलावे में आ जायेगा |मैं कम चालाक थोड़े ही हूँ |

सच में----

मैं आंखें कसकर भींच लेती  पर अन्दर ही अन्दर काँपती  --होठों पर शब्द थरथराते  -
भूत 

जय-जय हनुमान गोसाई
कृपा करो गुरू देव की नाई

भूत -पिशाच निकट नहीं आवे
भूत -पिशाच निकट नहीं आवे

नहीं आवे --------नहीं आवे --

एक दिन तो गजब हो गया !

थाने के पास एक सेठ जी की हवेली थी| वे शहर  से काफी रूपये लेकर लौट रहे थे कि बस में बंदूक की नोक पर डकैतों ने लूट लिया |
अग्रवाल ताऊ के तो दो दिन पहले ही डाकुओं की चिट्ठी आ गई -सावधान !हम रात को आ रहे हैं --!
वे  वास्तव में ही  आ गये |उनकी माँ चिल्लाई तो गोली मार दी ,ताऊ जी से अलमारी की चाबी लेकर उन्हें रस्सी से बाँध दिया और ले गये सारे के सारे -सोने - चांदी के जेवर और रुपया पैसा।उन्हें बचाने को न पड़ोसी आया और  
न ही सिपहिया  जी ।

 बहुत दिनों तक मैं परेशान रही और इतना समझ में आ गया कि मुसीबत में कोई काम आने वाला नहीं |


तब से मैं अपनी चीजों को बहुत सावधानी से रखती । छोटी सी संदूकची में किताबें भरकर स्कूल जाती थी, उसमें ताला लटकने लगा |माँ से कहती -अलमारी खुला न छोड़ा  करो ।पिताजी रात में घर के ख़ास दरवाजे की कुंडी में अलीगढ़ का मोटा सा  ताला लगाकर सोया करते ,उनके साथ साथ भी मैं  जाने लगी। पिता जी से कहती--- ताला खींच कर देख लीजिये कहीं खुला न रह गया हो ।


  पिता जी के पास बड़ी से बंदूक थी| रात में सोते समय उसे अपने उलटे हाथ की ओर गद्दे के नीचे रखकर सोते |उसे देखते ही दिमाग में खिचड़ी पकने लगती -- पिताजी तो दुबले पतले हैं |बंदूक को चोर की ओर तानने में उन्हें समय लगेगा !इतनी देर में कहीं चोर उनके हाथ से बंदूक छीन ले और उलटे उन्हीं के सीने पर दोनाली बंदूक रख दे तो---- हे भगवान्! क्या होगा !मैं अपना माथा पकड़ लेती ।
घर में कोई अजनबी आता तो उसे घूर -घूर कर देखती कहीं भेदिया तो नहीं है और चोरी करवा दे |अम्मा तो गुस्से में कह देतीं -- इसका तो शक्की दिमाग है --|

एक बार अम्मा को नानी से मिलने आगरा जाना पड़ा| मैं और छोटा भाई चाची के पास रहे |चाची -चाचा जी हमें बहुत प्यार करते थे ।

उस दिन  

स्कूल से लौटकर देखा-- एक अजनबी औरत चाची के साथ खाट पर बैठी मटर छील रही है |उसको देखते ही मैं चौकन्नी हो गयी और कान उनकी बातों से जा चिपके |

चाची कह रही थीं --मेरी बहना सत्तो ,मटर तो मैं छील लूंगी --तू जाकर मेरे  बर्तनों की अलमारी जरा ठीक करदे |नये गिलासों पर नाम भी खुदवाना है |नाम खोदने वाला नीचे बैठा है |
-क्या नाम लिखवाओगी? जीजा जी का नाम तो ओमी है |
-पहचान के लिए केवल 'ओ ' ही काफी है |

सुनते ही मेरा तो दिल बैठ गया |जिस कमरे में चाची की बहन जी जाने वाली थीं वहाँ  बर्तन रखने के लिए दो छोटी अलमारी रखी  हुई थीं -एक चाची की  दूसरी अम्मा की |एक हफ्ते पहले मुरादाबादी २४ गिलास  खरीदे गये थे |पीतल के होते हुए भी  झकाझक चमक रहे थे |


चाची ने अपने गिलास अपनी अलमारी में रख दिये और अम्मा दूसरी  अलमारी में रख कर चली गईं  । अलमारियां खुली ही रहती थीं  बस चिटकनी बंद रहती थीं ।  इन दिनों तो मुझे  चारों तरफ चोर ही चोर   नजर आते । |मन का भूत बोला - सावधान -तुम्हारी माँ का  एक  गिलास तो  गायब होने वाला है ही ।


