नये वर्ष की नई अभिलाषा ----

बचपन के इन्द्र धनुषी रंगों में भीगे मासूम बच्चे भी इस ब्लॉग को पढ़ें - - - - - - - -

प्यारे बच्चो
एक दिन मैं भी तुम्हारी तरह छोटी थी I अब तो बहुत बड़ी हो गयी हूं I मगर छुटपन की यादें पीछा नहीं छोड़तीं I उन्हीं यादों को मैंने कहानी -किस्सों का रूप देने की कोशिश की है I इन्हें पढ़कर तुम्हारा मनोरंजन होगा और साथ में नई -नई बातें मालूम होंगी i
मुझसे तुम्हें एक वायदा करना पड़ेगा I पढ़ने के बाद एक लाइन लिख कर अपनी दीदी को अवश्य बताओगे कि तुमने कैसा अनुभव किया I इससे मुझे मतलब तुम्हारी दीदी को बहुत खुशी मिलेगी I जानते हो क्यों .......?उसमें तुम्हारे प्यार और भोलेपन की खुशबू होगी -- - - - - -I

सुधा भार्गव
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गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

बाल संस्मरण की बीसवी कड़ी


मैं जब छोटी थी 
हा ! हा! रसीले आम 










बचपन में मुझे आम खाने का बड़ा शौक था। घर में जितने भी आम आते –देखकर लगता सब के  सब गपागप खा जाऊँ। बाबा भी हमें खूब आम खिलाते। वे होम्योपैथिक डॉक्टर थे और उनकी दुकान सब्जी मंडी के पास ही थी। दुकान  में उनकी मेज-कुर्सी से कुछ दूरी पर करीब दो फुट लंबी अलम्यूनियम की टंकी एक स्टूल पर रखी होती जिसमें पीतल की टोंटी चमचमाती हँसती। आम के मौसम में उसके नीचे बड़ा सा तसला आसन जमाए बैठ जाता।  भीमा आम वाला डाल के पके चुसवा आम उसमें भर देता।बाबा उसके सारे परिवार को मुफ्त में दवा देते इस कारण वह चुन -चुनकर मीठे आम लाता। 

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भीमा आमवाल 
टंकी में पानी भरना भी उसी का काम था।4-5 घंटे आम पानी में नहाते -गोते लगाते।ठंडे हो जाने के बाद ही उनको पेट में जाने की आज्ञा थी। मेरी सहेली कुंती के बाबा भी आमों को पानी में भिगोते रहते थे। और वह उन्हें देख -देख मेरी तरह बहुत देर तक खाने को तरसती रहती। 

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कुंती के बाबा 
मैं सोचा करती 
–बाबा तो मेरे हैं इसलिए उनकी हर चीज पर मेरा सबसे ज्यादा अधिकार है। इसी कारण तसले के ज्यादा से ज्यादा आम खाने की फिराक में रहती।
भरी दोपहरी स्कूल से आते ही बस्ता घर में फेंक चल देती दुकान की ओर।अगर किसी ने टोक दिया –किधर चली इस गर्मी में ---- लगता बिल्ली रास्ता काट गई। मन मसोसकर 4बजे तक धूप ढलने तक इंतजार करना पड़ता। इस समय मैं अकेले ही जाने की कोशिश करती –कहीं कोई भाई साथ में चिपक गया तो आम के हिस्से बाँट हो जाएंगे।

नियम था स्कूल से सीधे घर आओ। एक दिन तो मैंने हिम्मत करके सारे नियम ताक पर रख दिए और स्कूल से सीधे दुकान पर जा पहुंची। बाबा मेरे आने का कारण तो समझ गए पर  उनकी त्यौरियाँ चढ़ गईं--- आम भागे तो नहीं जा रहे थे फिर टीकाटीक दोपहरी में आने का क्या मतलब! मटकी का ठंडा पानी पीकर बैठ जाओ । मेरे साथ घर चलना। 

     
    डांट खाने पर भी मैं बड़ी खुश!आज तो शाम तक खूब आम खाने को मिलेंगे।
    पानी में तैरते पीले-पीले ,गुलाबी गाल वाले आमों को देख लगा वे हंस हंस कर
मुझे बुला रहे हैं। अपने को ज्यादा काबू में न रख
सकी ।बोली -बाबा,मैं आम खाऊँगी।
-अभी नहीं—आम को थोड़े देर भीगने दो जिससे उनकी गर्मी शांत हो जाए वरना फोड़े-फुंसियाँ निकल आएंगे।

मैं इंतजार करने लगी।
इतने में 2-3 मरीज आ गए। उनके सामने मांगने में शर्म  आने लगी। बाबा मरीजों से कहने लगे-यह हमारी पोती है। कक्षा 6 में पढ़ती है। बहुत होशियार है।बेटा –जरा काली सल्फ की पाँच पुड़ियाँ तो बनाओ। हरी कंपाउंडर कुछ लेने गया है।
मैं बड़ी शान से उठी और तीन दिनों के लिए दवाई की पुड़ियाँ बनाकर दे दी। ये पुड़ियाँ कागज की थीं। वैसे भी बाबा का काम कर के उन्हें खुश कर देना चाहती थी ताकि आम मिलने की शुरुआत तो हो।
उनके जाते ही फिर बोल पड़ी –बाबा-----।  
                                                                        बाबा ने पूरी बात सुने बिना मेरे हाथ में दो आम थमा दिए जिन्हें चूसकर मन ही 

