नये वर्ष की नई अभिलाषा ----

बचपन के इन्द्र धनुषी रंगों में भीगे मासूम बच्चे भी इस ब्लॉग को पढ़ें - - - - - - - -

प्यारे बच्चो
एक दिन मैं भी तुम्हारी तरह छोटी थी I अब तो बहुत बड़ी हो गयी हूं I मगर छुटपन की यादें पीछा नहीं छोड़तीं I उन्हीं यादों को मैंने कहानी -किस्सों का रूप देने की कोशिश की है I इन्हें पढ़कर तुम्हारा मनोरंजन होगा और साथ में नई -नई बातें मालूम होंगी i
मुझसे तुम्हें एक वायदा करना पड़ेगा I पढ़ने के बाद एक लाइन लिख कर अपनी दीदी को अवश्य बताओगे कि तुमने कैसा अनुभव किया I इससे मुझे मतलब तुम्हारी दीदी को बहुत खुशी मिलेगी I जानते हो क्यों .......?उसमें तुम्हारे प्यार और भोलेपन की खुशबू होगी -- - - - - -I

सुधा भार्गव
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गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

बाल संस्मरण

जब मैं छोटी थी  की 18वीं कड़ी
  

गोल मटोल कैथ















मैं जब छोटी थी कैथ-- आह! कैथ के नाम से ही मुंह में पानी भर गया ,हाँ तो इसकी खट्टी –मीठी चटनी मुझे बहुत पसंद थी । लेकिन हमारे घर तो कैथ आता ही नहीं था । उसमें खटास जो होती थी और खट्टी चीजें खाना हमारे लिए मना था । इसके नाम से ही घर वालों के  चेहरे बिगड़ जाते----!



 दूसरे यह गरीबों का फल समझा जाता था ।

मेरी  सहेली चम्पा स्कूल में रोज कैथ की चटनी लाती और रोटी से लगा कर खाया करती ।

रोटी और कैथ की चटनी
 मैं उसकी  तरफ टुकुर –टुकुर देखती । एक दिन उसने  तरस खाकर मुझे भी आधी रोटी पर  थोड़ी सी चटपटी चटनी रख कर दे दी । आह  क्या स्वाद । जीभ के तो मजे । मुँह में बल खाती  हुई झूम सी रही थी । अब तो रोज ही  हिस्सा बाँट होने लगा और वह मेरी  सबसे अच्छी सहेली बन गई ।

प्यारी -प्यारी सहेलियां  
एक दिन मैंने  पूछा –चम्पा ,कैथ कैसा होता है ?
-तू इतना भी नहीं जानती !वह तो गोल –गोल ,सफेद –सफेद ,पीला –पीला होता है और अंदर से बादामी रंग सा   सुनहरा -सुनहरा । उसने अपना एक हाथ गोलाई में घुमाते कहा ।
-मैंने तो कभी देखा ही नहीं । सच्ची –मुच्ची कह रही हूँ ।
-चल –चल तुझे अभी दिखती हूँ ।
मेरा उसने  एक हाथ पकड़ा और खींचती हुई स्कूल के बाहर ले गई । 
 वह खुशी से चहकी । देख –देख उस ठेले वाले को ---चूरन –चटनी और लेमंजूस के पास ,टूटे हुए कैथसे भूरा –भूरा गूदा कैसा झांक  रहा है !एक के ऊपर एक ,तीन -तीन शरारती कैथ! हमें  बुला रहे हैं।  



 ठेले के पास आने पर

मैं अपने को रोक न सकी –आह! इसका खट्टा-मीठा गूदा खाया जाए । बिना खाये ही  जीभ चटकारे लेने लगी ।
-भैया 5 पैसे का कैथ दे दो जरा । मैंने ठेलेवाले से कहा  ।
एक मिनट भी नहीं गुज़रा कि मैंने फिर अपनी बात दोहरा दी ।
-देता हूँ लल्ली,देता हूँ । जल्दी काहे मचावत है ।
-हमारा नंबर आते –आते सारे कैथ खतम हो गये तो ----
-अच्छा ले –पहले तुझे ही दिये दूँ । वैसे मेरे  झोले में कैथ भरे पड़े हैं। 
-भैया ,मुझे एक साबत कैथ हाथ में दे दो  ।मैं उसे छूकर देखूँगी ।  मैंने तो  आज से पहले  इसे   देखा ही नहीं था  ।
-गज़ब की बात करे है तू तो । ले अभी थमाऊँ तोय ।

