नये वर्ष की नई अभिलाषा ----

बचपन के इन्द्र धनुषी रंगों में भीगे मासूम बच्चे भी इस ब्लॉग को पढ़ें - - - - - - - -

प्यारे बच्चो
एक दिन मैं भी तुम्हारी तरह छोटी थी I अब तो बहुत बड़ी हो गयी हूं I मगर छुटपन की यादें पीछा नहीं छोड़तीं I उन्हीं यादों को मैंने कहानी -किस्सों का रूप देने की कोशिश की है I इन्हें पढ़कर तुम्हारा मनोरंजन होगा और साथ में नई -नई बातें मालूम होंगी i
मुझसे तुम्हें एक वायदा करना पड़ेगा I पढ़ने के बाद एक लाइन लिख कर अपनी दीदी को अवश्य बताओगे कि तुमने कैसा अनुभव किया I इससे मुझे मतलब तुम्हारी दीदी को बहुत खुशी मिलेगी I जानते हो क्यों .......?उसमें तुम्हारे प्यार और भोलेपन की खुशबू होगी -- - - - - -I

सुधा भार्गव
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रविवार, 4 जुलाई 2010

भाग २

मैं जब छोटी थी
(ख ) दूधचोर


प्रथम दिन मैं हलवाई की दुकान पर गयी |गंदे से गद्दे पर मैली चादर बिछी थी |मसनद के सहारे
काला सा -मोटा सा आदमी बैठा था I लगता था उसके घड़े से पेट में पैर घुस गये हैं I

उसको देखते ही मैंने मुँह बिचका लिया I लट्ठ सी आवाज में बोली --कसेरू तुम ही हो क्या ?

-अई- - डाक्टर साहब की लल्ली है क्या !बहुत बढ़िया दूध पिलाऊंगा I मिट्टी के सकोरे (बर्तन ) में दूध पीने से खुशबू ही खुशबू आयेगी I


उसने दूध के ऊपर ढेर सी मलाई डालकर सकोरा मुझे पकड़ा दिया I
इतना सारा दूध !सोचकर ही मुझे मितली आने लगी लेकिन मलाई देखकर मेरी आँखों में चमक आगई I बिल्ली की तरह छपछप मलाई खाने लगी I मलाई मेरी कमजोरी रही है I

दो -तीन दिन तक तो मैं दूध नियम से पीती रही I एक दिन मेरी निगाह मावे के पेड़ों पर गई Iफिसल पड़ी उनपर I

-हलवाई चाचा ! मेरा स्वर सुनकर कसेरू चौंक पड़ा I करेले में मिठास कहाँ से आ गयी - - - जरूर कोई ख़ास बात है I

-हलवाई चाचा,आज मैं दूध के बदले पेड़े खाऊंगी I

-पेड़े - - - !कसेरू हकला गया I - - - डा. बाबू को मालूम पड़ गई तो हमारी खैर नहीं I

-पिताजी को मालूम होगा तब न I अपने खाते में तो तुम दूध ही लिखोगे I

कसेरू चुप हो गया I सोचा -एक -दो दिन पेड़ा खाने में हर्ज ही क्या है, बच्चा है - - मन तो चलता ही है I

पेड़े खाते -खाते एक माह गुजर गया I बीच -बीच में कसेरू याद दिलाता रहा -बिटिया रानी दूध पी लिया करो I
बिटिया पर कहने का क्या असर होता वह भी मुझ जैसी दूधचोर पर I

क्रमश :

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