नये वर्ष की नई अभिलाषा ----

बचपन के इन्द्र धनुषी रंगों में भीगे मासूम बच्चे भी इस ब्लॉग को पढ़ें - - - - - - - -

प्यारे बच्चो
एक दिन मैं भी तुम्हारी तरह छोटी थी I अब तो बहुत बड़ी हो गयी हूं I मगर छुटपन की यादें पीछा नहीं छोड़तीं I उन्हीं यादों को मैंने कहानी -किस्सों का रूप देने की कोशिश की है I इन्हें पढ़कर तुम्हारा मनोरंजन होगा और साथ में नई -नई बातें मालूम होंगी i
मुझसे तुम्हें एक वायदा करना पड़ेगा I पढ़ने के बाद एक लाइन लिख कर अपनी दीदी को अवश्य बताओगे कि तुमने कैसा अनुभव किया I इससे मुझे मतलब तुम्हारी दीदी को बहुत खुशी मिलेगी I जानते हो क्यों .......?उसमें तुम्हारे प्यार और भोलेपन की खुशबू होगी -- - - - - -I

सुधा भार्गव
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मंगलवार, 3 अगस्त 2010

मैं जब- - -

मैं  जब  छोटी  थी

चप्पल चोर / सुधा  भार्गव

मैं  जब  छोटी  थी  अपने   साथी  को  सबक  सिखाने  में  माहिर  थी  I
बात  कक्षा  ६  की  है  I उन  दिनों  टाट  की पट्टियों  पर  बैठकर   पढ़ते  थे I वे दरी  की  तरह  जूट  से  रंग -बिरंगी  बुनी  होती  थीं और  जमीन  पर  बिछती  थीं I चप्पलें  हम  छात्राएं   टाट  के  नीचे  रखती थीं  ताकि  वे  खो  न  जायें I  उन  पर  हमारी  सवारी  रहती  I

    दिल्ली  वाले  चाचाजी  एक  बार  मेरे  लिए    बिल्ली  सी  चप्पलें  लाये I  उनकी  बटन  सी   भूरी  ऑंखें   चमकती  रहती  थीं  I मैं  बड़े  शौक  से  उन्हें  पहनकर  स्कूल  गई  ताकि  देखने  वाले देखते  ही  रह  जायें ,उनकी  त्तारीफ  में  बोले तो  मेरे  चेहरे  पर  चाँद  उग  आये  I मैंने  उन्हें  टाट  के  नीचे  रख  दिया  I
टिफिन   खाने  की  आज्ञा  कक्षा  में  नहीं  थी I घंटी  बजते  ही  खाने  का  डिब्बा  लेकर उछलती -कूदती   खेल  के  मैदान  में चली   Iकुछ  गिराया -कुछ  खाया ,खेला- - -   पसीना  बहाया   और  कक्षा  में  लौट  आई  जैसे  ही  टाट  पर  बैठी  - - -चप्पल  तो  नदारत I

मैं  न  घबराई  न  बहिन   जी से  शिकायत  की  लेकिन  मुड़कर  पीछे  बैठने   वाली  लड़की  को  अवश्य  घूरकर    देखा I उसका  नाम  दया  था I मुझसे  आँखें  मिलते  ही  उसने  मुँह दूसरी   ओर  कर  लिया जैसे  अजनबी  को  देखकर  मुड़  जाते  हैं I मैं  समझ  गयी  -चोर  की  दादी  में  तिनका  है  Iउससे  चप्पल  रखवाने की  कसम   खा  ली I  मैंने  बैठी  हुई  दया   के     टाट   के  नीचे   दो  उँगलियाँ  घुसाकर  उन्हें टटोलने  की  कोशिश   की पर  बात  नहीं  बनी I उससे  लड़ने  या  कुछ  कहने  की  हिम्मत  नहीं  हुई  पढ़ाई जो  चल  रही  थी I

छुट्टी  होने  पर  मैंने  उसका  पीछा  करने  की  कोशिश  की  पर  वह  तो  हिरन  की  तरह   भागे  जा  रही   थी I वह  मेरी  चप्पलें  पहने  हुई  थी I  देखकर  बहुत  गुस्सा  आया   मेरी  नई -नवेली  चप्पलें  दूसरे  के  पैर  में  और  मैं  - - - नंगे  पाँव !अच्छा  हुआ  किसी  ने  देखा  नहीं   वरना  अच्छा   -खासा  मजाक  बन  जाता , हजार  प्रश्नों  की  बौछार  अलग I चूहे -बिल्ली  की  दौड़  में  अन्य सहेलियाँ  बहुत  पीछे  छूट  गई  थीं I

अगले  दिन  मैंने  बड़े  दुखी  मन  से  पुरानी  चप्पलें पहनीं  और  स्कू ल  चल  दी I समझ  नहीं  पा  रही  थी  क्या  करूँ !  किसी  सहेली  से  सलाह  लेने  में  भी  डर  लगता I  वह  दया  से  उल्टी -सीधी  न  जड़  दे I मैं  उजागर  नहीं  करना  चाहती  थी  कि  उसने  मेरी  चप्पलें  ली हैं I   उसे  कोई  बुरा -भला  कहे  यह  भी  मुझे  सहन  नहीं  था I बड़े  धैर्य  से मैंने  स्कूल  में  प्रवेश  किया I

