नये वर्ष की नई अभिलाषा ----

बचपन के इन्द्र धनुषी रंगों में भीगे मासूम बच्चे भी इस ब्लॉग को पढ़ें - - - - - - - -

प्यारे बच्चो
एक दिन मैं भी तुम्हारी तरह छोटी थी I अब तो बहुत बड़ी हो गयी हूं I मगर छुटपन की यादें पीछा नहीं छोड़तीं I उन्हीं यादों को मैंने कहानी -किस्सों का रूप देने की कोशिश की है I इन्हें पढ़कर तुम्हारा मनोरंजन होगा और साथ में नई -नई बातें मालूम होंगी i
मुझसे तुम्हें एक वायदा करना पड़ेगा I पढ़ने के बाद एक लाइन लिख कर अपनी दीदी को अवश्य बताओगे कि तुमने कैसा अनुभव किया I इससे मुझे मतलब तुम्हारी दीदी को बहुत खुशी मिलेगी I जानते हो क्यों .......?उसमें तुम्हारे प्यार और भोलेपन की खुशबू होगी -- - - - - -I

सुधा भार्गव
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मंगलवार, 16 अगस्त 2011

जब मैं छोटी थी


॥11॥खट्टी-मीठी इमली 
सुधा भार्गव


मैं जब छोटी थी मुझे इमली .बेर ,जामुन खाने का बड़ा शौक था। लेकिन उन्हें खाते ही खांसी हो जाती।गले से ऐसी आवाज निकालती मानो कुत्ता भौंक रहा हो | 

मुझे खांसता देख पिताजी को बहुत दुःख होता मानो उनकी दुखती रग को किसी ने  दबा दिया हो। वे  साँस के मरीज थे। हमेशा उनके दिमाग में खौफ की खिचड़ी पकती रहती ---कहीं यह रोग किसी बच्चे को विरासत में न दे जाऊँ।



सोमवार, 6 जून 2011

जब मैं छोटी थी


॥10॥ तरबूज खरबूज की बहार 
सुधा भार्गव


  छुटपन में मुझे तरबूजे -खरबूजे खाने  का बड़ा शौक था।





गरमी के दिनों  में अनूपशहर में  गंगा नदी बहुत दूर चली जाती  हैं और छोड़ जाती हैं अपने पीछे बड़ा सा रेतीला मैदान जहाँ खरबूजे -तरबूजे की खेती होने लगती  है।                                



                                                                          बाबा रोज गंगा नहाने जाते  थे। मैं और मेरा छोटा भाई भी साथ हो लेते।रास्ते में खेत  मिलते। उनमें छोटी - छोटी -हरी ककड़ियों को देखकर मैं जैसे ही  तोड़ने को हाथ बढ़ाती जोर का धमाका  होता ---मुन्नी ----!जैसे बम  फूटा हो --!बढ़े हाथ तुरंत पीछे हो जाते।

एक बार रेतीले मैदान में धोबी का लड़का कैलाशी मिल गया  ।उसे देखकर  मैं बहुत खुश हुई ।सोचा--अब तो यहाँ   खूब धमाचौकड़ी करेंगे। उसके बाप ने भी
खेती की थी। गंगा स्नान के बाद बाबाजी पूजा के लिए बैठने ही वाले थे कि वह आया और बोला ---
--बाबू जी इन्हें अपना खेत दिखा लाऊँ ।

--ले जाओ लेकिन जल्दी आना।
  तीर की तरह वहाँ से हम निकले कहीं बाबा अपना इरादा न बदल दें।
कैलाशी मेरी उम्र का दस -ग्यारह वर्ष का होगा । हम एक -दूसरे का हाथ पकड़ते -मटकते चल दिये ।

रेतीला खेत बहुत दूर था  । सूखी बालू में चलने की आदत भला कहाँ !




 ----एक पैर उठाते दूसरा रेत में घुस जाता । कभी  चप्पल अन्दर घुस  जाती, केवल  पैर ही बालू से निकल  पाता ।
कैलाशी ने मुन्ना को तो अपने कंधे पर बैठा लिया और  मुझसे बोला ----
-नंगे पैर चलो और चप्पलों को हाथ में ले लो।
चलने में थोड़ी सुविधा हुई
। अच्छा हुआ सूर्य महाराज का मिजाज ठंडा था सो बालू  गर्म नहीं हुई   वरना   तलुए ही झुलस जाते।

थोड़ी दूर चलनेपर मैं तो हांफने लगी।कैलाशी मुन्ना को लिए हिरन की तरह भाग रहा था।
मैंने आवाज दी ,ओ-- कैलाशी-- धीरे चल ,मैं रास्ता भूल जाऊँगी ।
वह एक क्षण रुकता ---फिर भागने लगता मानो उसके पैरों में पहिये लगे हों।

हमको आया देख धोबी काका(कैलाशी के पिताजी )बड़ा खुश हुआ।उसने अपने लाल ,पतले अंगोछे  से लकड़ी का तख़्त झाड़ा और प्रेम से बैठाया।

कैलाशी की बहन पारो ने  फुर्ती से ३-४ हरी -मुलायम
ककड़ियां तोड़ीं ।पानी से धोईं।
बोली --भैया ,खाओ --दीदी  तुम भी खाओ।
हम खाने में सकुचा रहे थे।वह ही ---ही करके हंस पड़ी।
--अरे तुम्हें खाना भी नहीं आता ---!देखो ऐसे खाते हैं -------।

उसने झट से एक ककड़ी दाँतों के बीच में दबाई।खट से आवाज हुई।मुँह में ककड़ी छप -छप चबाने लगी।
मैंने भी बकरी की तरह ककड़ी चबानी शुरू कर दी। ऐसा मजा आ रहा था कि अपनी सारी थकान भूल गई।
                              