उस गोल –मटोल कैथ पर मैं तो रीझ गई । मेरा बस चलता तो मैं उसे  लेकर  भाग जाती ।
 मुझे लगा –कैथ मुझपर हंस रहा है और कहना चाह रहा है –कैसी छोरी है तू –अभी तक मुझसे नहीं मिली थी । अरे मुझ पर तो बच्चे जान देते हैं ।
मुझे उसकी हंसी चुभ सी गई और उसी पल निश्चय कर लिया –मौका मिलते ही एक पूरा कैथ खाकर रहूँगी । 
ठेलेवाले ने पत्ते के बने  दोने में कैथ का टुकड़ा रखा ,उसपर नमक छिड़का और हमें पकड़ा दिया । लेकिन उससे क्या मेरा जी भरने वाला था ।

स्कूल से घर जाने के दो रास्ते थे । एक गली –गली घूमते घुमावदार छोटा रास्ता ,दूसरा बाजार जाते हुए सीधा मगर लंबा रास्ता । उस दिन ही पूरा का पूरा कैथ खाने का भूत सवार हो गया । स्कूल की छुट्टी होते ही भागी अकेली सब्जी मंडी की ओर । कभी अकेली सब्जी मंडी गई नहीं थी । बड़े से मैदान में टोकरियों में रखी सब्जियाँ या आलू शकरकंदी ,तरबूज की ढेरियाँ ही ढेरियाँ दिखाई दे रही थीं ।
कैथ कहाँ ढ़ूंढू—किससे पूंछूं ?मैं तो सकपका गई ।
बेर बेचने वाले से पूंछा –भैया ,कैथ कहाँ मिलेगा ?
-लाला परचूनी की दुकान के पास । यहाँ से सीधी चली जाओ ।
चलते –चलते घबराहट होने लगी । कच्चा रास्ता कीचड़ से भरा –चप्पल घुस जाती तो निकलने का नाम न लेती,लेकिन कैथ खाना था तो खाना था ।

एक टोकरी में सफेद –सफेद गेंदे सी लुढ़क रही थीं। आँखों में कुछ चमक आई। 


कैथ की टोकरी


-यह कैथ है क्या ?
-हाँ !कैसा लेना है –कच्चा या पका ? टोकरी वाले ने पूछा  । 
कच्चा –पक्का ! दिमाग घूम गया ।
-मैं उस पर नमक छिड़ककर उंगली से निकाल निकाल कर खाऊँगी ।
 -तोड़ दूँ क्या कैथ को ?
-हाँ –हाँ ! उस पर नमक भी छिड़क दो । लगा जैसे मुझे कुबेर का खजाना मिल गया हो ।
थोड़ा चखते ,स्वाद लेते अपने घर का रुख लिया जो पटपरी मोहल्ले में था । रास्ता लंबा था पर मैंने  चाल घीमी कर रखी थी ,घर पहुँचते –पहुँचते कैथ जो खतम करना था ।यही डांट से बचने का एकमात्र तरीका था

 हवेली के दरवाजे पर दस्तक देने से पहले छिलका फेंक दिया  और हाथ को मुँह की तरफ  ले जाकर फ्रॉक की बाँह से मुँह पोंछ लिया । मेरा तो यही रुमाल था । इसी कारण बाँह अक्सर गंदी दिखाई देती ।
टिफिन खाते समय घर का सिला नैपकिन होता । उसे कभी ले जाती ,कभी भूल जाती । स्कूल में इसके बारे में कोई कठोर नियम  न था सो सब चलता था । घर में जरूर कुछ कठोर नियम थे पर उनके होते हुए भी अपना काम तो चल ही जाता था ।