मैंने जल्दी से किताबों की बकसिया जमीन पर पटकी |भागी -भागी कमरे में गई और अम्मा की अलमारी के आगे पहरेदार की तरह खड़ी हो गई।

सत्तो काकी कमरे में आईं और बड़े इत्मिनान से १२ गिलासों पर -ओ -लिखवाने के बाद दूसरी अलमारी की ओर बढ़ीं  | मैं बिदक पड़ी --

-यह तो अम्मा की अलमारी है --|

-हाँ --हाँ मालूम है --जरा परे हट ,क्या चौकीदार की तरह खड़ी है |
मन मारकर मैं रह गई| काश !मैं भी उनकी तरह बड़ी होती तो ----?

उन्होंने छ :गिलास निकाले और उनपर 'ओ ' खुदवाने लगीं |

-ये तो अम्मा के गिलास हैं !
-अरे चुप रह !ख़बरदार जो किसी से कहा ---!
-अम्मा से भी नहीं-- !

मेरे शब्दों ने उनका मुँह सी दिया ।   इस गलत काम  से मैं  गुस्से में  फुसफुसा रही थी  ----

चोरी चटाक
तेरा --तेरा --
भोलुआ पटाक ।

माँ के आते ही मेरा इंजन चालू हो गया ----

-माँ --माँ, सत्तो काकी ने आपकी अलमारी में से ६गिलास निकाल लिए और उन पर ओ खुदवा दिया है |वे चाची की अलमारी में रखे  हैं |
-क्या मेरा -तेरा लगा रखा है ..जिस घर में जायेगी दो टुकड़े करा देगी --पूरी बात सुने बिना ही वे मुझ पर विफर पड़ी । |
सोचा था -- जासूसी पर मुझे  शाबासी मिलेगी मगर यहाँ तो सब गड्ड मड्ड हो गया| मैं रुआंसी हो गई |

माँ को शायद दया आ गई |प्यार से बोलीं --
-बेटा ,गिलासों में इसी घर के लोग तो पानी पीयेंगे ,फिर क्या फर्क पड़ता है वे मेरी अलमारी में रहें या चाची की अलमारी में |
ऊपर से मैं खामोश थी मगर अन्दर ही अन्दर उबाल खा रही थी --अम्मा बहुत सीधी  हैं ,इन्हें तो कोई भी लूटकर ले जायेगा |

उस समय मैं  उनकी बात नहीं समझी थी पर जैसे -जैसे प्रौढ़ता की चादर तनती गई उनकी सहृदयता व सहनशीलता की छाप मनोमस्तिष्क पर गहराने लगी |अब तो माँ  हमारे मध्य नहीं हैं पर उन्होंने डांट के साथ जो सीख दी ,उस से अंकुरित   फल -फूलों  से मेरी बगिया महक -महक पड़  रही है ।

फोटोग्राफी -सुधा भार्गव 

(अन्य समस्त चित्र गूगल से साभार )




शनिवार, 19 मई 2012

जब मैं छोटी थी

                                                           
  ॥15॥ चित्रकूट के रामघाट
सुधा भार्गव 

तुलसी के राम 

राम के हनुमान 
हनुमान के बानर 

चित्रकूट में !
 मेरी जन्मस्थली अनूपशहर बंदरों के लिए मशहूर  है पर मुझे छुटपन में  उनसे डर  लगता था ।मोहल्ले में 
मदारी बंदरों का तमाशा दिखाने  आता  तो देखती जरूर पर बहुत दूर से ।


 खाना बनाने वाली महाराजिन ताई ने एक दिन सम झाया--लल्ली,बंदर से डरेगी तो वह और डराएगा ,उसे देख भागेगी तो वह तेरे पीछे भागेगा इससे तो अच्छा है उनका डटकर मुकाबला कर ।
-मुकाबला करूँ !कैसे ताई ?  वह तो मुझे खा जायेगा !
न-- न -- शुभ -शुभ बोल बिटिया !  बन्दर को पास आते देख जो भी हाथ लगे -दांडी लाठिया या पत्थर ,उसे थाम बन्दर की ओर निशाना लगाने का नाटक कर ,वह तुरंत सहम जायेगा फिर धीरे -धीरे उसकी तरफ बढ़-- देखिओ दुम दबा कर भागेगा ।
मैं खुशी से उछल पड़ी और ताली बजाती बोली -अहा! अब तो लाल मुँह के बन्दर मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते ।
लेकिन एक महीने  बाद ही मुझे कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ा ।