      **            
-चलो ,तुम्हें खेत  की सैर कराता हूं।धोबी काका स्नेह से बोले। उन्होंने मेरे मुँह की बात छीन ली ।
बालू  में भी बड़ी मेहनत से क्यारियां बनाई गयी थीं। बीच -बीच में सरकंडे और बांस की खप्पचियां लगी थीं ताकि  बालू सरक न जाय।

एक क्यारी में नये -नये पत्तों के साथ मुलायम गद्दे पर  बेल फैली हुई थी।




 और ककड़ियाँ हिलमिलकर लेटी  थीं।दूसरी क्यारी में खरबूजे लुढ़क  रहे थे।मैंने  छोटा  सा खरबूजा तोड़ने को हाथ बढ़ाया।काका ने टोक दिया--
-अभी यह छोटा और कम  उम्र का है बड़े होने पर पकेगा
.मीठा भी हो जायेगा तब इसे तोड़ेंगे।
खरबूजा बच्चा शरारत से ठेंगा दिखाने लगा ।
  कैलाशी  एक खरबूजा् लेकर भागा -भागा आया।अपनी हथेलियों के बीच उसे जोर से दबाया  --दो टुकड़े हो गये।रसीले गूदे से भरा एक मेरी हथेली पर रखा दूसरा मुन्ना की हथेली पर।
बोला --खाओ।
-कैसे खाऊँ ?चाकू से पहले फांकें काटो।
-छोटे बाबू ,यहाँ चाकू कहाँ से आया।कटा हुआ आम छिलके के साथ कभी खाया है ---!
-हाँ !हाँ ---खाया है ।
-कैसे खाया --जरा बताओ।
-गूदा -गूदा खा लिया --छिलका-छिलका फ़ेंक दिया।
-तुम तो बहुत चतुर हो। बस ऐसे ही खरबूजा खा लो।

उसने खरबूजे के दो टुकड़ों के चार टुकड़े कर दि्ये। एक
टुकड़े  को  दोनों हाथों से पकड़ अपने  दांत उसमें  गड़ाये।देखते ही देखते गूदा चट  कर गया। छिलका  फ़ेंक दिया । हम भी उसकी नक़ल करने लगे। हरा--- .चीनी सा मीठा गूदा खरबूजे का---जल्दी ही पेट में समा गया।

खाते -बतियाते हम आगे बढ़ गये । दूर से मुझे काले सिर दिखाई दिये ।
-कैलाशी ,तुम्हारे खेत   में धूप में  भी  लोग सोते  रहते हैं क्या ?
-क्या कहा !--कहाँ  सोये हैं ---उसने लट्टू सी आँखें घुमायीं ।
उंगली उठाकर मैंने नाक की सीध में दूर इशारा किया।उसका तो हँसते -हँसते बुरा हाल हो गया।पेट पकड़ कर बैठ गया।  मैं हैरत में रह  गई।
क्यारी के  पास आये तो लगा कोई सोया -वोय़ा नहीं है बल्कि हरे -काले -पीले मटके औंधे  पड़े हैं।

-बाप रे !कितने बड़े चिकने -मोटे घड़े हैं ये जमीन पर क्यों रखे हैं ---फूट गये तो ---मुन्ना भाई  चकित हो उठा…।
-ये मटके नहीं हैं बाबू!ये तो तरबूज हैं।इसे  खाते हैं।तुम तो हमें बहुत हँसाते हो--ह--ह--ह--ही--ही--।
-मैंने तो इसे कभी खाया ही नहीं।
-अभी काट कर खिलाता हूं।
काटा तो अन्दर से एकदम लाल ! तरबूज  भी हमारी बातों
पर खूब हंसा होगा ।तभी तो उसका गोरा -गोरा मुँह  हँसते -हँसते लाल हो गया है--कैलाशी बोला ।
उसमें बहुत कम काले बीज थे।स्वादवाला और मीठा -मीठा तरबूज  कैलाशी के  छोटे   भाई की तरह


हम  गपागप खा  गये ।

हम सब बुरी तरह थक गये थे।बाबा के पास हमें पहुँचाने के लिए धोबी काका साथ आया।उसके सिर पर एक टोकरी थी।जिसमें रखे तरबूजों की खुशबू मेरी नाक में घुसी जा रही थी। पेट में तो तरबूज ठूसम-ठास भर लिया था पर मन कर रहा था इन्हें भी खा जाऊँ।

बाबा तो सफेद चंदन का टीका लगाये माला फेर रहे थे --ॐ ---ॐ ---ॐ ।
-डाँ .बाबू ,यह घर के लिए ------|

-तुम तो बहुत सारे तरबूजे  ले आये हो।
-बाबूजी मना मत करो । आप आये दिन मेरे बच्चों को अपने  बच्चे समझ  इलाज करते रहते हैं।क्या मैं इतना भी नहीं कर सकता।
बाबा उसके अपनेपन को देखकर चुप हो गये।

उस दिन तरबूजे -खरबूजों के घर की खूब सैर हुई।अब तो  न धोबी काका जैसा इंसान मिलता है न ही गंगा के उस  किनारे जाना होता है जहाँ मेरा जन्म हुआ ।लेकिन जब भी बाजार में खरबूज -तरबूज देखती हूँ धोबी काका और उनके स्नेह में भीगे तरबूज  -खरबूज खूब याद आते हैं जिनका स्वाद ही निराला था।