प्रार्थना  सभा  से जब  मैं  कक्षा  में  लौटी  तो  देखा  -दया  अपनी  जगह  आसन  जमाये  बैठी  है I पढ़ाई  शुरू हो  गई  पर  मेरा  मन  तो  कहीं  और  था  -बच्चू  मुझसे  बचकर  कहाँ  जायेगी  !टिफिन  टाइम  में  देख  लूंगी !खामोशी  से  बुदबुदाई I

टिफिन  का  समय  होते  ही  छात्राएं  भागीं  टिफिन  ले -लेकर  मानो  पिंजरे  में  कैद  चिड़ियों  को   आजादी  की  हवा  में  साँस  लेने  का  मौका  मिला  हो I मुझे  भी  एक मौका  मिला I जब  दया  को  बाहर  गये  दस  मिनट  हो  गये  मैंने  धीरे  से  उसके  बैठने  की  जगह  का  टाट  उठाया I  झटसे  
बिल्ली  वाली  चप्पलें  निकालीं  और  उसकी  जगह  पुरानी  चप्पलें  रख  दीं   Iअपनी  जगह  मैं  आलती  -पालती  मारकर  बैठ  गई I 
भूखी  ही  रही   मैं  उस  दिन I बाहर  जाने  से  डर  रही  थी  कहीं  फिर  से  कोई  चालाक  लोमड़ी  इनके  पीछे  न  पड़  जाये I बड़ी   मुश्किल  से  तो  चप्पलें  वापस  मिलीं I इंतजार  करने  लगी   कब  छुट्टी  हो  और  कब  भागम - भाग  हो I 

टन- - टन - - टन - - टनाटन !छुट्टी  हो गयी   I दिल  भी  बाग़ -बाग़  हो  गया  I
विश्व  विजेता  की  तरह गर्व  से टाट के   नीचे  से  प्यारी  चप्पलें  खीचीं ,पहनी  और  इस  बार - - -  मैं  भर  रही  थी  हिरन  सी  चौकड़ी I
 पीछे -पीछे मुँह  लटकाए  दया  धीमी  गति से चल रही  थी  I डगमगाती  सी  दुखी  सी I
मैं  अपनी  खुशी  ज्यादा  देर   छिपा  न  सकी I शाम  को  खेलते  समय कुछ  सहेलियों के  सामने   चिल्ला  उठी --मिल गई -मिल गई  I         
 सब  ने  एक  साथ  पूछा --क्या ?
-खोई  चप्पल मिल  गईं  - - -कहते  हुए खरगोश  की  तरह  फुदकने  लगी I

दूसरे  दिन  कुछ  जल्दी  ही  स्कूल  पहुंच  गई  और  जी  भरकर  अपनी  चतुरता  का  बखान  किया I जैसे  ही  दया कक्षा  में  घुसी  पूरी  कक्षा  चिल्ला  उठी  -चप्पल  चोर - - - -चप्पल - - - चो - - र  I
शोर  सुनकर  एक  बहिन  जी  कक्षा  में  आईं  I लड़कियां   एकदम  खामोश !सावधान  की  मुद्रा  में  खड़ी  हो  गईं I उनके  जाते  ही  फिर  शोर  होने   लगा  I मगर  इस  बार  दूसरी  तरह  का  शोर  था   I कोई  परीलोक  की  बातें  करता  तो  कोई   गुड़ियों  की  तो  कोई  कल्पना  जगत  में  खो  सा  गया I   मैं  और  दया  भी  फिर  से  हिलमिल  गये  दोस्ती  की  गंगा  में  पुन: बह  गये I नादान  दिल  भूल  गये  -किसने - क्या -किसके  साथ  किया ?

6 टिप्‍पणियां:

  1. सुधा जी , यह शृंखला बहुत अच्छी है । अतीत की सैर कराने वाली ।

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  2. आपके इस संस्मरण ने मेरे इस विचार को पुष्ट कर दिया कि दब्बू बच्चे भावी योजना बनाने में अक्सर तेज-तर्रार सिद्ध होते हैं। आपने 'चप्पल चोर' के कान आखिर काट ही लिए।

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  3. BCHPN KA TO JBAB HI NHI HAI
    AAP BCHPN SE PRICHT KRVA KR NAI URJA BHR RHI HAIN
    BDHAI
    DR. VED VYATHIT

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  4. सुधा जी ,
    प्रणाम !
    बचपन कि एक झलक '' चपपल चोर '' ,के रूप में हम ने खूब सुरती से देखी , पढ़ी ,
    मनो हमे ने बचपन जी लिया हो .
    सादर

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  5. मासूम संस्मरण...अच्छा लगा. कभी मेरे ब्लॉगों पर भी आयें.

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