उस दिन तो चेहरे पर विजयी मुस्कान लिए बेधड़क घर  में घुसी और कैथ भी तो मेरे पेट में पड़ा –पड़ा हँसकर मेरा साथ दे रहा था । सोते समय  प्रार्थना करती रही –हे भगवान ऐसी कोई तरकीब करो जो खूब कैथ खाने को मिलें । झपकी आते ही गज़ब का सपना  देखा- एक बंदर


धोखेबाज बंदर 
 पेड़ पर बैठा खूब कैथ खा रहा है और मेरे लिए नीचे गिराता जा रहा है।लेकिन सुबह उठी तो मालूम हुआ कि वह धोखेबाज मेरे  हिस्से के भी लेकर भाग गया । 

छविकार -सुधा भार्गव   

क्रमश : 

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

बाल संस्मरण की सत्रहवीं कड़ी


मूंछ मलाई
  
जब मैं छोटी थी

छुटपन में मुझे मलाई खाने का बड़ा शौक था । रसोई में बड़ी सी लोहे की कढ़ाई में दूध औटता फिर मंदी –मंदी  आंच में पकता तो सारा घर महकने लगता और मेरी  नाक में उसकी खुशबू घुसती चली जाती । ठंडे  होने पर तो मलाई  की ऐसी मोटी परत जमती कि बस पूछो मत ।  अगर मैं बिल्ली होती तो सारी मलाई  चट कर भाग जाती ।

मलाई खाने का अरमान मेरे दिल में ही रह जाता क्योंकि सारी मलाई ज़्यादातर बाबा जी के हिस्से ही आती ।

मेरे बाबा

बाबा जी दोपहर को खाना खाने के बाद मलाई –बूरा या दही –बूरा खाते थे । दादी के जमाने से उनका एक चांदी का कटोरा था ।
चमचमाता कटोरा 

रात के खाने के बाद  उस चमकते कटोरे में वे  दूध पीते और उस दूध में तैरती रहती मेरे हिस्से की मलाई  । मन मारकर देखती रहती उस कटोरे को बाबा के कमरे में जाता देखकर । समझ नहीं आता था बाबा को मलाई वाला और हमें पानी सा दूध क्यों मिलता है ?
घरवालों का ज्यादा मन चलता तो हलवाई की दुकान से मलाई वाला  दूध आ जाता ।

बादाम -पिस्ते वाला दूध 

 मिट्टी के कुल्हड़ वाला सौंधा –सौंधा मेवे वाला दूध भी अच्छा लगता था पर डाक्टर बाबा न जाने बाजार का दूध क्यों नहीं पीते थे,मिठाइयों की तरफ तो देखते भी न थे । 

यह तो मेरी बुद्धि में बहुत बाद में घुसा कि डाक्टर होने से बहुत सोच समझकर खाते थे ।  पर  यह अच्छी तरह समझ गई थी कि सारा घर बाबा को बहुत प्यार करता है और उनका ध्यान रखता है ।

एक रात करीब 9बजे अम्मा दूध का कटोरा लिए बाबा के कमरे की ओर  जा रही थीं । जैसे ही बाबा ने उसे अपने हाथों में थामा मैं और मेरा छोटा भाई उनके बायेँ-दायें घर वालों की नजरों से बच –बचाकर जा बैठे । हम ऐसा तभी करते थे जब उनसे कुछ पाना होता था । दूध पीने की चम्मच हाथ में थामते हुये बोले –क्या बात है बेटा ,कुछ चाहिए क्या ?
-हाँ बाबा !मलाई चाहिए –आपके  दूध  में बहुत सारी है ।
-ठीक है !दूध पीते समय तुम्हें जब मलाई दीखे तो मुझे रोक देना ।
हम दोनों बड़े खुश । आँखें चमचमा उठीं ।

बाबा ने पहली  बार जब  चम्मच से  दूध भर कर मुंह तक ले जाना चाहा  ,हमें लंबी सी मलाई उससे लटकती नजर आई ।
-रुको बाबा रुको –मलाई है । हम दोनों चिल्लाये ।
बाबा की चम्मच जहां थी वहीं रुक गई ।
भाई ने धीरे से मलाई उतारी और बिना हिस्सा बाँट किए खा गया । मुझे उस पर बहुत गुस्सा आया ।
दूसरी –तीसर्री बार बाबा ने दूध पीया पर चम्मच में जरा सी भी अटकी
मलाई नजर नहीं आई । मैं बहुत दुखी हो गई । ज्यादा दुख तो इस बात का था कि भाई को तो मलाई मिल गई पर मुझे नहीं मिली ।