* * * * * * * * *  * * * * * * * *

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

जब मैं छोटी थी


॥ 9॥ गंगा का  आँचल
सुधा भार्गव

मैं  जब छोटी थी गंगा नदी के किनारे उछलकूद मचाने का बड़ा शौक था ।





गंगा नदी हमारे घर से थोड़ी दूर पर ही कलकल करती बहती ।  अनूपशहर तहसील  (जिला बुलंदशहर )के पटपरी  मोहल्ले में ऊंचाई पर तिमंजिला मकान था ।जिस पर लगा   भार्गव फार्मेसी का बोर्ड-- अपने में एक पहचान थी।







गंगा का मौसम बदलता रहता | कभी खट्टा कभी मीठा।
 








सर्दियों में जब गंगा  में  बाढ़ आती ,उसके किनारे बने पक्के घाटों की सीढ़ियाँ पानी में ड़ूब जातीं। एक बार तो घाट पर बने कमरों में भी पानी भर  गया।अंधेरी  रात में हमें अपनी छत से गुस्से में भरी लहरों की सांय -सांय की आवाज सुनते समय लग रहा था बस वे आईं ---आईं और हमारे  दरवाजे से टक रायीं । मैं  डर के मारे रातभर सो भी नहीं पाई।

गरमी में गंगा का पानी सूखने लगता्।  वे  दूर चली  जाती्।तब तो-- मजा ही मजा--। छुट्टी के दिन किनारे  जाकर बालू का मैं महल बनाती ।




जिसका महल ऊंचा बनता आप जानकार उसे लात मार भाग जाती |मैं आगे -आगे .महल बनाने वाला पीछे -पीछे । पकड़ायी में आजाती तो एक थप्पड़ लग ही जाता  । इसी बीच पिताजी की कड़क दार आवाज सुनाई देती --रुक जाओ --------।
भागते कदम जम जाते |


मुझे मछलियाँ  बहुत प्यारी लगतीं  ।मैं उन्हें घर में रखना चाहती थी ।

कई बार कम पानी में रंग -बिरंगी तैरती मछलियाँ  पकड़नी चाहीं  पर वे मेरे हाथ से निकल -निकल जातीं |
दुखी मन से एक दिन  मैंने पूछा --शीला ,मैं मछली कैसे पकडूं!
-चुटकी बजाते ही पकड़ सकती हो । मछली आटे की गोलियां बड़े शौक से खाती है
|


 गोलियां देखते ही वह  दौड़ी आयेगी  बस --तुम उसे  पकड़ लेना ।मेरी सहेली बोली।

मैंने रात में ही माँ के पीछे पड़कर आटे की गोलियां बनवा लीं । अगली शाम शीला के साथ खुशी से गंगा किनारे चल  दी --आज तो एक लाल ,एक नीली .,एक पीली मछली लेकर ही लौटूंगी । साथ ही मछलियों को बंद करने के लिए एक डिब्बा भी ले लिया।

-शीला --शीला मैं  आटे की गोलियां डालती हूँ | तू मछलियाँ पकड़।
-न बाबा ---मैं नहीं पकड़ सकती।
-क्यों ?डरती है क्या ----डरपोक  कहीं की ----।
तू डाल गोलियां ,मैं पकड़ती  हूँ ----।मैं झुंझला उठी।
-अरे जल्दी पकड़ देख --देख मछली खाकर भाग गई।शीला
घबराई



-अभी पकड़ती हूँ --छप---छप।
-एक भी नहीं पकड़ी ----सारी गोलियां ख़त्म हो गईं ।
-कैसे पकडूं --बहुत चा्लाक  हैं मछलियाँ।मेरे हाथ बढ़ाने  से पहले ही भाग जाती हैं।मैं रोती सी हो गई।
-मछली चालाक नहीं है ।वह तो सब समय पानी में रहती है । बिना पानी के तो मर जायेगी !
-मर जायेगी -----भगवान् के घर चली जायेगी -----।
-हाँ ------ ।

-नहीं --नहीं--मैं उसे मारना नहीं चाहती । चल  चलें ------।

मैं खाली हाथ घर लौट आई पर लगा हाथ भरे -भरे हैं और मछलियाँ पानी से मुँह निकाल -निकालकर कह रहीं हैं थैंक्यू -------थैंक्यू --|




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सोमवार, 10 जनवरी 2011

मैं जब छोटी थी


॥ 8॥ गुड़िया की शादी 
सुधा भार्गव 




मैं जब छोटी थी धुन की बड़ी पक्की थी |मन में एक बार जो समाया वह पूरा होना ही चाहिए I

एक बार
मैं चचेरी बहन गौरी की शादी में कन्नौज गई  I लौटते समय एक ही बात रह -रहकर सूझ रही थी -मैं गुड़िया की शादी करूँगी  I

बिना देर किये अपनी सहेलियों को बुलाया और कहा -मैं तो गुड़िया की शादी करूँगी I मगर उसमें बहुत काम होता है   Iमेरी मदद करो  I गुड़िया तो मेरे पास है लेकिन गुड्डा चाहिए I
-गुड्डा मेरे पास है I मंजू चहकी I
-फिर तो बन गया काम  Iअब शादी कब की जाए- - - -I
-परीक्षा के बाद ----मई में  I गाजे -बाजे के साथ रचाएंगे
शादी I

निंटी,पिंटी ,चींटी गला फाड़ने लगीं ----
-मैं  तो ढोल बजाऊँगी i
-मैं गाना गाऊँगी I
-भांगड़ा तो मैं करूँगी I
-अरे चुप कान फोड़ दिये --कह दिया न ,पहले पढ़ना है I
मेरी डांट खाकर सब घर चली गईं I