 गर्मियों की छुट्टियों में हम मामा जी से मिलने बांदा(यू .पी .)गये I वहाँ से चित्रकूट कार से जाने का प्रोग्राम बना ।
मामा जी ने रास्ते में बताया -चित्रकूट  मंदाकिनी  नदी के किनारे बसा   है ।यह नदी छोटी गंगा भी कहलाती है ।
   वहां  बने सारे   घाट रामघाट कहे जाते  हैं क्योंकि राम लक्षमण और सीताजी  वहां नहाये थे । तुलसीदास जी  ने चंदन घिसकर राम जी के  तिलक लगाया था
तब तो मैं भी वहाँ उनसे  चन्दन लगवाऊँगी --सोचकर  उमंग से भर उठी ।
कार घाट से थोड़ी दूर पर ही रुक गई । सबने अपने -अपने नहाने के कपड़े प्लास्टिक बैग में लिए और चप्पल हाथ में पकड़ लीं  क्योंकि हमें  नंगे पैर पानी में चलकर जाना था ।एक ओर  पहाड़ियों  से बहता  जल चांदी की तरह चमक रहा था और सामने ----
 गंगा की एक पतली धारा इठलाती हुई छोटे -छोटे पत्थरों को भिगोती जा रही थी । उस में छपछप करती मैं आगे -आगे भागने लगी ।  कुछ दूर ही चली होऊंगी कि कदम रुक गये -----

पेड़ों पर बैठे   बन्दर झुण्ड की झुण्ड में गपशप कर  रहे थे ,कोई  कलाबाजी दिखा रहा था तो कोई  बेधड़क आने -जाने  वालों को घूर रहा था ।  मुझे तो लगा यह बंदरों का घाट है |




मैं चारों तरफ लट्टू की तरह आँखें घुमाने लगी  कि कोई बानर चिपट न जाये । नये बन्दर नयी जगह--- उनसे टक्कर लेना ठीक न समझा ।अम्मा आईं तो उनसे चिपक कर चलने लगी । तभी एक काले मुँह के बन्दर ने हमारा रास्ता काट दिया |मेरी तो चीख ही .निकल गई -काले मुँह का  बन्दर --यह  कहाँ से पैदा हो गया ।
सीधे हाथ को लाल मुँह के बन्दर और --और उलटे हाथ को काले मुँह के बन्दर !उनकी पूंछ भी इतनी लम्बी कि उसमें लपेटकर एक झटके में मुझे  ऊपर उछाल दें  ।
- डर मत बेटी,
ये काले मुँह के बन्दर लंगूर हैं --  बड़े सीधे  -सादे ।


-ये कालू क्यों हैं |
-,एक बार जंगल में आग लग गई । हनुमान जी की बानर सेना के कुछ बंदरों के मुँह जल गये,बस उन्हें लंगूर कहने लगे |
माँ  की बातें सुनकर मुझमें कुछ हिम्मत आई ।
छोटी  गंगा के घाट पर हम सब  पहुंचे ,बड़ी भीड़ थी ।




मेरी निगाहें तुलसीदास जी को  खोजने  में लग गईं  । थोड़ी दूर पर देखा -  चौकी पर एक लड़का  बैठा  है और  चंदन घिसकर  लोगों के तिलक लगा रहा है ।




 मैं बड़े अचरज से बोली -
-माँ ,ये तुलसी दास जी तो बड़े छोटे  हो गये हैं । आप की रामायण में तो बड़े -बड़े हैं ।
-अरे यह  तुलसीदास नहीं !|वे तो कई सौ साल पहले हुए थे ।अब भगवान् के घर बैठे हैं ।
-तो मैं उनसे नहीं मिल सकती ----|मैं दुःख से भर उठी |
बेमन से  नहा -धोकर लम्बा सा लाल चंदन का मैंने  टीका लगाया और  रट लगानी शुरू कर दी --जल्दी चलो भूख लग रही है।
भीगे कपड़ों की डोलची उठाई और लम्बे -लम्बे कदम रखती आगे -आगे चलने लगी |

पीछे से मौसी की आवाज आई ---
-मुन्नी ,साथ साथ चल |यहाँ के बन्दर बड़े खतरनाक हैं |
भला मैं उनकी बात क्यों सुनने लगी फिर बंदरों को भगाने वाली महाराजिन ताई की तरकीब मैं जानती थी |

