नये वर्ष की नई अभिलाषा ----

बचपन के इन्द्र धनुषी रंगों में भीगे मासूम बच्चे भी इस ब्लॉग को पढ़ें - - - - - - - -

प्यारे बच्चो
एक दिन मैं भी तुम्हारी तरह छोटी थी I अब तो बहुत बड़ी हो गयी हूं I मगर छुटपन की यादें पीछा नहीं छोड़तीं I उन्हीं यादों को मैंने कहानी -किस्सों का रूप देने की कोशिश की है I इन्हें पढ़कर तुम्हारा मनोरंजन होगा और साथ में नई -नई बातें मालूम होंगी i
मुझसे तुम्हें एक वायदा करना पड़ेगा I पढ़ने के बाद एक लाइन लिख कर अपनी दीदी को अवश्य बताओगे कि तुमने कैसा अनुभव किया I इससे मुझे मतलब तुम्हारी दीदी को बहुत खुशी मिलेगी I जानते हो क्यों .......?उसमें तुम्हारे प्यार और भोलेपन की खुशबू होगी -- - - - - -I

सुधा भार्गव
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शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

बचपन का सावन




 ॥8॥ मास्टरों की भीड़
सुधा भार्गव 


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     बचपन में मुझे भीड़ से बहुत डर लगता था। हमेशा सोचती - धक्कामुक्की में मैं गिर जाऊँगी और कुचल दी जाऊँगी। रामलीला होती तो देर से जाना पसंद करती और सबसे पीछे ही बैठती चाहे दिखाई न दे। खतम होने के 15 मिनट पहले ही उठने की जिद करने लगती।
      कार्तिक के महीने में एक मेला लगता था। कड़ाके की ठंड में ज़्यादातर लोग धूप से शरीर सेकते मेले में  घूमा करते और रात में जल्दी ही लिहाफ में दुबक जाते।पर मैं काफी रात गए  कहती – “मैं तो मेला देखने जाऊँगी।’’अम्मा गुस्से में दाँत पीसतीं –“उल्लू है उल्लू पिछले जन्म की।” पिताजी मुझे लेकर जाते तो पर मैं बड़े नुकसान में रहती। वे तो बुंदे ,माला, चूड़ी कुछ नहीं खरीदवाते।हाँ,पहले से टिकट मँगवाने के कारण  सर्कस जरूर उनके साथ आगे बैठकर देखने को मिलता । और तो और जब स्कूल की तरफ से नुमाइश देखने बुलंदशहर जाती तो चाट पकौड़ी को देख मुँह में पानी भर आता, पर ठेले के पास जाने की हिम्मत न जुटा पाती कि कहीं भीड़ का भूत मेरे चिपट न जाए। एक कोने में खड़ी इंतजार करती रहती -- कब भीड़ छटे और कब मैं गोलगप्पे खाऊँ पर मेरा तो नंबर ही न आता। मन मारकर मैं वहाँ से चल देती। लेकिन जब कुछ-कुछ ऐसी ही भीड़ ने मेरे घर में मुझ पर ही धाबा बोल दिया तो मैं उसमें बचकर कहाँ जाती----- वह थी मास्टरों की भीड़ ।
       व्यवसाय के चक्कर में पिताजी को न खाने की सुध रहती और न सोने की। माँ----!वे तो बस छोटे भाई –बहनों की होकर रह गई थीं। अब मुझे पढ़ाये कौन! उसकी कमी पूर्ति के लिए उन्होंने मेरे चारों तरफ मास्टर जी की  भीड़ जुटा दी । वे हमेशा मेरी  तरफ बंदूक ताने खड़े रहते। इंगलिश अवश्य पिताजी पढ़ाते थे। उन्हें उर्दू और अँग्रेजी ही आती थी। हिन्दी मैं तो मैं ही उनको हरा देती। मैं कभी अपने अंग्रेज़ मास्टरजी मतलब पिता जी की तरह कभी खटखट अँग्रेजी नहीं बोल पाई।