परीक्षा ख़तम होते ही मेरी तो नींद उड़ गई I गुड़िया की शादी के कुछ ही दिन रह गये थे I
भागी -भागी बाबूराम बढ़ई के पास गयीI वे दवाइयों के लिए डिब्बे बनाते थे I
-
बढ़ई ताऊ ,५मई  को मेरी गुड़िया की  शादी है I लकड़ी की एक गाडी  बना दो I उस  पर दूल्हा बैठेगा  और बारात निकलेगी I
-हमें भी शामिल होना है उस बारात में I
-ना ताऊ - - -तुम्हारी मूछें देखकर मेरी गुड़िया डर जायेगी वैसे भी बारात बच्चों की है I

रात को अम्मा -पिताजी खाने कोबैठे I मैंने एलान किया -
५ मई को मेरी गुड़िया की शादी है  Iबहुत से बराती आयेंगे I उन्हें कुछ तो खिलाना होगा  Iसोच रही हूं-- मीठी गोलियां खाने को दे देंगे  iआप नंदू हलवाई को कहकर दवा  वाली गोल -गोल छोटी- बड़ी गोलियां बनवा दीजियेगा  I

--अम्मा ,गुड़िया को सुन्दर से कपड़े चाहिए I उसके लिए चमकीला -चमकीला लहंगा बनाना  गौरी दीदी जैसा I शादी में पहने वे बहत अच्छी लग रही थीं I

मेरी चाची को पूजा का बड़ा शौक था I वे बाल -गोपाल के लिए रंग -बिरंगी पोशाकें बनातीं  और पुरानी पोशाकें सावधानी से रखतीं  Iएकदिन दबे पाँव बिल्ली की तरह ताक -झांक करती उनके कमरे में घुस गई  Iसिंहासन के नीचे कुछ कपड़े दिखाई दियेI बस खींच लिये ३-४ जोड़ी कपड़े I हो गया कपड़ों का काम पूरा I

बेदा की अम्मा खाना बनाया करती थी  I उससे बड़े रौब से बोली -मिट्टी का छोटा सा एक चूल्हा बना दो  गुड़िया की शादी के लिए I उसपर पूरी -कचौरी और लड्डू बनाने है I

--मगर नमकीन लड्डू बना दूँ तो कैसा रहेगा !
--बेदा  की अम्मा - - -तुम मुझसे इतनी बड़ी  हो- - - फिर भी नहीं  मालूम - - -लड्डू मीठे ही होते हैं I मुझे तो तुमसे बहुत डर लगने लगा है I
-काहे का डर !हमसे - - -बिटिया - - -I
-यही कि  तुमने  क
चौरी मीठी बना दीऔर  हलुए में डाल दिया नमक - - हमारी तो बड़ी बदनामी हो जायेगी I मैंने परेशान होकर अपना माथा थाम लिया i

-बिटिया चिंता न करो ,हम सब ठीक करेंगे I
मैंने सिर उठाया और उंगली तान
ते बोली --
--देखो बेदा  की अम्मा - - -कोई भूल न करना I
-हम कान पकड़े है कोई भूल नाही करेंगे
I
मेरे जाते ही वह बुदबुदाई  --बाप रे !छोरी तो पटाखा है I

शादी का  दिन आ पहुँचा I मैं सुबह से ही मधुमक्खी की तरह कोई न कोई काम में लग जाती थी  I
मंजू भी आ पहुँची I साथ में था गुड्डा --धोती कुरता पहने ,सिर पर मुकुट, झलझल करती मोती की लड़ियों
से ढका चेहरा I

-अरे दूल्हा तो दिखाओ  I नीनाबहुत उतावली थी I
-ना बाबा - - - -उसे नजर लग जायेगी !और हाँ - - - दुल्हन का घूँघट  नीचा कर दो I उसको भी तो किसी चुड़ैल की नजर लग सकती है I मंजू बोली i


रंग  -बिरंगे कागजों से सजा लकड़ी  का रथ बनाकर ताऊ ले आए I उस  पर गुड्डा -गुड़िया बैठा दिये  Iअचानक मैं हड़बड़ा उठी - -  गुड़िया केसाथी  छुटकी-बड़की ,मोटू -पतलू ,कानू -लल्लू भी तो जायेंगे  इ उन्हें कहाँ बिठाऊँ ! ताऊ  - --अब मैं क्या करूँ - - - !
-मैं अभी लाया दूसरी गाड़ी ,परेशान न हो मुन्नी I
वे भागे -भागे  गये ,खटर -पटर की आवाज के साथ
लौट आये I एक मिनट को लगा भूचाल आ गया है  I  
उनकी  -इस खटपटिया  गाड़ी  में सारा गुड़िया नगर 
समा  गयाI

मुन्ना ढोलक को गले में लटकाकर जोर  से थप -ठप करने लगा I
मंजू का भाई मुस्कान उड़ेलता छोटे --छोटे - हाथों से कीर्तन करने के मजीरे आपस में भिड़ाता

उसका दोस्त मेले से कागज का बिगुल ले आया  I मुँह से बजाते ही पों -पों की आवाज होती I   

मेरी सखियाँ कोयल से गीत गाती आगे बढ़ रही थीं I
शैतान चुन्नू  गुड्डे -गुड़िया का रथ खींचते समय बार बार झटका दे देता I मेरी तो जान ही निकल जाती- - - कहीं गिर गये तो ----! 
खट पटिया गाडी से तो  जरूर कभी बौनी गुड़िया गिर जाती तो कभी लम्बू पर चतुर तुनतुनिया उन्हें फिर बैठा देता I

अद्भुत थी बारात I
मंजू रथ केपीछे से गेंदा -गुलाब की  बरसात करते हुए अपनी खुशी छिपा नहीं पा रही थी  I

घर के पास ही एक तिकोना मैदान था  I बारात उसके चक्कर लगाती  रही I जब वह थक गयी तो मेरे दरवाजे पर आकर रुक गई I