बहुत सावधान होकर बैठ गई कहीं इस बार भी वह  मलाई न झपट ले । तभी देखा मलाई का बड़ा सा टुकड़ा बाबा की बड़ी –बड़ी मूँछों में लटक गया है ।
- बाबा मूंछ मलाई !
बाबा हैरान । चम्मच सहित उनके हाथ तो रुक गए पर मेरे कहने का मतलब न समझे ।
मैंने धीरे से मूंछ से मलाई को अलग किया ताकि बाबा का कोई मुच्छी बाल खिच न जाए । आखिर वे मेरे प्यारे बाबा थे मगर मलाई खा गई।  आह !उस दिन कितनी खुश थी कह नहीं सकती ।प्यार भरे दिलों में निर्मलता से बहते झरने जैसा था मेरे  बचपन का रंग।      
जब भी किसी बच्चे को अपने बाबा की उंगली पकड़ते जाता देखती हूँ मुझे अपने बाबा की याद आ जाती है ।


वैसे बच्चों मूंछ  वाले बाबा लगते बहुत अच्छे हैं और आजकल तो फैशन चल पड़ा है नकली मूंछें लगाने का और कुछ  तो इलाज करवा रहे हैं ताकि मूंछें उग सकें ।

इसका मतलब तुम्हारे बाबा की मूंछें भी बड़ी बड़ी हो सकती हैं ।


अच्छा फिर मिलेंगे ---।

* * * * *

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

क्या बचपन ---------बीत गया ----!

जब मैं छोटी थी 
मैं जब छोटी थी घर वाले इस उम्मीद में थे  कि कब मैं बड़ी होऊँ और कब लड़कपन छूटे पर मुझे अच्छी तरह याद है जब -जब इस तरह की कोशिश की गई मौक़ा पाते ही मैं और मेरा बचपन और भी ज्यादा समीप आ जाते।  घंटों गले लग हम अव्यक्त खुशी का दामन थामे आँसू बहाते रहते। एक दिन मैं सबके साथ मेज पर बैठी खा रही थी दाल -चावल वह भी हाथ से ।  पीछे से आवाज आई --अब तो बचपना छोड़ो  और कायदे से मतलब छुरी -कांटे और चम्मच से खाओ । विश्वास कीजिये इस कविता का अंकुर तो तभी फूट गया था, वही कविता यहाँ उकेरती हूँ ।   

कविता /सुधा भार्गव 

क्या बचपन  मेरा बीत गया  ! 

क्या  बचपन  मेरा  बीत  गया
 नहीं ! नहीं !
ठहर -ठहर कर यह  आता है
ममतामयी की याद दिलाकर
शैशव्    मन के भाव जगाता है !
        बड़ा कहो न मुझको
        मैं तो अनजान अबोध
        बालपन की मस्ती से
        पुलकित है मेरा मन !
सुखा    दे इस बगिया को
शुष्क हवा का झोंका
अधर धरा! में प्राण लटकते
प्रतिपल कम्पित होता उर !
         नीली -पीली आँखें करके
         भयभीत करो न मुझको
         वही तो नैसर्गिक सुख है मेरा
         छीनो मत मुझसे इसको !
सुनो .सुनो पगों की आहट
वह खुद चलकर आया है
कभी न कहना बचपन बीता मेरा
वह तो घुमड़ -घुमड़ कर आया है !

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मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

खेलमखेल



जब मैं  छोटी थी /सुधा भार्गव 


अल्लम -गल्लम -खों -खों 
उछलो  -कूदो ---हों --हों 
मैं जब छोटी थी मुझे खेलने का बड़ा शौक था । यह  निश्चित था कि हम भाई –बहन शाम को एक घंटे जरूर खेलने जायेंगे पर एक घंटे से क्या  होता है । हम खींचतान कर उसे डेढ़ घंटा तो कर ही देते थे । वैसे तो घर में हमें फाँसने के लिए बहुत से खेल थे –लूडो ,कैरम ,व्यापार ,साँप सीढ़ी आदि –आदि । पर जो बाहर दौड़ा दौड़ी मेँ आनंद था वह घर में कहाँ !