थोड़ी दूर चलने पर ही मुझे लगा जैसे किसी ने मेरी उँगलियों पर अपने नाखून गड़ाये हों |घबराहट से मेरी पकड़ ढीली हो गई | देखा --एक बन्दर मेरी डोलची लिए भागा जा रहा है ।
मैं चिल्लाई ----बन्दर --बन्दर ! डोलची ले गया |
मामा जी ने तुरंत उसकी तरफ एक केला फेंका । बन्दर ने उसे फुर्ती से लपका और पेड़ पर चढ़ गया ।
  डोलची को नीचे ही छोड़कर जुट गया उसे  खाने में |
 मैं झट उसको उठा लाई ।

अब तो इस गंगा के घाट को जल्दी छोड़ने में ही भलाई हैं । ये बन्दर फिर न कोई बखेड़ा खड़ा कर दें -मामाजी बोले ।
कार में बैठते ही सब जोर से चिल्लाये --गंगा मैया की जय---श्री रामचंद्र की जय --|मैं चुप ही रही  ।
-तेरा मुँह क्यों फूला हुआ है ? माँ ने गुस्से में देखा ।
-मुझे बानर सेना पर बहुत गुस्सा आ रहा है हनुमान जी से मिलूंगी तो इनकी शिकायत जरूर करूंगी |
मेरी बात पर थके चेहरे हँसी से झिलमिलाने लगे ।
मैं गुस्सा और ये सब हँस रहे हैं मुझे और भी ज्यादा गुस्सा आने लगा |
वैसे मुझे अभी तक हनुमान जी  मिले  नहीं हैं  ।अगर आप में से किसी को मिलें तो जरूर बताना , मेरा पता तो आपको मालूम है ही
                                                                                                                                                                           

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

जब मैं छोटी थी ----

॥14॥ मैं और मेरी किताबें
सुधा भार्गव 
बचपन से ही मुझे अपनी पढ़ी हुई  किताबों से बहुत मोह थाI एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जाती तो पिता जी चाहते --किताबें किसी जरूरतमंद को दे दी जायें I
जैसे ही किताबों को देने की बात उठती मैं उनपर साँपिन की तरह कुंडली मार कर बैठ जाती और दूर -दूर तक निगाहें दौड़ाती --कोई इन्हें छूकर तो देखे I इसे मेरी नादानी कहो या मोह ,पिताजी तो मुझे देख हँस देते पर माँ ----
--कबाड़िया है कबाड़िया !दीमक चाट जायेंगी किताबें पर देगी नहीं किसी को I दहेज तैयार कर रही है दहेज़ !
उनकी बातें समझने की न मेरी उम्र थी न जरूरत I किताबों को बस जल्दी से अलमारी में सजा देती । इस मामले में इतनी डरी रहती थी कि उसमें एक छोटा सा ताला भी जड़ दिया I चाबी रखने की जगह बार -बार बदलती रहती कि कहीं वह किसी के हाथ न लग जाये और हो जायें मेरी किताबें चोरी ।
मैंने कक्षा 6 में कबीर के दोहे पढ़े ,बड़े अच्छे लगे ।

फिर मीरा और सूर में रूचि लेने लगीI तुलसीदास जी की चौपाईयां, दोहे ,छंद और सोरठा बड़ा परेशान करते थे I जायसी को पढ़ते समय तो दिमाग ही गायब हो जाता I तब भी इनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी चाहती I
अनूपशहर छोटी सी जगह --एक दो मुश्किल से किताबों की दुकानें I आठवीं कक्षा में पढ़ते समय कक्षा १० के स्तर की किताबें उठा लाती और हाई स्कूल में कक्षा १२ के स्तर की किताबें I बड़े चाव से भक्ति मार्ग के कवियों को पढ़ा करती I कोई भी कर्मचारी मेरठ ,अलीगढ़ या बुलंदशहर जाता तो ऊंची आवाज हो जाती - - पिता जी इनसे कहिये दुकानदार से किताबों का सूचीपत्र जरूर ले आयें I मेरी मन पसंद किताब को फिर वे डाक से मंगवाते I उन्होंने कभी मना नहीं किया I
धीरे -धीरे इस शौक के पंख लग गये।

रवीन्द्र ठाकुर का साहित्य , शरतचंद्र चटोपाध्याय के उपन्यास ,बंकिम चन्द्र ,मैथिलीशरण गुप्त का रचना संसार मेरी अलमारी में बसने लगा I
छोटे से कुंडे में छोटा सा ताला--- अलमारी का अच्छा खासा पहरेदार था ।
एक दिन अलमारी में   नीचे के रैक में अम्मा ने रंगीन् कागज में लिपटे कुछ उपहार रख दिये  I मुझे उनसे कोई डर न था इसलिए कभी उन पर ध्यान न दिया |
पता न था वे ही मेरे लिए एक दिन घातक सिद्ध होंगे ।