मैंने गुड्डा -गुड़िया को छोटे -छोटे फूलों की  मालाएं  पहनाई I  खुशी मेरे चेहरे से छलकी जाती थी  Iधीरे से उन्हें रथ से उतारकर  अन्दर ले गई I

गोल -गप्पे और चाट -पकौड़ी देख बराती ढोल -मजीरा छोड़ उन पर टूट पड़े  I कुछ मक्खी  की तरह बालूशाही ,इमारती और लड्डू  से चिपक गये I बाबा ने बारातियों को चूरन और टाफियां  भी दीं I

विदा का समय आ गया I बाराती खुश ,मैं उदास I

-मेरी गुड़िया पराये घर जा रही है , कैसे रहूँगी उसके बिना I
--अरे इसमें दुखी  होने की क्या बात है !तुम उसे चाहे जब ले आना I
-ओह मंजू ---तू समझती  नहीं !ऐसा कहना जरूरी  है Iगौरी दीदी जब ससुराल जा रही थीं तो मौसी ने ऐसा ही कहा था  I वे उसे गले लगाकर रोई भी बहुत थीं  I मेरे तो  आंसू ही  नहीं  निकल रहे----  मेरी गुड़िया भी नहीं रोती--- अव मैं क्या करूँ !

दादी -बाबा ,चाची -अम्मा ने हमारी बातें सुन लीं I हँसते -हँसते उनका तो पेट दुखने लगा और आँखों से आँसू निकल  आये I
मैंने समझा वे बहुत दुखी हैं ,उनका दुःख मुझसे देखा नहीं गया और दहाड़ मारकर रो पड़ी I

अचानक बारात से शोरगुल उठने  लगा - - - - -
नहीं जायेगा  ...नहीं जायेगा
ससुराल से दूल्हा नहीं जायेगा
ले आई ...ले आई
गुड़िया गुड्डे को ली आई I


मैं परेशान हो उठी I
-मुन्ना-- क्या हुआ !
-मुझे कुछ नहीं हुआ दूल्हे राजा को कुछ हो गया है |
वह तो अपने घर जाना ही नहीं  चाहता I
-क्यों ?
-खूब लड्डू -कचौरी खाने को जो मिले हैं ,अब तो ससुराल में बैठकर रोज माल -पुए उड़ायेगा I
मैं तो खिल -खिल उठी  | गुड्डे -गुड़िया को हाथों में झुलाती हुई भाग चली गुड़िया नगर
की ओर I उसे   वहाँ का राजा बना दिया I जिससे गुड्डा हमेशा खुश रहे और मेरी गुड़िया को लेकर भाग न जाये  Iभाग जाता तो- - -   मेरा क्या हाल होता - - - -आप ही जरा सोचो - - -I



* * * * * * *

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

जब मैं छोटी थी

 
॥7॥ गुड़िया घर 
सुधा भार्गव




मैं जब छोटी थी गुड़िया खेलने का बड़ा शौक था i
मेरे पास कोई एक गुड़िया नहीं थी बल्कि लकड़ी की अलमारी
में उनका  बड़ा सा घर बसा हुआ था I माँ के हाथ की बनी रंग-बिरंगी गुड़िया बहुत नखरेवाली  हमेशा चारपाई पर
बैठी रहती I                       

जयपुर से बुआ लकड़ी की गुड़िया लायीं I उसकी तो हमेशा गर्दन ही हिलती रहती I दूसरी बार  आयीं तो लकड़ी के बर्तन लायीं Iमुझे बड़ा बुरा लगा I

मैंने तो कह दिया --बुआ ,मेरी गुड़ियाँ तो स्टील के बर्तन में  खाती है और हाँ ,जमीन पर सोने से उन्हें ठण्ड लगती  है Iअगली बार आओ तो पलंग और मेज -कुर्सी  जरूर  ले आना I
बुआ के कारण गुड़िया घर  भरा -पूरा लगता था I

मैं मथुरा बड़े शौक से जाती  वहाँ मेरी मौसी रहती थींI मौसी सुन्दर -सुन्दर गुड़ियाँ ब नातीं I वहाँ पहुँचते  ही कहना शुरू कर देती --
-मेरी अच्छी मौसी! प्यारी सी एक गुड़िया बना दो I
-बिटिया ,जरा खाना बना लूँ फिर छोटी सी गुड़िया बना दूंगी I
-छोटी नहीं ---बड्डी सी - - अपने 
  दोनों हाथों को फैला देती I
-थोड़ी देर में फिर कहती --खाना बनाने में मौसी बहुत देर करती हो  I पहले मेरी गुड़िया बना दो |

माँ झुंझला पडतीं --जब देखो रट लगाये रहती है -गुड़िया बना दो ---गुड़िया बना दो I नहीं बनेगी तेरी गुड़िया I खाना बनाने के बाद तेरी मौसी खाना खायेगी I

पेट भरते ही मौसी पलंग पर लुढ़क जाती और भरने लगती खर्राटे मैं खड़ी इन्तजार करती --कब मौसी जगे ,कब कहूँ ;अब तो बना दो मेरी गुड़िया I

एक  दिन मौसी की नींद खुली I देखा -मैं  चुप से खड़ी हूँ I वे मेरे मन की बात जान गयीं I उठीं ,बक्से में से पुरानी धोती  निकाली I उसे जमीन पर फैलाया Iगुड़िया के हाथ की ड्राइंग करके उसकी दो परतें काटीं I

फुर्ती से चलते मौसी के हाथों ने शीघ्र ही सुई -धागा थामा,तीन तरफ से हाथ की सिलाई की I उसमें रुई भरकर बोली  --ले हो गया हाथ तैयार I
-एक ही हाथ बनेगा क्या !
-गुड़िया का दूसरा हाथ पैर सर सब बनेंगे तू देखती जा I