इतवार की इतवार घर से बाहर छोटे से मैदान में क्रिकेट खेला जाता था । चाचा जी पिता जी और उनके दोस्त खेला करते  । मुझे तो खेलने का कोई मौका ही नहीं देता था, बस दूर –दूर से गेंद उठाकर लाने का काम था । मैं तो हाँफ जाती थी मगर खड़ी रहती  शायद चांस दे दें । जिस दिन चांस मिल जाता  खुशी से जमीन पर पैर नहीं पड़ते थे ।

मुझे तो लट्टू घूमता बहुत अच्छा लगता था । मानो वह कह रहा हो –देखो –देखो एक पैर पर कैसा नाच रहा हूँ ,तुम भी मुझे नचाओ । मेरी तरह से तुम्हें भी खुशी मिलेगी ।

घूम -घूम लट्टू ,
मैं भी हो गया  लट्टू 
 बस मैंने भी सोच लिया लट्टू घुमाना सीख कर ही रहूँगी । किसी तरह से बाजार से तो ले आई पर दिमाग में खलबली मच गई सीखू किस्से !दोस्तों से सीखाने को कहती तो हँसी उड़ाते –लो इसे इतना भी नहीं आता --। भाई की 2-3 दिनों तक खुशामद की तब उसने मुझे सिखाया 

। लट्टू तो मेरा गोल –गोल जमीन पर घूमने लगा पर उसे हथेली पर कभी न उठा सकी । इसका अफसोस आज भी है ।

लाल -पीली -नीली गोलियां
सुन्दर सी  हमजोलियाँ 
गोल –गोल चमकती –लुढ़कती काँच की गोलियों की तरफ मैं खिंची चली जाती । उनसे मैं खेलती तो नहीं थी पर वे मुझे  बहुत सुंदर लगती थीं  । उन्हें कंचे कहते थे । एक लड़का अपने कंचे से दूसरे लड़के के कंचे में उँगलियों के सहारे निशाना लगाता । कामयाब होने से निशाना लगाने वाले का कंचा हो जाता । 
हार -जीत का रेला
दुःख ने आकर  घेरा 

एक दिन छोटे भाई की जेब में कंचे खनखनाते हुये सुन  समझ गई  -वह बाहर उनसे  खेलने जाने वाला है । मैं  भी उसके साथ हो ली । मगर वह अड़ गया –आप नहीं जाओगी ,किसी की बहन खेलने नहीं आती ।
-अरे मैं खेलूँगी नहीं --। बस देखूँगी ।
-नहीं --। मैं नहीं ले जाऊंगा ।
-तब मैं पिता जी से तेरी शिकायत लगा दूँगी ।
पिता जी इस खेल के सख्त खिलाफ थे इसलिए मेरी  धमकी  काम कर गई । पर उसका मुँह फूला ही रहा जितनी देर खेला ।

घर से बाहर हमारे खेलने को–इप्पल –दुपपल ,कीलम काटी झर्रबिल्इया ,चूहा भाग बिल्ली आई -----





,घोडा है जमालशाही पीछे देखो मार खाई

 न जाने कितने खेल थे| 

गिल्ली  -गिल्ली उछल हवा में
वरना डंडा मारूँगी 
लेकिन मेरा मन तो  गिल्ली –डंडे  मेँ लगता था  ।
 मेरा एक थैला गिल्लियों से भरा रहता । बढ़ई काका खूब बना-बना कर देते  । एक खो जाय तो दूसरी हाजिर । अक्सर छोटे डंडे से गिल्लियाँ उड़ जातीं  जो मिलती नहीं थीं । कभी –कभी अपने साथियों को भी गिल्ली दे देती ,फिर वे मेरी बात बहुत मानते ।