इसलिए उन्होंने फिसड्डी कूढ़मगज  ---न जाने क्या क्या नाम रख दिए। करती भी क्या!जब ज़ोर से डांटते तो सारे शब्द हलक में फंस जाते । मुझे जब भी खाली देखते तो कहते –“अँग्रेजी का अखबार भी पढ़ो।बिना अँग्रेजी सुधारे कुछ नहीं होगा---।’’ मैं चिढ़ जाती। जितना वे कहते उतनी ही मैं उससे दूर होती गई। वैसे मुझे उनकी बात न मानने का बड़ा पछतावा रहा। जब मैंने अपने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तो पहले अपनी अँग्रेजी ही सुधारनी पड़ी।
       पहली कक्षा से ही कृपा शंकर मास्टर जी घर पर पढ़ाने के लिए आने लगे । वे मुझे बड़े अच्छे लगते –गोरे –गोरे बड़े हंसमुख। सबसे बड़ी बात वे पिता जी से मेरी शिकायत नहीं लगाते थे और उन्हें ढेर सी कहानियाँ आती थीं-जादू की,परियों की,राजा रानी की---। उनसे कहानी सुनते -पढ़ते डेढ़ घंटा तो बीत ही जाता। पिताजी बड़े खुश –मास्टर जी एक घंटे की जगह डेढ़ घंटे बड़ी मेहनत से पढ़ा रहे हैं।बस मास्टर जी के लिए चाय- नाश्ता दौड़कर चला आता । वे भी खुश ,पिता जी भी खुश और मैं भी-- हा—हा --।
      कक्षा 5 तक तो समय बहुत अच्छा कटा । वे आते रहे और मैं अपना गृहकार्य करती –कराती रही। कक्षा 6 में आते –आते वे हारमोनियम और तबला भी सिखाने लगे। बाबा मेरा गाना सुनते समय मुसकाते ही रहते थे। ऐसे अवसर पर तुरंत उनके सामने हाथ पसार देती –बाबा मेरा इनाम ।मतलब अधन्ना -चौबन्नी कुछ मिल जाएँ तो चूरन –चुस्की की बहार आ जाए। एक दो- गाने तो अब भी मेरे जीभ पर आलती पालती मारे बैठे हैं –‘पायोरी मैंने राम रत्न धन पायो’---‘दया कर दान भक्ति का हमे परमात्मा देना।‘गाने का अभ्यास छूट चुका है पर यादों की महानगरी में ये गूँजते रहते हैं।  
      अब लड़की होकर नृत्य शिक्षा से कैसे वंचित रह सकती थी । इसकी कमी पूर्ति चाची ने कर दी। एक ग्रामोफोन और कुछ रेकॉर्ड्स खरीदे गए । उस समय कुछ गाने बहुत प्रसिद्ध थे –चुप –चुप खड़े हो जरूर कोई बात है ,जिया बेकरार है --,मोहे पनघट पै नंदलाल--। मतलब समझ में आए न आए पर चाची के इशारों पर खूब ठुनकती।  घर वाले मंद मंद मुसकाते –आह बैजंतीमाला ठुमक रही है। इस तरह इंगलिश गुरू -संगीत मास्टर और नृत्य मैडम के चक्र व्यूह में मैं अच्छी तरह फंस गई थी ।
      जैसे जैसे बड़ी होने लगी मास्टरों की भीड़ भी बढ़ने लगी। आठवीं कक्षा में पहुँचते ही एक गुरूदेव और आने लगे-सिद्धजी । गेरुए कपड़ों में वे सिद्ध पुरुष ही लगते थे । वे एक दिन मेरे डॉ बाबा के पास इलाज कराने आए। बाबा को पता लगा कि वे मेरठ स्कूल से रिटायर होकर आए है तो बोले –“आप हमारी पोती को पढ़ाइए। आपका मन भी लग जाएगा और आमदनी भी हो जाएगी। अपने को रिटायर न समझिए।’’ उन पर बाबा इतने मेहरबान हुए कि बस पूछो मत!---उनका  लंच भी बांध दिया । आते---- खूब खाते  और खूब पढ़ाते । मगर उनकी यह खूबी मुझे ले डूबी । घर वाले उनकी प्रशंसा के पुल बांधते पर मेरे दिल पर क्या गुजरती है कोई पूछने वाला न था । गणित पढ़ाते थे। पर न जाने कैसा पढ़ाते थे—मुझे तो लगता है उन्हें पढ़ाना ही नहीं आता था। तभी तो पास होने लायक ही अंक आकर  रह जाते।   