मैं सच में अपनी मौसी को निहार रही थी I
कभी कहती -ठंडा  पानी  लाऊँ I मिट्टी  के घड़े से पानी लाती I
कभी कहती -पंखा झल दूँ  Iछोटे हाथों से पंखा डुलाने  लगती I
मौसी की गुड़िया बन तो  गई पर - - -  - - - 
मेरी हंसी छूट पडी ---ही --ही --गंजी --इसके तो बाल ही नहीं  हैं I
-तू तो चाहती है एक मिनट में गुड़िया बन जाय I जरा सब्र करI इस सुई में धागा डाल I मुझे कम दिखाई देने लगा है I

मैंने धागा डाला I मौसी ने लम्बे -लम्बे बाल बनाये I हवा का झोंका आया, वे लहराने लगे I आँखों की जगह दो बटन टीप दिए I
-इसका तो मुंह ही नहीं है खायेगी कैसे !
-उफ !चुप हो जा !अब काले की जगह लाल धागा सुई में पिरो दे I
मौसी ने अनार के दानों से लाल ओंठ बना दिए I गुड़िया हंसने लगी I
मै बतियाने लगी--मेरी रानो,मौसी तुझे सितारों से चमकते कपडे पहनाएगी I
-मैं  तो थक गई ,कल पहनाऊंगी I
-मैं अभी  आपके पैर दाब देती हूँ I बोलो- कहाँ दर्द है !दो मिनट की ही तो  बात है बस अपनी जैसे साड़ी पहना दो I
माँ तो बरस पडी --हद कर दी तूने ! दीदी को अब आराम करने दे I
--डांट मत,बच्ची बहुत भोली है अभी पहना देती हूँ इसे  साड़ी I भद्दी भी लग रही है
|

मैं तो झूम -झूम उठी- आह! मेरी अच्छी मौसी !

  गुड़िया को जल्दी से गोदी में लिया और निकल गई बाहर घुमाने I लगा  जैसे वह मेरे शरीर का एक अंग हो I खुश होती तो उसे प्यार करती ,कोई मुझे डांटता तो जी भरकर उससे  शिकायत  करती I

                                                                                वह मुझे सच्ची दोस्त लगी इसलिए उसे मैंने गुड़िया घर में सजा कर रख दिया I वह मुझे टुकुर -टुकुर देखती  रहती पर समय की धूल ने हम दोनों के बीच पर्दा डाल दिया I
* * * * *

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

मैं जब छोटी थी

 

  ॥6॥पहले कहानी फिर बनूं रानी
सुधा भार्गव 




मैं  जब  छोटी  थी कहानी सुनने का  बड़ा  शौक  था I बिना  कहानी  सुने  खाना  ही  हजम  नहीं  होता  था I पहली  कक्षा  से  ही कृपा शंकर  मास्टर  जी  घर  पढ़ाने  आया  करते  I  उन्हें  मैं  मास्साब -मास्साब  कहा  करती I आते ही नारा  लगाते ---मुन्नी  रानी  करो  पढ़ाई |

झट  से  मेरा  जबाव  होता -पहले  कहानी  फिर  बनूँगी रानी I वे  कहानी  सुनाते  तभी  मेरे  बस्ते  का दरवाजा  खुलता I रोज  एक  कहानी  सोच कर  आते I कहानी  सुनाने  की  मेरी  जिद   पर  उन्होंने  कभी  आँखें  नीली  पीली  नहीं कीं I

एक  शनिवार को  मेरी  परीक्षा  होने  वाली  थी I शुक्रवार  को सीधे  पिताजी  के  सामने  जा  खड़े  हुए और  बोले
--आज  बिटिया  को आपके  आफिस  में पास  ही  पड़ी   मेज -कुर्सी  पर बैठकर पढ़ाना  चाहता  हूं I

मैं  उनके  पीछे  आज्ञाकारी  बालिका  की  तरह  सिर  झुकाए  खड़ी  थी I पिताश्री  समझ  गये -जरूर  मैंने  कोई  गुल  खिलाया  होगा I उन्होंने  हंसकर कुर्सी  की  ओर  बैठने  का इशारा किया I

मेरी  तो  बोलती  बंद- - ! मास्टर   जी  बस  बोले  जा रहे  थे ,समझाए  जा  रहे  थे I बीच -बीच  में  उपदेशों  की  झड़ी- - अच्छे  बच्चे  यह करते  हैं ,अच्छे  बच्चे  वह  करते  हैं I उधर   पिताजीकी तरफ  से  काली  घटाओं  के  आने  का  डर  I फँस  गयी - - -  बीच  में  मैं I जैसे  ही  मास्टर  जी उठे  मैं  भी  उठ  गई ,भागी -- - उनके  पीछे  दरवाजे  तक  गयी   और  धीरे  से  बोली -
-मास्साब , मेरी- -  कहानी !
- अभी  तो मैं  घूमने  जाऊंगा  कल  जरूर  सुना  देंगे I
-लेकिन  आज  की  कहानी !
मास्टर  जी  पसीज  गये I मुस्कान  बिखेरते  बोले --ठीक  है  ,शाम  को  आ जाना I

मैं  तो  फूल  की  तरह  खिल  गई  Iजल्दी  -जल्दी  बस्ता  समेटा  I दूध  पीकर बाहर  निकल  गयी I खेलने  में मन  कहाँ  रमने वाला !पलकें  तो  मास्टरजी  के  घर  के  रास्ते में  बिछी  हुई थीं I