पहली अप्रैल को राजेश उत्साही जी के ब्लॉग गुल्लक पर निगाह पड़ी । सूखती किताबों में भीगता मन -पढ़कर मेरा सालों पुराना घाव टीस दे गया ।

वैसे तो काया पलट को एक पल ही बहुत है ,चार पाँच दिन तो बहुत होते हैं | कल्पना से परे जब कुछ घटित होता है तो ४४० वोल्ट का झटका लगता ही है |
मैं भी तो चार -पाँच दिनों को ही गई थी शादी के बाद ससुराल I लौटकर आई तो लग रहा था न जाने कितने दिन हो गये है मायका छोड़े I घूम -घूमकर देख रही थी कोना -कोना I अपने स्टडी रूम में भी गई। मालूम है किससे मिलने --अपनी किताबों से मिलने ।
कमरे का दरवाजा भड़ाक से खोला I अलमारी पर निगाह पड़ते ही बेहोश होते -होते बची I एक मिनट को तो सोचा किसी दूसरे कमरे में आगई हूँ I बाहर निकली फिर घुसी--- कमरा तो यही है फिर किताबें ---
कहाँ गईं ? रोम रोम चीत्कार कर उठा -- यहाँ तो एक भी नहीं हैं I बार -बार अलमारी पर निगाह डालती -- अरे ताला भी टूटा हुआ है ---------तब तो सारी किताबें---- हो न हो चोर ही ले गया है । आ गया होगा दीवार फांदकर --जरूर दो चोर होंगे --

एक ऊपर से फेंकता गया होगा, दूसरा छत से नीचे खड़ा होकर लपकता गया होगा । पागलों की तरह अलमारी की दीवार छू -छूकर देखती --कहीं इसमें तो नहीं समा गईं I अलमारी के पीछे झांककर देखा --कहीं उधर तो नहीं जा पड़ीं I जैसे -जैसे यह धारणा मजबूत होती गई कि किताबें अलमारी में नहीं हैं उतनी ही जोर से रोने की इच्छा होने लगी I
तिमंजिले से सबसे नीचे एक साँस में उतर गई --पिताजी --पिताजी मेरी किताबें कहाँ हैं ?ताला भी टूटा हुआ है --किताबें तो चोरी हो गईं -- मेरा गला भर्रा उठा |
-किताबें !किताबें तो लायब्रेरी को दान कर दीँ । लायब्रेरियन बहुत गरीब है उस बेचारे का भला हो गया ।
-बिना मुझसे पूछे --वे तो मेरी थीं
-शादी के बाद उनका क्या करती--- !
पिताजी की बात सुनकर सकते में आ गई और उन्हें घूरकर देखा -
-क्या ये मेरे पहले वाले ही पिता हैं
न मुझसे कुछ कहते बना न कुछ करते ही--- बहुत देर तक सोचती रही- चाबी पिताजी के हाथ कैसे लग गई ? दिमाग पर बहुत जोर डालने पर याद आया -- 
शादी के दो दिन पहले माँ ने अलमारी की चाबी मांगी थी ताकि उपहार के पैकिट निकाल सकें । उसके बाद मुझे चाबी लेने की याद नहीं रही। चाबी मेरे पास होती तो शायद ताला उनका रक्षक बना रहता - अब भी यह बात मेरे दिमाग में आती है ।
समय भी मेरी इस चोट पर मरहम न लगा सका। रह -रह कर मुझे बिछुड़ी किताबें याद आती हैं और दुखी कर जाती हैं। क्या करूँ ! मेरा इंतजार किसी ने  भी---- न किया ।


शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

जब मैं छोटी थी



॥13॥ पतंगबाजी
सुधा भार्गव 
मैं जब छोटी थी आकाश में रंग बिरंगी ,झिलमिलाती पतंगों को देख कर मन करता--- पतंग उड़ाऊँ !पर कभी उड़ा नहीं सकीI जब भी डोर के सहारे पतंग को हवा में उड़ाने की कोशिश की ठक से वह जमीन पर गिर गई और फट गई I मैं दुःख में ड़ूब जाती ऐसा लगता मानो एक नाजुक सी चिड़िया ऊपर से आन गिरी हो और वह उठाने को कह रही हो I मैं धीरे से पतंग को उठाती .फटी जगह को गोंद से चिपकाने की कोशिश करती और कई दिनों तक उसे अलमारी में रखे रहती I