     अपने एक मास्टर जी को तो भूले ही जा रही हूँ । वे थे टेलर मास्टर जी मास्टर चन्दा । ये हमारी महरी काकी के मझले बेटे थे । कक्षा 10 में होम साइंस अनिवार्य थी । उसमें खाना बनाना ,कपड़े धोना और सिलाई मुख्य विषय थे । आते -जाते घर में ही लेक्चर पिलाए जाने लगे  –कपड़े ऐसे धोते हैं ,हलुआ ऐसे बनता है । टेलर मास्टर जी का तो आना शुरू हो ही गया था –सब सीखा---कुर्ता ,पाजामा ,कमीज ,ब्लाऊज ,फ्रॉक--- पर आया केवल पाजामा सीना । प्रैक्टिकल फाइल में  सिले कपड़ों के सेंपिल मास्टर जी ने बना दिये थे। बस उनकी मेहरबानी से खूब सारे नंबर लूट लिए।  
     मास्टरों की लाइन के पीछे पिता जी की कमजोरी छिपी थी। दादी उन्हें तीन या चार वर्ष का छोडकर भगवान को प्यारी हो गई थीं । वे बहुत पढ़ना चाहते थे मगर बनारस से बी॰ फार्म॰ करके ही रह गए । आत्मनिर्भर होने पर उन्होंने ठान लिया  कि वे अपने बच्चों को खूब पढ़ाएंगे चाहे वह लड़का हो या लड़की । वे अपनी जगह ठीक थे पर क्या मैं मेधावी छात्र बन सकी ?नहीं !इतना थक जाती थी कि दिमाग की चक्की एकदम ठप्प ही समझो।  एक काम पूरा नहीं हो पाता था कि दूसरा शुरू । पता लगा सब अधूरा ही सीखा मास्टरी किसी में भी हासिल न कर पाई ।
       अभी तक मैं यही सोचती थी कि भगवान न करे कि कोई बच्चा मास्टरों की भीड़ में खो जाए । पर मैं  जिस माहौल में रह रही हूँ वहाँ अनेक बच्चे इस दलदल  में फंसे हैं । माँ –बाप दोनों ही नौकरी के कारण बच्चों को समय नहीं दे पाते , पर उन्हें  हर तरह से योग्य बनाना चाहते हैं । हिन्दी ट्यूशन के लिए जाते समय बच्चे को  चिंता रहती है गणित ट्यूशन को देर न हो जाए । गणित ट्यूशन को जाते समय टेबल टैनिस की कोचिंग क्लास की चिंता रहती है । छुट्टी के दिन ड्राइंग क्लास ,डांस क्लास ,गिटार क्लास भी सीखना जरूरी है । माँ –बाप में होड़ सी लगी है –मेरा बच्चा यह सीखने जाता है,मेरा बच्चा यह सीखता है --। न बच्चे को खाने का समय न आजादी से सांस लेने का समय । आजकल तो वैसे भी स्कूल पढ़ाई का बहुत बोझ और तनाव  है । क्या मासूम बच्चे इस समस्त बोझ को अपने नाजुक से कंधों पर उठाते हुए माँ –बाप की आकांक्षाओं की कसौटी पर खरे उतर सकेंगे !कहीं समय से पहले ही तो बच्चों का बचपन विदा नहीं हो रहा है!ऐसे अनगिनत प्रश्न मन मेँ हलचल मचाये रहते हैं।
समाप्त 

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