उनके घर  पहुँची  तो  संकोच  में  लिपटे  पैरों  ने  आगे  बढ़ने  से  इंकार  कर  दिया I आगे  बढूँ या  लौट  जाऊँ - - -दुविधा  में  जान - -  -I वे  आँगन  में चारपाई  पर  बैठे  थे I उनके  सामने कांसे  की  चमकती  थाली  में घी  से  चुपड़ी  मक्के  की  गर्म -गर्म रोटी रखी  थी  जो  सरसों  की  सब्जी  के  साथ अपनी  सुगंध  फैला रही थी I

                     मुझे  देखते  ही  बड़े  स्नेह  से  बोले --लल्ली मेरे  पास
 आओ ,बैठो -- देख तो  बेला  कौन  आया  है !  मुनिया  के  लिए  भी  मक्के  की  रोटी  लाओ  I यह  भी हमारे   साथ  खायेगी I उन्होंने  अपनी  बेटी  से  कहा I                                                                                                      मैं  खाने  तो  बैठ  गई  मगर  अन्दर  से  धुकधुकी  शुरू --- -खाते  ही -खाते  अँधेरा  हो  गया  तो  मेरी कहानी  का  क्या  होगा ! अच्छी  बच्ची  की तरह  रात  आने  से  पहले  घर  भी  लौटना  था I इतने  में  मास्टर  जी  बोले  - -- खाओ -खाओ , वरना  कहानी  कैसे  सुनोगी I

मेरी  आँखों.  में  चमक  आगई रोटी  का   स्वाद  दुगुना  हो  गया  I                                                                    - -रोटी  तो  बहुत  मीठी  है |
मैं  बोली I
-चलो इसी रोटी की  मिठास  की  कहानी  सुनाता  हूं - - - I

एक  चिड़िया  थी I फुर्र  से  उड़ी I बुढ़िया 
के  आँगन  में  उतर  पड़ी I चार  मक्की  के  दाने  खाए ,चार  चोंच  में  भरे   फिर  मेरे घर  की  कोठरी  में  उतर  पड़ी I                  -फिर  क्या  हुआ !                                                  --बार -बार  मेरी  कोठरी  में  आती  और  दाने  रख  जाती I दानों  की पिसाई  हुई I
-कैसे  पिसाई  हुई  मास्साब  जी ?
-चक्की  से !
-फिर  क्या  हुआ !

 -मक्की  के  आटे  की  रोटियां  बनाईं |चिड़िया  आई , भर पेट  रोटी  खाई  I लम्बी  सी  उसने   डकार ली  I
मुझसे
बोली --तुम  भी  खाओ  दूसरों  को  भी  खिलाओ I
-  इसीलिये  मैं  भी  खा  रहा 
हूं ,तुम्हें  भी  खिला  रहा  हूं I

चिड़िया  के  मक्के  के  दाने  मेरे  दिमाग  में  सज  से  गयेI
दूसरे  दिन  खाना  बनाने  वाली महाराजिन  ताई से  बोली-
मैं  मक्के  की रोटी  खाऊंगी I                                 उसने  गाय  के घी  में  डूबी  छोटी -छोटी  रोटियां  बनाईं I
-ये  मास्साब   की  रोटी  की  तरह  मीठी  नहीं  हैं I मैं  खाते -खाते  बोली  |खाती जाती  और  बुरा  सा  मुहँ  भी  बना  देती I
-उनकी  रोटी  में  ऐसी  क्या  ख़ास  बात  है  हम  भी  तो  सुनें- - -  I
-उन के  घर  में जो  चिड़िया आई ,उसे  तुम  नहीं  जानतीं,   वह जो  दाना  लाई  उसे  पीसकर  मास्टरनी जी  ने  रोटी  बनाई I आह ! क्या  मीठी !
-इस  रोटी  का  आटा   और  मास्टरजी  की  रोटी  का  आटा   एक सा  ही  है I                                                  -नहीं ! नहीं ! उनका प्यारी  सी   चिड़िया  के  दाने  का मीठा -मीठा  आटा था
  I
मेरी  बात  पर  महाराजिन ताई  हँस  पड़ी I 
-मेरे  मास्टर  जी  क्या  झूठ  बोलेंगे I जाओ - - - मैं  तुमसे  नहीं  बोलती I  पैर  पटकती  हुई  रसोई  से  बाहर  चली  गई I
उनके  हाथ  की  बनी  मकई  की  रोटी  मैंने महीनों तक  नहीं  खाई I

बहुत  समय  बाद  जब विश्वास हुआ  कि मास्साब  के  घर  का  और  मेरे  घर  का मकई  आटा  समान  ही था I उन्होंने  तो  बस  मुझे  कहानी  सुनाई  थी तो  अपने  बुद्धूपन  पर खुद  ही  हँस  पड़ी I

तभी   मुझे कुछ  उड़ता  हुआ  नजर  आया I ओह !कहीं  मास्साब  की  चिड़िया मेरे  आँगन  में  तो  नहीं  उतरना  चाहती - - - पर  - - -नहीं  - - ऐसा  कुछ  नहीं  हुआ - - -बल्कि माँ -बाबा  के  आँगन  से मेरा  थोड़ा  बचपन उड़  गया I


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मंगलवार, 7 सितंबर 2010

मैं जब छोटी थी


॥ 5॥ सब  से  भली  चवन्नी 
सुधा भार्गव






मैं  जब  छोटी  थी पढ़ती  कम  ,खेलती  ज्यादा  I पर   पिता  जी  का  अरमान  --   मैं  खूब  पढूँ  - -   पढ़ती  ही  जाऊँ  -- - -वह  भी  बिना ब्रेक  लिए I
दादी  की  असमय  मृत्यु  के कारण   उनकी  पढ़ाई  में बहुत अडचने   आईं I किसी  तरह   वे   बनारस  से  बी. फार्म  कर  पाए I  
   अब  मेरे  द्वारा अपनी  इच्छाएं  पूरी  करना  चाहते  थे  पर  मेरी  तो  जान  पर  बन  आई  I