 इस खेल पर कोई पाबंदी भी नहीं थी ,पिताजी- ताऊ जी तो खुद खेलते थे। एक बार  ताऊ जी गिल्ली खेल रहे थे । काफी दूर पर उनकी बेटी खड़ी तमाशा देख रही थी । ताऊ जी ने ज़ोर से गिल्ली को डंडे से उछालकर उसमें ज़ोर से ऐसा छक्का मारा कि उसकी नोंक दीदी की आँख में चुभ गई और ले बैठी उनकी आँख की रोशनी । तब से थोड़े सावधान हो गए  पर गिल्ली खेलनी नहीं छोड़ी ।

ठंड  मेँ दिन छोटे होने के कारण हमें शाम को खेलने का मौका कम मिलता ।पर  उसकी कसर स्कूल की छुट्टी के दिन खूब निकालते ।
छुट्टी के दिन सबसे आनंद दायक हमारा इकलौता खेल होता -कूदमकूद

 एक कमरे मे दो बड़े –बड़े अलम्यूनियम बॉक्स  थे जिनमें गद्दे –लिहाफ रखे जाते थे । वे केवल सर्दियों मेँ खुलते थे ।



 सर्दी की एक सुबह नौकर ने बिस्तरे ठीक किए और लिहाफों की  तह करके उन्हें बक्सों पर रख दिये । दोपहर को खाना खाने के बाद हम भाई –बहन उस कमरे मेँ घुस गए ।हमारे बाद अम्मा ने खाना खाया ।छोटे भाई को  सुलाते वे भी सो गईं ।हमें धींगा मस्ती का समय मिल गया।और तो और अंदर से कमरे की कुंडी भी लगा ली ताकि कोई नौकर शिकायत न कर दे ।हम भाई –बहनों ने छोटे –छोटे हाथों से बड़े–बड़े लिहाफ नीचे खींच लिए फिर उन पर खूब कूदे –उछले ।

 कोई कहीं गिरा कोई कहीं लुढ़का ।  अम्मा ने हमारे लिए अलग से तकिये बनाए थे हम छोटे थे तो हमारे तकिये भी छोटे थे । उन्हें एक दूसरे पर पूरी ताकत
 लगाकर  फेंकने लगे । जब वह किसी  के सिर या मुंह से टकराता तो खूब हँसते  
—इतना हँसते कि पेट मेँ बल पड़ जाते । कितना समय निकल गया पता ही नहीं चला पर अम्मा की नींद टूट गई ।

हममें से किसी को आसपास न देख खोजख़बर लेने मेँ जुट गईं । दरवाजा बंद देख अम्मा को हमारी शैतानी का अंदाजा लग गया और कुंडी खटखटा दी ।एक मिनट को हम सब बुत बन गए ।उपद्रव करने वाले हाथ रुक गए । डांट के डर से समझ नहीं पाये क्या करें । लिहाफों की तह करके उन्हें बाक्स पर रख नहीं सकते थे ,माँ का सामना करने से बच नहीं सकते थे ।

मैंने दरवाजा खोला ,अम्मा ने जोर से मेरा कान ऐंठ दिया । समझ गईं –यह किसके दिमाग की उपज  है ।दोनों भाई छिपने की कोशिश करने लगे कोई दरवाजे के पीछे ,कोई पलंग के नीचे । अम्मा को ज्यादा गुस्सा नहीं आता था पर उस दिन तो मेरी बांह मेँ चीकुटी भी काटी थी लगा जैसे लाल चींटी ने काट खाया हो ।

बाप  रे !
इतने मेँ पिता जी न जाने  कहाँ से आ गए।पहले तो  टेढ़ी नजर से देखा और फिर दहाड़ने लगे   –तुमने इन बच्चों को बिगाड़ दिया है ।निकालो  इन्हें कमरे से --–अभी सबक सिखाता हूँ ।

माँ का गुस्सा कपूर की तरह उड़न छू होगया | हमें अपने स्नेही आँचल मेँ छिपाकर पिता जी की  आँखों से दूर ले गईं  ।

आज भी शैतानियाँ करने को मन करता है पर बचाने वाला कोई  नहीं !
काश !आज भी वह स्नेह कवच मेरे इर्द गिर्द लिपटा होता ।


















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