नये वर्ष की नई अभिलाषा ----

बचपन के इन्द्र धनुषी रंगों में भीगे मासूम बच्चे भी इस ब्लॉग को पढ़ें - - - - - - - -

प्यारे बच्चो
एक दिन मैं भी तुम्हारी तरह छोटी थी I अब तो बहुत बड़ी हो गयी हूं I मगर छुटपन की यादें पीछा नहीं छोड़तीं I उन्हीं यादों को मैंने कहानी -किस्सों का रूप देने की कोशिश की है I इन्हें पढ़कर तुम्हारा मनोरंजन होगा और साथ में नई -नई बातें मालूम होंगी i
मुझसे तुम्हें एक वायदा करना पड़ेगा I पढ़ने के बाद एक लाइन लिख कर अपनी दीदी को अवश्य बताओगे कि तुमने कैसा अनुभव किया I इससे मुझे मतलब तुम्हारी दीदी को बहुत खुशी मिलेगी I जानते हो क्यों .......?उसमें तुम्हारे प्यार और भोलेपन की खुशबू होगी -- - - - - -I

सुधा भार्गव
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मंगलवार, 23 जुलाई 2013

क्या बचपन ---------बीत गया ----!

जब मैं छोटी थी 
मैं जब छोटी थी घर वाले इस उम्मीद में थे  कि कब मैं बड़ी होऊँ और कब लड़कपन छूटे पर मुझे अच्छी तरह याद है जब -जब इस तरह की कोशिश की गई मौक़ा पाते ही मैं और मेरा बचपन और भी ज्यादा समीप आ जाते।  घंटों गले लग हम अव्यक्त खुशी का दामन थामे आँसू बहाते रहते। एक दिन मैं सबके साथ मेज पर बैठी खा रही थी दाल -चावल वह भी हाथ से ।  पीछे से आवाज आई --अब तो बचपना छोड़ो  और कायदे से मतलब छुरी -कांटे और चम्मच से खाओ । विश्वास कीजिये इस कविता का अंकुर तो तभी फूट गया था, वही कविता यहाँ उकेरती हूँ ।   

कविता /सुधा भार्गव 

क्या बचपन  मेरा बीत गया  ! 

क्या  बचपन  मेरा  बीत  गया
 नहीं ! नहीं !
ठहर -ठहर कर यह  आता है
ममतामयी की याद दिलाकर
शैशव्    मन के भाव जगाता है !
        बड़ा कहो न मुझको
        मैं तो अनजान अबोध
        बालपन की मस्ती से
        पुलकित है मेरा मन !
सुखा    दे इस बगिया को
शुष्क हवा का झोंका
अधर धरा! में प्राण लटकते
प्रतिपल कम्पित होता उर !
         नीली -पीली आँखें करके
         भयभीत करो न मुझको
         वही तो नैसर्गिक सुख है मेरा
         छीनो मत मुझसे इसको !
सुनो .सुनो पगों की आहट
वह खुद चलकर आया है
कभी न कहना बचपन बीता मेरा
वह तो घुमड़ -घुमड़ कर आया है !

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4 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल जी, सुन रहे हैं उन पगों की आहट को!! बहुत उम्दा!!

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  2. बहुत प्यारी कविता है दीदी । बचपन कभी नही जाता । वह आजन्म हमारे साथ रहता है । और यह अच्छी ही बात है ।

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  3. मेरा यह मानना है कि हमारे अन्दर जो एक छोटा सा बच्चा है उसे हमेशा जिन्दा
    रखना चाहिए.आपकी यह सुन्दर सी बाल कविता मन को छू गयी.कविता के माध्यम से आपने बहुत सुन्दर विषय को चुन कर बच्चों को अच्छा सन्देश भी दिया है.बधाई.

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  4. आनुभूतिक स्तर पर बेशक यह एक अच्छी कविता है लेकिन, छंद की बात अगर छोड़ भी दें तो, इसमें लयात्मकता का अभाव खटकता है जो कि शिशु अथवा बाल स्तर के पाठकों के साहित्य में होनी अपरिहार्य है।

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