सारे दिन  पढ़ाई - - -पढ़ाई  ,नये -नये  काम  सीखो  और  रिजल्ट  भी  अब्बल  I जरा भी  छुटके मुन्ना  भाई  से हुई  खटपट तो  सारा  दोष  मेरा  Iपट  से  आवाज आती - - - -मुन्नी ---किताब  लाओ  ---- जरा  देखूँ  --क्या  पढ़ा  है  I बड़े  शौक  से इंगलिश  पढ़ाते    मगर  महीने  में  एक  बार I जरा स्पेलिंग  बताने  में हिचकिचाई  बस --
गरजना -बरसना  शुरू   I    फिर  तो  जो  याद  होता  वह  भी  भूल  जाती I लगता   जीभ  तलुए  से  चिपक  गयी  है I

उस  रात  तो  गजब  हो  गया  I दिसंबर  का  महीना ,कड़ाके  की ठण्ड  Iकमरे  मे पक्के  कोयलों  की  अंगीठी  जल  रही  थी I हम  भाई -बहन  उस  के  पास बैठे  गर्मी  ले  रहे  थे  और  माँ  खाना  गर्म  कर  रही  थीं  I  पिताजी  को  पढ़ाने  की  धुन  ने  आन  दबोचा  I                                                         उनकी  कसौटी  पर  खरी  न उतरी  तो किताब  फाड़कर दहकते  कोयलों  के  हवाले  कर  दिया  Iधूँ-धूँ  करके  होली  जल  उठी I आंसुओं के  धुंधलके  में पिता  जी  पहचाने  ही  नहीं  जा  रहे  थे I कभी  वे  कंस  नजर  आते  तो  कभी  हिरण्यकश्यप  I
 वे  माँ से बोले --
इसके  बस की  पढ़ाई -लिखी  नहीं I कल  से  स्कूल  भेजना  बंद I नौकरों  की  छुट्टी  करो  और  इससे  करवाओ घर  का  सारा   काम  I

मैं  समझ  गयी  सिर  पर  आसमान  टूट पड़ा   है  पर  उसके  नीचे  पूरी  तरह  दबने  से  पहले    भागी  बाबा  के  कमरे  में I पिताजी  में  इतनी  हिम्मत  नहीं  थी  कि  बाबा  के  सामने  से  मुझे   खींच  कर  ले  जायें I तब  भी  घबराई सी   नजरें  दरवाजे  की  ओर  ही  लगी  थीं I                             जिसका  डर था  वही  हुआ  I चौखट  के  बाहर  खड़े -खड़े   ही  पिता श्री ने   इशारा  किया  --निकलकर   आ  I मैं  भला  लक्ष्मण  रेखा  क्यों  पार  करने  लगी I जल्दी  से  बाबा  के  पलंग  की  मसेरी उठाई और  धीरे  से  उनके  पास  लेट  गयी I बाबा  करवट  लेकर  लेटे  थे  चिड़िया  की  सी  नींद उनकी
आह्ट   पाते  ही  पूछने  लगे  ---                                                                      
-बेटी  क्या  बात  है ? तेरा  बाप  गुस्सा  क्यों  हो  रहा  है ?
-पता  नहीं बाबाजी ,बिना  बात  ही गुस्सा  हो  रहे  हैं I
-सोजा -- --सोजा  सुबह   तक  उसका  गुस्सा  ठंडा  हो  जायेगा I
बाबा जी  ने  मेरी  तरफ  करवट  बदली और  स्नेह से  मेरे  माथे  पर  हाथ  रखकर  थपकी  देने  लगे I  अपना   सुरक्षा  कवच  पा कर नन्हें  शिशु  की  तरह   
निंद्रा  की  गोदी  में  झूलने  लगी |

सबेरे -सबेरे उनके  खिले  चेहरे  को  देखकर कोई  कह  नहीं  सकता  था कि  कल  बालकाण्ड  के  साथ -साथ  लंका  कांड इन्होंने ही  किया  था I
सोच -सोचकर  दिमाग  फटा  जा  रहा  था  कि  स्कूल  कैसे  जाऊँ I मेरी  बेचैनी  पिता श्री  समझ  गये  बोले -
स्कूल  जाने  से  पहले  चवन्नी  (२५ पैसे  का  पुराना  सिक्का )
लेते  जाना चाट -पकौड़ी  के   लिए I
-स्कूल  कैसे  जाऊँ ?किताबें  तो  आपने  - - - - I
-१० बजे  जैसे ही  दुकान  खुलेगी  एकदम  नई  किताब  खरीदी  जायेगी और  तुम्हारे    पास  पहुँच  जायेगी |
चवन्नी  कि  नाम  पर  झूमने  सी  लगी  थी i नई  किताब  की  खुशबू  भी  अच्छी  लगी |

  पिता  जी  का  रौद्र  रूप दिमाग से    पल  में  उड़न-छू  हो  गया  और  दूसरी  लहर  उसमें  समा  गई--- - - - --
मेरे  पिताजी दुनिया  के  सबसे  अच्छे  पिता  हैं |

मन ही  मन  खिचड़ी पकाने   लगी - - आज तो  अपनी  सहेलियों  को  इस  चवन्नी  से बेर  -मूंगफली  खिलाऊंगी  I
  आह !मेरी  प्यारी  चवन्नी - - - I
उसे  चूमती  -पुचकारती  स्कूल  चल  दी  I
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