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 मन उछलने लगी – आज तो मैंने सबसे पहले खाए हैं।किसी और को तो मिले भी नहीं ---टिल्ली---टिल्ली।

दो आम तो दो मिनट  में ही खतम हो गए। बाकी आमों की खुशबू सूंघते –सूंघते 4बज गए। बाबा को मुझ पर तरस आया-भूख लगी होगी ,6 बजे तक घर जाना होगा। बोले -ये दो आम और ले लो।
हाथ बढ़ाकर झट से लपक लिए कहीं बाबा का मन न बदल जाए।Image result for two small mangoes
आह!चार आम --बल्ले --बल्ले। जल्दी जल्दी चूस गई।
  
6 बजते ही दुकान बंद हुई। आगे –आगे मैं बाबा के साथ ,पीछे-पीछे कंपाउडर आम का झोला लटकाए चल रहा था। कोट,अचकन पहने मेरे मुच्छी वाले बाबा उस समय बड़े रोबीले लग रहे थे। दुकानवाले बाबा को सलाम ठोकते । लगता सिर झुकाकर वे मुझे ही सलाम कर रहे हैं। मेरी गर्दन शान से तन जाती। वैसे भी इठलाती-इतराती हवा में उड़ रही थी -----घर जाकर तो दो आम और मिलेंगे।  हिसाब लगाया -बाबा,अम्मा–पिताजी,चाची –चाचा सबके दो –दो,मुन्ना के दो ,छोटे भाइयों को तो एक -एक ही चल जाएगा –छोटे हैं न। बांटने के बाद दो आम तो जरूर बच जाएंगे। उन्हें तो रात में आराम से खाऊँगी जब सब सो जाएंगे।
रात के भोजन के समय अम्मा ने सबको आम दिए। वे दूसरों को आम देती मुझे कुछ-कुछ होने लगता। झोले में झांककर देखती –खतम तो नहीं हो गए। घर में सबको देने के बाद अम्मा ने नौकरों को भी दिए। बाद में मुझे आवाज लगाई ,मैं दौड़ी-दौड़ी गई कि बचे आम तो अब मेरे हिस्से ही पड़ेंगे।
बोली –ये आम रख आ।
-माँ मुझे तो तुमने आम दिए ही नहीं ---।मैंने अपना हाथ पसार दिया।
-तेरे बाबा ने जरूर तुझे दिए होंगे।

मैं चुप !कहीं पोल न खुल जाए।
- अच्छा ले –तू भी दो ले ले। मगर इससे ज्यादा नहीं !आम की ऐसी दीवानी है कि खाना पीना भी भूल जाए।
अम्मा की झिड़की भी बुरी नहीं लगी।आखिर आम तो मिले। एक हाथ से मुन्ना का हाथ पकड़ा और दूसरे हाथ में दो आम थामे दनादन सीढ़ियाँ चढ़ छत पर जा पहुंची। एक आम मुन्ना को दिया। इस बार तो उसे देना ही था वरना मुझे अकेली छोड़ नीचे भाग जाता।  दूसरा मैंने चूसा। गुठली को बहुत देर तक चूसते रहे जैसे मेरी छोटी बहन अंगूठा चूसती थी।
अब मैं यह सोचने लगी कि गुठली का क्या किया जाए। 
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तभी रक्का अपनी दोमंज़िले घर की छत पर खड़ा दीख गया। उसने हमारी दो पतंगें काटी थीं,इससे मैं उससे चिढ़ी बैठी थी।
-मुन्ना ,देख रक्का खड़ा है ,इसकी छत पर गुठली से निशाना लगाते हैं।
-अरे अभी नहीं !अंकल भी छत पर हैं ।
 हम झट से मुँडेर के पीछे छिप गए।बीच बीच में उचककर देखते रक्का की छत खाली हुई या नहीं।  
रक्का जल्दी ही अपने पिता जी के साथ नीचे चला गया और हमने छककर लगाया गुठली से निशाना—पड़ी उसी की छत पर। हमारा तिमंजिला मकान होने के कारण इस निशानेबाजी को कोई देख न सका वरना हम ही लाल-पीली आँखों का निशाना बन जाते। इसके बाद एक मिनट भी छत पर रुके नहीं। दबे पाँव कमर के बल झुके झुके नीचे उतर आए।
रात को बहुत देर तक नींद नहीं आई। एक ही बात सोच रही थी-आज तो बाजी मार ली --एक नहीं--दो नहीं --पाँच -पाँच आम खाए है। कल आम ही आम खाऊँ तो कितना अच्छा हो।

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बालमन की चौकड़ी में आम के साथ साथ गुठली का भी बड़ा नाम और काम था।  वे दिन याद आते ही चेहरा तो बस खिल खिल उठता है।


(चित्र -गूगल से साभार )

क्रमश: 

3 टिप्‍पणियां:

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  3. सुधाकल्प जी आप की यह रचना बहुत ही नीरस है आप अपनी रचनाएं शब्दनगरी पर भी लिख सकती हैं यहाँ पर भी मनुष्यता के सजग प्रहरी जैसे लेख लोग प्रस्तुत करते हैं.........

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